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प्रजामंडल की कहानी, 1922 में हुआ था पहला अधिवेशन

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कमलेश सेन

मंगलवार, 24 मई 2022 (17:29 IST)
होलकर शासनकाल में राजशाही से लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता के शासन की मांग के साथ आजादी के लिए अंग्रेजी सत्ता से संघर्ष के साथ अपनी मांग को पुरजोर तरीके से उठाने के लिए प्रजामंडल ने अपनी महती भूमिका निभाई थी। प्रजामंडल का निमाड़ और मालवा के साथ मध्यभारत में जबर्दस्त प्रभाव था, कई स्थानीय नेता इसके प्रमुख थे।
 
इंदौर राज्य प्रजामंडल का पूर्व नाम इंदौर राज्य प्रजा परिषद था। प्रजामंडल युवाओं का वह संगठन था, जो अंग्रेजी राज्य और राजशाही के विरुद्ध कार्य कर देश को आजाद करवाने के लिए कार्य कर रहा मंच था। इस संस्था की स्थापना के पहले सभापति खंडवा के चटर्जी वकील साहब थे। प्रजामंडल के कार्यकर्ताओं में प्रमुख वी.सी. सरवटे, भालेराव वकील, प्रोफ़ेसर भानुदास, सूरजमल जैन और डॉक्टर व्यास आदि थे। इस टीम ने काफी अथक प्रयास किए और प्रजामंडल के प्रथम अधिवेशन के लिए मालवा और निमाड़ के नगरों में जाकर आम जनता को अपनी योजना एवं राज्य प्रजामंडल से अवगत करवाया।
 
प्रजामंडल का पहला अधिवेशन 1922 में राज्य प्रजा परिषद के बैनर तले आयोजित हुआ था। इस अधिवेशन में शराबबंदी और पंचायती राज्य की स्थापना की मांग की गई थी। इस अधिवेशन के सभापति खंडवा के वकील साहब चटर्जीजी थे।
 
प्रजामंडल का दूसरा अधिवेशन, जो वास्तव में प्रजामंडल के नाम से हुआ था, पहला अधिवेशन ही माना जाएगा, जो 21 मई 1939 को हुआ था। यह अधिवेशन वर्तमान में पुलिस ऑफिस है। उस स्थान पर यानी रानीसराय के पास के मैदान में हुआ था। इस अधिवेशन में करीब 30 हजार कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया था और इस अधिवेशन की अध्यक्षता बैजनाथ महोदय ने की थी।
 
प्रजामंडल ने कार्यकर्ताओं के मध्य तक अपनी बात रखने और प्रचार के लिए अपना प्रकाशन आरंभ करने का विचार किया और 26 जनवरी 1940 से 'प्रजामंडल' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ कर दिया था। 20 अगस्त 1942 को 'प्रजामंडल' पत्रिका के प्रकाशन पर प्रतिबंध लगा दिया था। 26 जनवरी 1945 से पत्रिका का प्रकाशन पुन: आरंभ हुआ, जो 1947 तक जारी रहा।
 
प्रजामंडल के कुल 7 अधिवेशन हुए और 20 मई 1940 को खरगोन में दूसरा अधिवेशन हुआ था। अध्यक्षता वी.सी. सरवटे ने की। तीसरा अधिवेशन 14 फरवरी 1942 को महिदपुर में हुआ जिसकी अध्यक्षता भानुदास शाह ने की थी। 30 सितंबर 1944 को दशहरा महोत्सव पर इंदौर के नरेश यशवंतराव होलकर द्वारा प्रजामंडल क़ानूनी घोषित कर दिया था। 7 अप्रैल 1945 को प्रजामंडल का चौथा अधिवेशन रामपुरा में आयोजित हुआ था जिसकी अध्यक्षता मिश्रीलाल गंगवाल ने की थी।
 
प्रजामंडल को सफलता मिली और नगर पालिका इंदौर में 27 मई 1945 को 36 में से 19 सदस्यों को स्थान दिया गया था। 20 अप्रैल 1946 को प्रजामंडल का 6ठा अधिवेशन खातेगांव में हुआ जिसकी अध्यक्षता रामेश्वरदयाल तोतला ने की थी। अंतिम और 7वां अधिवेशन जुलाई 1947 में राऊ में आयोजित हुआ था जिसकी अध्यक्षता दिनकरराव परुलकर ने की थी।
 
कर्नल दीनानाथ जिन्हें सिरेमल बापना के स्थान पर इंदौर राज्य का प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया था, वे प्रजामंडल की गतिविधियों से काफी नाराज थे। प्रजामंडल आंदोलन को सीमित करने में कर्नल दीनानाथ का काफी योगदान था।
 
प्रजामंडल द्वारा 23 मई 1945 इंदौर राज्य को भारतीय संघ में शामिल करने की मांग का आंदोलन, माणिकबाग पर जनता के मोर्चे पर पुलिस मंत्री हार्टन द्वारा हवाई फायर और लाठीचार्ज के आदेश का काफी विरोध हुआ था। नगर बंद एवं हड़ताल का आव्हान भी प्रजामंडल ने किया था। इस तरह जाहिर है कि राज्य प्रजामंडल का इंदौर राज्य के साथ मालवा और निमाड़ में जनचेतना के साथ राजनीतिक घटनाओं में बहुत योगदान रहा है।

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