Publish Date: Thu, 21 May 2026 (15:31 IST)
Updated Date: Thu, 21 May 2026 (16:07 IST)
- लक्ष्मण शिवहरे, नागपुर
प्रतिदिन की भांति सुबह मैं अपने मित्रगण के साथ पार्क में आसन कर रहा था। आसन करते-करते मैंने देखा कि पार्क से सटे मार्ग से श्रद्धेय दिगंबर जैन मुनि गुजर रहे हैं। यह देखकर मैं और मेरे कुछ मित्र आसन करना रोककर उन्हें प्रणाम करते हैं; मैं अपने आसन के स्थान से ही साष्टांग प्रणाम करता हूं।
उनके गुजर जाने के बाद एक मित्र बोला- 'निर्वस्त्र रहकर यदि ईश्वर मिलने लगे तो जानवरों को पहले मिलना चाहिए।'
यह सुनकर कुछ मित्र हंसी-ठिठोली करते हैं। अपने अपरिग्रह श्रद्धेय मुनिगण के प्रति मित्रों के आचरण से मुझे बहुत पीड़ा हुई।
मित्र के कटाक्ष का जवाब मैं उनके पास जाकर देने ही वाला था कि पार्क में खेल रही करीब बारह वर्षीय एक बालिका दौड़कर मित्र के पास आई और जोर से बोली- 'अंकल, क्या आपको ईश्वर मिल गए हैं?'
बालिका के अप्रत्याशित प्रश्न से हम सब आसन करना छोड हतप्रभ हो उसे देखने लगे। अचानक पूछे गए जिज्ञासा भरे प्रश्न के प्रति उत्तर में उस मित्र ने बालिका से पूछा- 'तुम यह क्यों पूछ रही है बिटिया?'
बालिका ने बड़े विश्वास के साथ उत्तर दिया वो बोली- 'आपने कपड़े पहने हुए है इसलिए पूछ रही हूं कि क्या कपड़े पहनकर आपने ईश्वर को पा लिया है? नन्ही बालिका के ये शब्द सुनकर हम सब मित्रगण आश्चर्यचकित हो उसकी ओर देखने लगे।
मैंने देखा कि कटाक्ष करने वाला मित्र एक पल के लिए स्तब्ध हुआ, फिर अगले ही पल अपनी आसनी बगल में दबाए शर्म से सिर झुकाए तेज कदमों से पार्क से बाहर जा रहा है।
बालिका उछलकूद करने में मग्न है।
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