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यूरोप के अंधविश्वासियों ने एक डॉक्टर को जान देने के लिए किया मजबूर, कोरोना टीकों का कर रहे थे विरोध

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राम यादव

हम सोचते हैं कि यूरोप-अमेरिका के निवासी बहुत पढ़े-लिखे, बुद्धिमान और समझदार होते हैं। विज्ञान को मानते हैं, न कि अंधविश्वासी होते हैं। पर सच्चाई यह है कि दूसरों को प्रायः अनपढ़ और अंधविश्वासी मानने वाले बहुतेरे पश्चिमवासी स्वयं ही मूर्खता और अंधविश्वास की पराकाष्ठा हो सकते हैं। कोरोनावायरस (Coronavirus) को झुठलाने और उससे बचाव के टीकों को अब भी आंख मूदकर ठुकराने वाले ऐसे ही ज़िद्दियों ने इन्हीं दिनों यूरोपीय देश ऑस्ट्रिया की एक प्रतिष्ठित महिला डॉक्टर की जान ले ली।

डॉक्टर लीज़ा-मरिया केलरमायर, 36 साल की अल्प आयु में ही अपने देश ऑस्ट्रिया में काफ़ी प्रसिद्ध हो गई थीं। यह प्रसिद्धि उन्हें वास्तव में पिछल दो वर्षों में ही मिली थी। ऑस्ट्रिया में कोरोनावायरस का प्रकोप बढ़ने के साथ रेडियो-टेलीविज़न जैसे मीडिया में होने वाली बहसों के समय उन्हें बुलाया जाना भी बढ़ने लगा। इन बहसों में वे संक्रमण से बचाव के टीके को अनिवार्य बनाने और कोविड-19 से लड़ने के लिए कठोर नियमों की पैरवी किया करती थीं। यही बात कोरोना को झुठलाने वाले अंधविश्वासियों को चुभने लगी।

मार डालने की धमकियां
अंधविश्वासियों ने भी अपने आपको संगठित करना और दंगे-फ़साद करना शुरू कर दिया। नवंबर 2021 में उन्होंने ऑस्ट्रिया में वेल्स-ग्रीसकिर्शन नाम के एक शहर वाले अस्पताल के बाहर उग्र प्रदर्शन किया। डॉ. केलरमायर उस समय वहीं थीं।

उन्होंने इस प्रदर्शन की निन्दा करते हुए ट्वीट किया, टीकों को षड्यंत्र बताने वाले प्रदर्शनकारियों ने (पुलिस) अधिकारियों की आंखों के सामने अस्पताल का मुख्य प्रवेशद्वार और रेडक्रॉस के वाहनों का रास्ता रुंध दिया है। अपने ट्वीट में यह भी कहा कि उन्हें कोविड संबंधी नियमों और टीकों के विरोधियों द्वारा गालियां और मार डालने की धमकियां दी जा रही हैं।

डॉ. केलरमायर का अपनी निजी प्रैक्टिस वाला एक दवाखाना भी था। उनके कट्टर विरोधी 'टेलिग्राम' नाम वाले सोशल मीडिम के माध्यम से संगठित होने लगे और सामूहिक रूप से उन्हें गालियां एवं मौत की धमकियां देने लगे। कुछ लोग अपने आपको बीमार बताकर उपचार कराने के बहाने से उनके दवाखाने में भी पहुंच जाते थे। वहां उन्हें और उनके सहकर्मियों को तंग करते थे। मोबाइल फ़ोन से फ़ोटो लेकर या वीडियो बनाकर उन्हें इंटरनेट पर प्रचारित करते थे।

किसी ने गंभीरता से नहीं लिया
इन हरकतों से परेशान डॉ. केलरमायर ने ऑस्ट्रिया की पुलिस से और देश की आंतरिक गुप्तचर सेवा से भी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने का अनुरोध किया। अनेक पत्र आदि लिखे। पर किसी ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। उनकी शिकायतों वाली पुलिस की फ़ाइल में लिखा मिला, कुल मिला कर यही आभास होता है कि डॉ. केलरमायर जांचकर्ता विभागों पर दबाव बढ़ाने के लिए सार्वजनिक ध्यान को हर तरह से अपनी तरफ़ खींचने का प्रयास कर रही हैं।

डॉ. केलरमायर ऑस्ट्रिया के जिस राज्य की निवासी थीं, वहां के सरकारी अभियोक्ता के कार्यालय ने उन्हें धमकाने वाले एक संदिग्ध व्यक्ति के विरुद्ध जांच शुरू तो की, लेकिन पिछले जून महीने में उसे रोक दिया। कारण यह बताया कि वह जर्मनी में रहता है, जर्मनी हमारे कार्यक्षेत्र से बाहर है। इंटरनेट पर नज़र रखने वाली एक जर्मन महिला विशेषज्ञ ने ऑस्ट्रिया के सरकारी अभियोक्ता कार्यालय को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव रखा और जर्मनी में रहने वाले दो नवनाज़ियों के सुराग भी उसे मिले, पर उसकी उपेक्षा कर दी गई।

निजी पहरेदार नियुक्त किया
अधिकारियों की लापरवाही, ढीला-ढाली और उपेक्षाओं से तंग आकर डॉ. केलरमायर ने खुद ही अपनी और अपने दवाखाने में काम करने वालों की सुरक्षा के लिए एक पहरेदार नियुक्त किया, लेकिन जून के अंत में उन्हें अपना दवाख़ाना बंद कर देना पड़ा, क्योंकि निजी सुरक्षा व्यवस्था उन्हें बहुत महंगी पड़ रही थी। जून के अंत तक उन्हें इस पर एक लाख यूरो (लगभग 85 लाख रुपए) ख़र्च कर देने पड़े थे।

जुलाई के आरंभ में ऑस्ट्रिया के मेडिकल एसोसिएशन ने उनकी सहायता करने की बात कही और सलाह दी कि वे अभी दिवाला घोषित न करें। इससे प्रेरित होकर डॉ. लीज़ा-मरिया केलरमायर ने लोगों से कहा कि वे शायद जल्द ही अपना दवाख़ाना फिर से खोल सकेंगी।

दवाख़ाना फिर से खुलने के बदले 29 जुलाई के दिन, डॉ. केलरमायर को उनके दवाख़ाने में ही मृत पाया गया। सरकारी वकील के कार्यालय ने कहा कि उनकी मृत्यु में किसी दूसरे का हाथ नहीं है। एक स्थानीय अख़बार ने लिखा कि उनके लिखे तीन पत्र मिले हैं। उनमें से एक पुलिस निदेशालय के नाम है। उसमें लिखा क्या है, बताया नहीं जा रहा है।

मरणोपरांत शोक संदेश
मरणोपरांत देश के राष्ट्रपति अलेक्सांदर फ़ॉन देयर बेलन सहित अनेक लोग सोशल मीडिया पर शोक व्यक्त करने में जुट गए। कोविड को झुठलाने और टीकों का विरोध करने वालों को कोसने-धिक्कारने लगे। लेकिन जब तक डॉ. लीज़ा-मरिया केलरमायर जीवित थीं, टीके-विरोधी सिरफिरे अंधविश्वासियों से लड़ रही थीं, सुरक्षा की गुहार लगा रही थीं, तब तक वे सभी भद्रजन कान में तेल डाले सोए रहे, जो अब अत्यंत शोकसंप्त हैं।

डॉ. केलरमायर के परिजन चाहते थे कि उनकी मृत्यु का सही कारण जानने के लिए शवपरीक्षा (पोस्टमार्टम) हो। शवपरीक्षा का परिणाम मिलने के बाद सरकारी वकील के कार्यालय ने 3 अगस्त को कहा कि मृत्यु का कारण अब भी आत्महत्या ही है। ऐसे कोई दूसरे तथ्य नहीं मिले, जिनसे कोई दूसरा संकेत मिले...कोई तीसरा हाथ नहीं है।

2 जर्मनों की भी है तलाश
जर्मनी के बवेरिया राज्य के सरकारी अभियोक्ता कार्यालय की ओर से कहा गया कि डॉ. केलरमायर को डराने-धमकाने वालों में बवेरिया का भी एक व्यक्ति होने के संदेह की जांच फिलहाल चलती रहेगी। एक दूसरा संदिग्ध जर्मन व्यक्ति बर्लिन का निवासी बताया जा रहा है। दोनों संदिग्धों की पहचान अभी तक नहीं हो सकी है।

उल्लेखनीय है कि जर्मनी और ऑस्ट्रिया, जर्मन-जातीय और जर्मन-भाषीय पड़ोसी देश हैं। दोनों यूरोपीय संघ के सदस्य हैं। हिटलर के शासनकाल में दूसरे विश्वयुद्ध का अंत होने से पूर्व दोनों लगभग आठ वर्षों तक एक ही देश रह चुके हैं। दोनों देशों में नवनाज़ियों के उत्पात अब भी इसीलिए होते रहते हैं। दोनों देशों में वे ही या उनसे सहानुभूति रखने वाले उग्र दक्षिणपंथी, कोराना को अब भी झुठलाने और उससे बचाव के टीकों को सरकारी साज़िशें बताने में सबसे आगे रहते हैं।

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