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गंडकी नदी का पौराणिक महत्व, शालिग्राम से लेकर अयोध्या की प्रतिमा निर्माण शिला तक

Webdunia
गुरुवार, 2 फ़रवरी 2023 (03:41 IST)
गंडक या गण्डकी नदी काली और त्रिशूली नदियों के संगम से बनी है, जो नेपाल की उच्च हिमालय पर्वतश्रेणी से निकलकर उत्तर भारत में बहती है। संगम से भारतीय सीमा तक इसे नारायणी नदी भी कहते हैं। बूढ़ी गंडक नदी एक समानांतर धारा है। यह नदी दामोदर कुंड से निकलकर बिहार के सोनपुर में गंगा नदी में मिल जाती है। यानी सैंकड़ों किलोमीटर का घुमावदार सफर तय करके पटना के सामने गंगा नदी में मिल जाती है। आओ जानते हैं इसका पौराणिक महत्व।
 
महाभारत के सभापर्व में इस नदी का उल्लेख मिलता है- 'तत: स गंडकाञ्नछूरोविदेहान् भरतर्षभ:, विजित्याल्पेन कालेनदशार्णानजयत प्रभु:।' सदानीरा जिसका उल्लेख प्राचीन साहित्य में अनेक बार आया है, संभवत: गंडकी ही है- 'गंडकींच महाशोणां सदानीरां तथैव थ।'- 29; 4-5। इस नदी का तीर्थरूप में भी वर्णन किया गया है- 'गंडकीं तु सभासाद्य सर्वतीर्थ जलोद्भवाम् वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति'।
 
नदी का परिचय : हिमालय पर्वत श्रेणियों के धौलागिरि पर्वत के मुक्तिधाम से निकली गंडक नदी गंगा की सप्तधारा में से एक मानी जाती है। नदी मूलरू से तिब्बत से निकलकर नेपाल होते हुए उत्तर प्रदेश के महराजगंज, कुशीनगर होते हुए बिहार के सोनपुर के पास गंगा नदी में मिल जाती है। इस नदी को बड़ी गंडक, गंडकी, शालिग्रामी, नारायणी, सप्तगंडकी आदि नामों से जानते हैं। करीब 1310 किलोमीटर के लंबे सफर में कई धार्मिक स्थल हैं।
शालिग्राम : शिवलिंग की तरह शालिग्राम भी बहुत दुर्लभ है। अधिकतर शालिग्राम नेपाल के मुक्तिनाथ, काली गण्डकी नदी के तट पर पाया जाता है। काले और भूरे शालिग्राम के अलावा सफेद, नीले और ज्योतियुक्त शालिग्राम का पाया जाना तो और भी दुर्लभ है। पूर्ण शालिग्राम में भगवाण विष्णु के चक्र की आकृति अंकित होती है। देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन भगवान शालिग्राम व तुलसी का विवाह संपन्न कर मांगलिक कार्यों का प्रारंभ किया जाता है। हिंदू धर्म मान्यता के अनुसार इस दिन तुलसी-शालिग्राम विवाह करने से अपार पुण्य प्राप्त होता है।
 
गंडकी और अयोध्या : इस नदी से तो विशालकाय शिलाएं अयोध्या में लाई जा रही है जिनसे श्रीराम और सीता की मूर्तियां बनाई जाएगी। दावा किया जा रहा है कि ये शिलाएं करीब 6 करोड़ साल पुरानी हैं।  एक शिला का वजन 26 टन जबकि दूसरे का 14 टन है। यानी दोनों शिलाओं का वजन 40 टन है। गंडक की एक सहायक नदी काली गंडकी नदी है। इसे शालिग्रामी नदी भी कहा जाता है। इसी शालिग्राम नदी से यह शिलाएं निकाली गई हैं।

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