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हज़ारों मज़दूरों की बलि देकर क़तर में हो रहा है फुटबॉल का विश्व कप

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राम यादव

सोमवार, 14 नवंबर 2022 (20:20 IST)
अरब-इस्लामी जगत में लगभग अकेला पड़ गया क़तर इन दिनों फुटबॉल विश्व कप की मेज़बानी के बहाने से दुनिया में अपने नाम और कूटनीति का सिक्का जमाने में व्यस्त है। क़तर एक छोटी-सी, पर बहुत धनी अरबी राजशाही है। अपने पड़ोसी अरब देशों से उसकी पटती नहीं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मिस्र ने 2017 में उसकी आर्थिक नाकेबंदी कर दी थी।
 
कहा कि बदनाम 'मुस्लिम ब्रदरहुड' संगठन के साथ क़तर की मिलीभगत है। वह आतंकवादी गिरोहों को पोषित करता है। ये आरोप निराधार नहीं हैं। मिस्र, लीबिया, ट्यूनीशिया और सीरिया में क़तर सचमुच कट्टरपंथियों के साथ दिखता है। यूरोप और भारत सहित एशिया के कई देशों में बड़ी गोपनीयता के साथ इस्लाम के प्रचार-प्रसार में भी जुटा हुआ है।
 
एक समय ऐसा भी लगा कि सऊदी अरब उस पर हमला कर देगा। यदि ऐसा हुआ होता तो अपने केवल 12 हज़ार सैनिकों के बल पर क़तर, सऊदी अरब के 2 लाख सैनिकों से लड़ नहीं पाता। क़तर के पास अपने 'भूमिपुत्र' कहलाने योग्य केवल 2.75 लाख नागरिक हैं जबकि काम-धंधे के अनुबंध पर आए विदेशी प्रवासियों की संख्या क़रीब 27 लाख है। अत: उसका मानना है कि सैन्यबल से नहीं, अपने पेट्रो डॉलरों और दुनिया को लुभाने वाली किसी चतुर रणनीति के बल पर ही वह एक ऐसा 'सॉफ्ट पॉवर,' बन सकता है, जो उसे सुरक्षा और सम्मान दिला सकेगा।
 
दुनिया को चौंका दिया
 
क़तर के लिए इस रणनीति का अर्थ है- एक बड़े पैमाने पर फुटबॉल जैसे खेलों में, विज्ञान और संस्कृति में, बड़े-बड़े संग्रहालयों और चकाचौंधी आयोजनों में पैसा लगाकर दुनिया में अपना नाम चमकाना। तेल और गैस के अपने भंडार सूखने से पहले ही विदेशी पर्यटकों, निवेशकों और कुशलकर्मियों को रिझाना। क़तर इसका आरंभ डंके की एक ऐसी चोट के साथ करना चाहता था जिससे सारी दुनिया चौंक जाए।
 
रेगिस्तानी देश क़तर में फुटबॉल की न तो कोई परंपरा थी और न ही विश्व कप लायक कोई स्टेडियम था। वहां के अमीर की सरकार ने आग में हल जोतते हुए स्टेडियमों और होटलों से लेकर हर प्रकार की सुख-सुविधाओं का धुआंधार तेज़ी से निर्माण किया। अन्य देशों से विशेषकर भारतीय उपमहाद्वीप के देशों से लाखों श्रमिकों को लुभावने वादों के साथ खून-पसीना बहने का प्रलोभन दिया और उनका जी-भरकर शोषण किया।
 
विश्व कप के लिए खेलेंगी 32 देशों की टीमें
 
2 वर्ष पूर्व क़तर ने फुटबॉल के वार्षिक 'फ़ीफ़ा क्लब विश्व-कप' का आयोजन किया और अब उसे श्रेय मिला है हर 4 वर्ष बाद होने वाले फ़ुटबॉल के 'विश्व-कप' की मेज़बानी करने का। 'फ़ीफ़ा क्लब वर्ल्ड कप' में मेज़बान देश के अलावा 6 महाद्वीपों के ऐसे 6 फुटबॉल क्लब भाग लेते हैं, जो प्रतियोगिता वाले वर्ष में अपने-अपने महाद्वीप में नंबर 1 क्लब रहे हैं। 4 वर्षीय विश्व कप के कुल 8 ग्रुपों में 4-4 देशों वाली कुल 32 देशों की राष्ट्रीय टीमें, न कि पेशेवर क्लबों की टीमें विश्व चैंपियनशिप के लिए भि़ड़ती हैं।
 
अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ 'फ़ीफ़ा' ने 19 दिसंबर 2008 को टोकियो में हुई अपनी बैठक में तय किया था कि 2018 और 2022 के विश्व कप के मेज़बान देशों का चयन एकसाथ होगा। 2 दिसंबर 2010 को स्विट्ज़रलैंड में स्थित फ़ीफ़ा के मुख्यालय में जब 2022 वाले देश के लिए मतदान की बारी आई तो मुक़ाबला अमेरिका, दक्षिण कोरिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया और क़तर के बीच था।
 
घूसख़ोरी और भ्रष्टाचार को लेकर बवाल भी हुआ
 
मतदान के चौथे दौर में 8 के बदले 14 मतों के साथ क़तर ने बाज़ी मार ली। बाद में आरोप लगे कि उस समय फ़ीफ़ा की कार्यकारिणी के कुछ लोग क़तर के हाथों बिके हुए थे तो कुछ दूसरे जर्मनी और फ्रांस की ओर से क़तर के पक्ष में वोट डालने के दबाव में थे। जर्मनी और फ्रांस की आंखें अरबों डॉलर के उन ठेकों पर थीं, जो क़तर में स्टेडियमों आदि के निर्मण से मिलते। कई जांचें और गिरफ्तारियां भी हुईं। फ़ीफ़ा के तत्कालीन अध्यक्ष को अपना पद छोड़ना पड़ा, पर सारी निंदा-आलोचना की अनदेखी करते हुए फ़ीफ़ा का निर्णय अंगद के पैर की तरह अटल रहा।
 
क़तर ने अपनी नई रणनीति के अनुसार फ्रांस में पेरिस के 'सां-जेर्मां,' जर्मनी के 'बायर्न म्युइन्शेन' या स्पेन के बार्सिलोना जैसे नामी यूरोपीय फुटबॉल क्लबों में 1 अरब डॉलर से अधिक पैसा लगा रखा है। यही कारण है कि 2020 में जब सारी दुनिया कोरोना की मार से कराह रही थी, तब क़तर ने अपने यहां क्लब-फुटबॉल के विश्व कप का बेधड़क आयोजन कर खूब वाहवाही लूटी। उसकी देखादेखी अब दुबई और अबू धाबी भी यूरोपीय फुटबॉल क्लबों में पैसा लगाने लगे हैं।
 
क़तर संसार के सबसे धनी देशों में से एक
 
1971 में ब्रिटेन से स्वतंत्रता मिलने के 50 वर्षों में ही क़तर संसार के सबसे धनी देशों में से एक बन गया है। उसके नागरिकों की प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 63 हज़ार डॉलर है- भारतीय औसत की अपेक्षा 30 गुने से भी अधिक! दूसरी ओर 'रिपोर्टर विदाउट बॉर्डर' की 180 देशों की प्रेस स्वतंत्रता सूची में क़तर 119वें स्थान पर है। वहां न तो स्वतंत्र मीडिया है और न राजनीतिक पार्टियां हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल' और 'ह्यूमन राइट्स वॉच' जैसी मानवाधिकार संस्थाएं क़तर की ही नहीं, उन यूरोपीय फुटबॉल क्लबों की भी आलोचना करती हैं, जो वहां मानवाधिकारों के हनन के प्रश्न पर अनजान बन जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल संघ फ़ीफ़ा ने भी कान में तेल डाल रखा है।
 
क़तर में काम करने वाले सबसे अधिक मज़दूर भारत के ही रहे हैं- क़रीब 6.50 लाख। उनके न केवल रहने और काम करने की परिस्थितियां ही बहुत ही घटिया रही हैं, उन्हें ठीक से वेतन या मज़दूरी भी नहीं मिलती थी। आए दिन दुर्घटनाएं होती रही हैं। सैकड़ों लोग मरते रहे हैं। पैसों के बदले उनके शव घर वालों के पास पहुंचते रहे हैं। न तो क़तर के अधिकारी कुछ जानना चाहते थे और न श्रमिकों की अपनी सरकारें कुछ सुनना चाहती थीं। 6,500 से अधिक श्रमिकों की जानें गईं।
 
ब्रिटिश दैनिक 'गॉर्डियन' ने फ़रवरी 2021 में लिखा कि 2010 में क़तर में निर्माण कार्य शुरू होने के बाद से 2020 तक वहां भारत, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका के कुल मिलाकर 6,500 से अधिक श्रमिक अपनी जान गंवा चुके थे। हर सप्ताह इन पांचों देशों के औसतन 12 श्रमिक काम करते हुए या काम से जुड़ीं दुर्घटनाओं के कारण मरे। गॉर्डियन के अनुसार 2020 तक भारत के 2,711, नेपाल के 1,641, बांग्लादेश के 1,018, पाकिस्तान के 824 और श्रीलंका के 557 नागरिक मौत के शिकार बने।
 
अनुमान है कि कुछ मौतें असह्य गर्मी, रहने की अमानवीय परिस्थितियों, महीनों वेतन या मज़दूरी नहीं मिलने की हताशा, क़तर के ठेकेदारों के दुर्व्यवहार या मानसिक आघातों के कारण भी हुई हो सकती हैं। सभी आंकड़े इन पांचों देशों के सरकारी स्रोतों द्वारा बताए गए आंकड़े हैं। असली संख्या कहीं अधिक भी हो सकती है।
 
'हृदयगति रुक जाना' एक ऐसा बहाना बन गया जिसकी आड़ लेकर क़तर में प्रवासी श्रमिकों की असमय मृत्यु का मूल कारण छिपाया जाता रहा है। क़तर का क़ानून 'हृदयगति रुक जाने' जैसे मामलों में शवपरीक्षा (पोस्टमार्टम) अनिवार्य नहीं मानता इसलिए मूल कारण का भी पता नहीं चल पाता। एक तरफ़ तो क़तर अपनी छवि चमकाने पर पानी की तरह पैसा बहा रहा था, दूसरी तरफ़ अपनी कंजूसी और निष्ठुरता द्वारा विदेशी श्रमिकों की जान ले रहा था। इसी को कहते हैं, 'हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और।'
 
जानलेवा भयंकर गर्मी
 
क़तर में गर्मी भी इतनी भयंकर पड़ती है कि उस गर्मी में काम करते हुए हृदयगति का अचानक रुक जाना (हार्टफ़ेल) भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। वैज्ञानिकों ने तापमान, हवा में नमी और धूप की तीव्रता के बीच पारस्परिक संबंधों के आधार पर उनके सम्मिलित प्रभाव का एक सूचकांक (इंडेक्स) बनाया है, जो 1950 से प्रचलित है।
 
'वेट-बल्ब ग्लोब टेम्परेचर' (WBGT) कहलाने वाले इस सूचकांक के अनुसार 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक का WBGT जीवित रहने के लिए चुनौती है। 32.5 डिग्री सेल्सियस तक का WBGT और 50 प्रतिशत आर्द्रता हर प्रकार के काम के समय स्वास्थ्य के लिए ख़तरा है। क़तर में गर्मियों में दोपहर बाद ठीक यही स्थिति होती है।
 
2009 से 2017 के बीच मृत्यु का शिकार बने 1,300 नेपली श्रमिकों की मृत्यु के प्रमाणपत्रों की जांच से पता चला कि लगभग आधी मौतों का कारण हृदयरोग बताया गया था। यह उस आयुवर्ग के लोगों के लिए वैश्विक औसत से 15 प्रतिशत अधिक था जिस आयुवर्ग के नेपाली श्रमिक रहे होंगे। इन आंकड़ों को मौसम के परिप्रेक्ष्य रखकर देखने पर सामने आया कि सर्दियों में कथित हृदयरोग वाली मौतों का अनुपात 22 प्रतिशत और गर्मियों में 58 प्रतिशत रहा है।
 
जान बचाने के उपायों की हुई अनदेखी
 
हृदयरोग संबंधी अधिकतर मौतें तब हुईं, जब WBGT के वाले नियम के अनुसार तापमान 31 डिग्री सेल्सियस से अधिक था। किंतु इसके लिए पहले से कोई हृदयरोग रहा होना ज़रूरी नहीं है। मृत्यु वास्तव में तापमान, आर्द्रता, चिलचिलाती धूप और परिश्रम के मिले-जुले प्रभाव से होती है। बहुत-सी दुर्घटनाएं भी इसी कारण हुई हो सकती हैं। क़तर के अधिकारियों ने यदि बचाव के समुचित प्रबंध किए होते तो इतने सारे लोगों की जानें नहीं जातीं।
 
जर्मनी में रेडियो-टेलीविज़न के सबसे बड़े सार्वजनिक नेटवर्क 'एआरडी' ने 5 जून 2019 को आधे घंटे का एक रिपोर्ताज प्रसारित किया। कैमरे को छिपाकर फ़िल्माए गए इस रिपोर्ताज़ में 2 नेपाली श्रमिकों ने बताया कि वे जिस कंपनी के लिए काम करते हैं, उसके मालिक ने शुरू में ही उनके पासपोर्ट अपने पास रख लिए। पासपोर्ट के बिना वे स्वदेश भी नहीं लौट सकते।
 
उनका कहना था, 'हम कुल मिलाकर 125 लोग यहां फंसे हुए हैं। बंदी बन गए हैं। कहीं आ-जा नहीं सकते। हम बस जैसे हो, तैसे अपने घर पहुंचना चाहते हैं। नेपाल में अपने परिवारों को हम फ़ोन तक नहीं कर सकते। कंपनी जब तक हमारे बक़ाया पैसे नहीं दे देती, तब तक हम कुछ भी नहीं कर सकते। हमारा बॉस बार-बार यही कह रहा है कि हम धीरज रखें, पैसा मिलेगा। हम भला कब तक धीरज रखें?
 
रहने के लिए मुर्गियों के दड़बेनुमा मकान
 
रिपोर्ताज़ बनाने वाले जर्मन पत्रकार बेंजामिन बेस्ट ने पाया कि श्रमिकों के रहने के लिए विशेष कैंप बने हुए हैं। वहां वे मुर्गियों के दड़बेनुमा ऐसे मकानों में रहते हैं जिनमें दिनदहाड़े तिलचट्टे घूमते हैं। एक ही छोटे-से कमरे में 8-8, 10-10 लोग ठूंस दिए गए हैं। 2-200 लोगों के लिए बाहर कहीं सामूहिक शौचालय हैं। उन्हें 40 डिग्री की भीषण गर्मी और असहनीय दुर्गंध के बीच जीना पड़ता है।
 
पुलिस वाले और गुप्तचर सादी पोशाक में इन जगहों पर गश्त लगाते हैं। जो कोई बिना पूर्व अनुमति के श्रमिकों का इंटरव्यू लेता या उनके आवासों में आता-जाता देखा गया, उसे तुरंत गिरफ्तार किया जा सकता है। इंटरव्यू लेने की अनुमति शायद ही किसी को मिली होगी। क़तर के 90 प्रतिशत निवासी विदेशी आप्रवासी हैं। उनमें भारतीयों का हिस्सा 31 प्रतिशत यानी लगभग एक-तिहाई के बराबर है। कुल क़रीब 7 लाख में से 3 लाख भारतीय अकेले केरल से वहां गए हैं।
 
अमेरिकी मानवाधिकार संस्था 'ह्यूमन राइट्स वॉच' की मिंकी वॉर्डन का कहना है कि 'फ़ीफ़ा' का फुटबॉल देखने में होता तो बहुत अच्छा है, लेकिन उसके तमाशों की लागत भी ख़ूब बढ़-चढ़कर ही होती है- डॉलरों के रूप में भी और मानवीय ज़िंदगियों के रूप में भी। क़तर ने 2018 तक अपने यहां काम के दौरान हुईं केवल 18 मौतें ही मानी थीं।
 
ट्रेड यूनियन बनाने की अनुमति नहीं है
 
क़तर में ऐसे श्रमिक संगठन (ट्रेड यूनियन) भी नहीं हैं, जो श्रमिकों की सुरक्षा के लिए काम करते हों। ट्रेड यूनियन बनाने की अनुमति ही नहीं है। दूसरी ओर सरकार के पास इतना पैसा ज़रूर है कि वह 2022 में फुटबॉल का विश्व कप आयोजित करने की शेखी बघारने के लिए हर सप्ताह 50 करोड़ डॉलर ख़र्च करती रही है। अब तक सैकड़ों अरब डॉलर ख़र्च कर चुकी है जबकि उन कुल क़रीब 20 लाख विदेशी श्रमिकों के भले की जिन्हें वहां बंधुआ मज़दूरों की तरह ख़ून-पसीना बहाना पड़ा है, वहां की सरकार को कोई परवाह नहीं थी।
 
भारतीय उपमहाद्वीप के श्रमिक वहां जाते थे अपने घर-परिवार के लिए कुछ पैसा कमाने। पर घर पहुंचता था पैसे के बदले अक्सर उनका शव। इसी कारण क़तर की ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबॉल संघ 'फ़ीफ़ा' की भी कुछ कम निंदा नहीं होती। 'फ़ीफ़ा' ने अपने सारे आदर्श ताक पर रखकर एक ऐसे देश को विश्व कप का आयोजक बना दिया जिसके पास धन-संपत्ति की जितनी अधिकता है, मानवीय संवेदना का उतना ही अभाव है।
 
20 नवंबर से 18 दिसंबर तक क़तर के 8 नवनिर्मित भव्य स्टेडियमों में विश्व कप के मैच खेले जाएंगे। बहुत सारी लंबी-चौड़ी बातें होंगी। पर उन बेचारे हज़ारों श्रमिकों की याद में संभवत: न तो कोई स्मारक होगा और न उन्हें कोई श्रद्धांजलि मिलेगी जिनकी इन स्टेडियमों और अन्य आलीशान अट्टालिकाओं आदि के निर्माण में असमय जानें गई हैं।
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/ विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/ विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती है।)

Edited by: Ravindra Gupta

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