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विजय सिंह चौहान की 10 लघुकथाएं

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Vijay Singh Chauhan

1. मौन संवाद

“…अजीब बात है,” साहब कुर्सी की पीठ से टिकते हुए बोले, “कुछ दिनों से दफ्तर के बाहर पक्षियों की फौज दिखाई नहीं देती। न चहचहाहट, न शोर। लगता है तुम लोग दाना–पानी रखना भूल जाते हो।” स्वर में चिंता कम, रौब अधिक था।
 
शहर का यह कोना यूँ ही नहीं पहचाना जाता था। सैकड़ों हरे–भरे वृक्ष और हजारों परिंदों का संयुक्त परिवार इसकी साँसों में बसता था। अलसुबह परिंदों का दाने–पानी की खोज में उड़ जाना और गोधूलि पर चहचहाते हुए लौट आना इतना उत्सवपूर्ण होता कि शहर का कोलाहल भी बौना पड़ जाता।
 
कड़क आवाज के उत्तर में एक मुस्कान धीरे से उगी और बोली… “साहब, आप तो जानते ही हैं, मुख्यालय का विस्तार प्रस्तावित है। पेड़ काटने का आदेश… आपके ही हस्ताक्षर से निकला था।”
 
क्षणभर के लिए शब्द ठिठक गए। कमरे में एक ऐसा मौन उतर आया जो किसी आदेश से भी भारी था। फिर मध्यम स्वर मुखर हुआ, “शायद यह बात परिंदों को समझ आ गई इसलिए वे चुप हैं। वे जान गए हैं कि जहाँ आदेश बोलते हैं, वहाँ परिंदे चहचहाना भूल हैं।”

2. रविवार

रात की चांदनी परदों से छनकर कमरे में बिखर रही थी। सुधाकर ने करवट बदलते हुए कहा, “माधुरी, कल रविवार है, ज़रा देर से जगाना और दाल-बाटी के साथ लहसुन की चटनी भी बना देना।” वह मुस्कराई ही थी कि बच्चे उछलते हुए आ गए, “मम्मी, कल हमारे लिए पिज़्ज़ा बनाना, खूब सारा चीज़ डालकर!” खाने की बात चल ही रही थी कि अंदर वाले कमरे से दादी की आवाज़ भी आ गई, “बहू, कल मक्के की रोटी और सरसों का साग बना देना, रविवार है न।”
 
माधुरी कुछ पल चुप रही। तीनों पीढ़ियों की तीन इच्छाएँ उसके मन में जैसे सूची बनकर उभर आईं। उसने धीमे से कहा, “ठीक है, सबका रविवार पूरा होगा।” रात गहराने लगी, छत निहारते हुए माधुरी बुदबुदाई, “काश… कभी मेरा भी रविवार आता।”
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3. पीले हाथ

हाथ पीले कर शिवांगी विदा हो रही थी। दहलीज़ लाँघते-लाँघते वह अचानक मुड़ी और सुधाकर के गले लग गई। भीगी पलकों की कोर पोंछते हुए बोली- “पापा, आप बेशक सब कुछ छोटे को दे दीजिए… बस मेरा कमरा, मेरा रहने देना। मैं नहीं चाहती कि हर बार मायके आकर बुआ की तरह पूछूँ— भैया, मैं कहाँ सोऊँ? यह सूटकेस कहाँ रखूँ?”
 
बिलखते सुधाकर ने उसे दोनों हाथों से थाम लिया, जैसे बिखरती आशंका को समेट रहा हो। सुधाकर की आवाज़ में विश्वास था, हाथों में आसमान सी छत। “नहीं बेटी, ऐसा कभी मत सोचना। यह घर तेरा था और तेरा ही रहेगा।” सुकून से बिदा होते समय दोनों की आँखों से मीठे पानी का दरिया चुपचाप बह निकला।
 

4. आस का पंछी

दो साल बाद आया था… विनय। कुल जमा दस दिन के लिए। दो दिन ससुराल में बीत गए। दो दिन—मामी के अवसान पर ननिहाल में। दो दिन वीज़ा, पासपोर्ट और बैंक की लंबी कतारों में फिसल गए। जो दिन बचे, वे भी ज़िद्दी सर्दी–जुकाम की गिरफ्त में धीरे-धीरे घुलते रहे।
 
कल सांध्य बेला में, पंछी घोंसलों की ओर लौट रहे थे तभी विनय ने परदेस के लिए उड़ान भरी। माँ की आँखों से फूटते मौन प्रवाह पर अपनी हथेली रखकर उसने कहा… “माँ, अब अगले दो साल बाद ही आ सकूँगा…
 
बेटे की पढ़ाई है, उसमें व्यवधान ठीक नहीं। फिक्र न करना, वीडियो कॉल पर तो रोज़ ही मिलते हैं।” विनय मन समझाकर चला गया और बूढ़े माँ-बाप? अपनी थरथराती देह, धड़कते मन और धीमे पड़ चुके सपनों को समेटते हुए
फिर लौट आए उस घर में, जहाँ अब सिर्फ़ तन्हाई पसरी है, और दरवाज़े पर टंगा है इंतज़ार का अनंत-सा पल।


5. असली मुस्कान

सारा दिन मोबाइल पर अंगूठा रगड़ते-रगड़ते सिरदर्द और आँखों का धुंधलापन बढ़ता जा रहा था। पढ़ाई हो या मन का कोई प्रश्न, सुनयना हर जवाब अपनी आभासी यूनिवर्सिटी, मोबाइल, से खोज लेती थी। दादी जी सुनयना का यह व्यवहार चुपचाप पढ़ती-समझती रहतीं।
 
एक दिन दादी जी ने कुछ करने का निश्चय किया। उन्होंने आसपास के बच्चों को बुलाया और आँगन में बैठाकर सितोलिया, छुपा-छाई, भंवरा, मांडना और रंगोली की पुरानी कहानियाँ सुनानी शुरू कर दीं। बच्चों की खिलखिलाहट से पूरा आँगन चहक उठा।
 
शोर सुनकर सुनयना भी बाहर आई, पहले झिझकते हुए, फिर आकर्षित होकर। पहली बार सुनयना ने रील लाइफ़ से नज़रें हटाकर रियल लाइफ़ को स्पर्श किया, खेलों की मिट्टी को छुआ, और बच्चों संग अपनी हँसी बाँटी, तो उसके चेहरे पर वह असली मुस्कान खिली, जो न किसी फ़िल्टर से आती है, न किसी ‘लाइक’ या कमेंट से।
 
चमकती आँखों को देखकर दादी जी ने कहा- “असली मुस्कान फ़िल्टरों में नहीं, रिश्तों की खिलखिलाहट में मिलती है, बिटिया।”

6. तृप्ति

मन भर आशीष लुटाने के बाद वृद्धा चौखट पर ठिठक गई और मध्यम स्वर में बोली- “बहू… भूख लगी है।” आगे के शब्द उसके काँपते होंठों में ही अटक गए। बड़ी बहू ने सुधा को कहा, “बेटा, दो रोटियाँ और थोड़ी सूखी सब्ज़ी दे आ।”
 
वृद्धा ने कंपकंपाते हाथों से रोटियां लीं और अंतिम कौर तक आनंद से भोजन ग्रहण किया। पर्दे की ओट से झाँकती सुधा को अचानक अपनी ही थाली याद आई… वही थाली, जिसमें वह रोज़ रोटी-सब्ज़ी यूँ ही छोड़ देती थी।
 
भूख से तृप्ति की इस सरल यात्रा ने सुधा के अंतर्मन को गहराई तक झकझोर दिया।

7. सौंधी चमक

हाट-बाज़ार में देसी सादगी और विदेशी चमक आमने–सामने सजी थीं। रंग-बिरंगी कारीगरी से सुसज्जित चीनी मिट्टी का प्याला अपनी चिकनाई पर इठला रहा था, वहीं देसी मिट्टी के बर्तन अपनी सुवास में सौंधापन घोल रहे थे।
 
माधुरी का हाथ बस बढ़ने ही वाला था कि पास बैठा कुम्हार संकोच से अपने बर्तन आगे सरका गया— “बहिनजी… ये अपने गाँव की मिट्टी से बने हैं। खरीद लोगी तो मेरे घर का चूल्हा भी जल जाएगा।”
 
उसकी हथेलियों की दरारों में सूखी मिट्टी अटकी थी, और आँखों में अपनेपन की नमी तैर रही थी।
 
माधुरी के कदम ठिठक गए। अगले ही पल उसने मिट्टी की उस सौंधी खुशबू को आत्मसात किया और कुम्हार के चेहरे पर उग आई मुस्कान का मूल्य चुका दिया।

8. कच्ची लकड़ी

अलाव के पास सब गोल घेरा बनाकर सुलगती आग से गर्माहट समेट रहे थे। बच्चों की निगाहें लहसुन, बटला और हरे चनों पर जमी थीं, जो अंगारों पर धीरे–धीरे पक रहे थे, तभी मेघा ने एक गीली लकड़ी आग में डाल दी।
 
कच्ची–पक्की लकड़ियों की जुगलबंदी से धुआँ चारों ओर फैल गया। आँखों में जलन तैरने लगी। दादाजी ने अपनी छड़ी से गीली लकड़ी अलग करते हुए बोले- “बिटिया, गीली लकड़ी जलती नहीं… बस धुआँ करती है। जाओ, पकी लकड़ी ले आओ।”
 
मुनिया के कदम बढ़े ही थे कि जिज्ञासा ने कदम रोक लिए। “दादाजी… एक बात पूछूँ?”
दादाजी मुस्कुराए “एक नहीं, दो पूछ।”
 
मेघा ने हिचकते हुए कहा- “दादाजी… मैं भी तो अभी गीली लकड़ी जैसी ही हूँ। न पढ़ाई पूरी हुई, न समझ पकी है… फिर आप सब मेरी शादी की इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो, अभी तो मुझे पढ़ना है… अपने पैरों पर खड़ा होना है।”
 
बिटिया के शब्दों की तपिश दादाजी तक पहुँची। कुछ पल वे अलाव को देखते रहे, फिर सिर पर हाथ फेरते हुए बिटिया को गले लगा लिया।
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9. विरासत

“ऑर्डर! ऑर्डर! गूंजते ही कचहरी में फैला शोर अचानक शांत हो गया। दोनों पक्ष सगे भाई-बहन, नज़रें झुकाए खड़े थे।
 
धीमी आवाज़ ने दिल पर दस्तक दी, “बड़ी बहन… माँ समान और बड़ा बेटा, परिवार का संरक्षक होता है। माता-पिता ने तिल-तिल करके जोड़ी विरासत का यही सम्मान किया है तुम दोनों ने जो आज अदालत में आ खड़े हो?”
 
तल्ख आवाज से बहन की पलकों पर नमी तैर गई वहीं भाई की उंगलियाँ फाइल पर थरथराने लगीं। आवाज फिर मुखर हुई,संपत्ति का विवाद, वाद से नहीं… संवाद से सुलझाइए। अपने-अपने बच्चों को प्यार की सौगात दीजिए, मनमुटाव की नहीं।
 
दोनों कुछ क्षण मौन रहे तभी बड़ी बहन ने भाई के सिर पर हाथ फेरा, और भाई फफक कर रो पड़ा।
 

10. सिंदूरी सांझ

गोधूलि बेला में धूल उड़ाती पगडंडी से घिरी गायें ग्वालों के संग लौट रही थीं। सिंदूरी सांझ के साथ घर वापसी को बेताब मन प्रफुल्लित था।  नीम के झाड़ की छाँह में कक्काजी रोज़ की तरह कभी ढीली चारपाई की रस्सियाँ कसते, तो कभी उस पर चादर झाड़कर बिछा देते।
 
उड़ती धूल पर पानी के छींटे मारते हुए एक दिन पड़ोसी हरिया पूछ ही बैठा… “कक्काजी, रोज़ चारपाई की कसाई-बिछाई और सफाई किसके लिए? कोई आने वाला है क्या?”  कक्काजी हल्के से मुस्कुराए।
 
तपती दुपहर की थकान उतारते हुए बोले… “पहले यहीं बैठकर मेरा बेटा घंटों बतियाता था। नौकरी के लिए शहर क्या गया, वहीं का होकर रह गया।”  यह कहते-कहते उनका गला भर्रा गया… “जाने वाला तो आता नहीं… पर उसकी यादें रोज़ आकर यहीं बैठ जाती हैं।”  देखते ही देखते सिंदूरी सांझ, घुप्प अँधेरे में घुलने लगी।
 
 
लेखक परिचय : विजय सिंह चौहान मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में अधिवक्ता है। उनकी शब्दघोष, सरस्वती सुमन, साक्षात्कार, लघुकथा कलश, वीणा, विश्वगाथा, संगिनी, स्मेश, चिकीर्षा, आदिज्ञान, समकालीन त्रिवेणी, अविलोम, राजपूत वाणी, प्रभाष बंधु (यू.एस.ए. से प्रकाशित बांग्ला पत्रिका) समेत अन्य पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। चौहान ने इसके अलावा विधि पुस्तकों में विधि रिपोर्ट्स, आलेख एवं संपादन भी किया है।

इन्हें विभिन्न मंचों सम्मानित किया गया है। इनमें डॉ. एस.एन. तिवारी स्मृति पुरस्कार, इंदौर लघुकथा श्री (लघुकथा शोध केंद्र, भोपाल) कृति "संवेदनाओं का आचमन", स्व. सतीश राज पुष्करणा स्मृति सम्मान (संस्था क्षितिज, 2022), साहित्य साधक सम्मान (संस्कृति एवं साहित्य शोध समिति, बालाघाट, 2023), कृति सम्मान (कथा दर्पण साहित्य मंच, इंदौर, 2023), जयपुर साहित्य सम्मान, 2024, क्षितिज लघुकथा रत्न सम्मान -2025, क्षितिज कृति सम्मान, लघुकथा संग्रह पत्थर पर बुवाई प्रमुख हैं। आकाशवाणी से वार्ता एवं लघुकथा का नियमित प्रसारण, लघुकथाओं का मालवी, निमाड़ी, उड़िया, बांग्ला में अनुवाद व प्रकाशन। 
 

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