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रिश्तों के समर्पण पर हिन्दी कविता : टूट चुकी हूं अंदर-अंदर...

सुशील कुमार शर्मा
तुमसे सीखे तौर-तरीके,
क्या तुम मेरे सीखोगे।
हर पल मुझसे जीतते आए,
अब और कितना जीतोगे। 
 
अपने छोड़े सपने छोड़े,
तुमको अपना माना है।
हर सपने का समझौता कर,
हाथ तुम्हारा थामा है। 
 
मैं औरत हूं कि सीखें,
देना तुम कब छोड़ोगे।
टूट चुकी हूं अंदर-अंदर,
मन से तुम कब जोड़ोगे। 
 
चौका-बर्तन, खाना-पानी,
क्या सब मेरी जिम्मेदारी।
घर के कामों के करने की,
कब लोगे तुम हिस्सेदारी। 
 
सुबह से उठकर रात तलक,
मैं मशीन बन जाती हूं। 
बच्चों से बूढ़ों की इच्छा की,
मैं अधीन हो जाती हूं। 
 
घर के कामों को मेरे,
कर्तव्यों में ढाला जाता। 
सारे लोगों की अपेक्षाओं,
को मुझसे ही पाला जाता। 
 
रिश्तों की डोर बांधकर,
बैलों-सा खींचा जाता। 
कर्तव्य निर्वहन का संदेश,
मेरे कानों में सींचा जाता। 
 
थका हुआ है बच्चा मेरा,
जब ये सासू कहती हैं। 
मां की याद दिलाकर,
ये आंखें क्यों बहती हैं। 
 
घर-बच्चे-ऑफिस संभालकर,
भूल गई खुद का व्यक्तित्व। 
जीवन के इस पड़ाव पर,
ढूंढ रही अपना अस्तित्व। 
 
मैंने अपना सब कुछ छोड़ा,
क्या तुम भी कुछ छोड़ोगे। 
टूट चुकी हूं अंदर-अंदर,
मेरा मन कब जोड़ोगे।
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