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जैन धर्म में त्रिलोक तीज या रोटतीज पर्व कैसे और क्यों मनाते हैं?

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Jainism
Rot Teej Vrat: जैन धर्म में त्रिलोक तीज या रोटतीज का पर्व धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टियों से बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है, जो अक्सर गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले आता है। रोटतीज का पर्व जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांतों, तपस्या, दान और आत्मिक उन्नति को दर्शाता है।ALSO READ: पर्युषण महापर्व 2025: जानें धार्मिक महत्व और जैन धर्म के 5 मूल सिद्धांत
 
त्रिलोक तीज या रोटतीज जैन धर्म का एक विशेष आध्यात्मिक पर्व है, जो न केवल व्रत और पूजा का प्रतीक है, बल्कि जैन दर्शन की त्रिलोक रचना, कर्म सिद्धांत, और आत्मा की मुक्ति के मार्ग को भी श्रद्धापूर्वक याद करने का अवसर है। इस व्रत के दिन उपवास या रस त्यागपूर्वक अपनी शक्तिनुसार एकाशन किया जाता है।
 
व्रत और पूजा की संपूर्ण विधि: त्रिलोक तीज का व्रत तीन, बारह या चौबीस वर्षों तक किया जाता है, जो व्यक्ति की शक्ति और श्रद्धा पर निर्भर करता है। व्रत की विधि इस प्रकार है:
 
1. व्रत का संकल्प: 
• व्रत वाले दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
• मंदिरजी में जाकर पूजा स्थल पर चौबीस तीर्थंकरों के पूजन की तैयारी करें।
• हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें।
 
2. पूजा और विधान:
• इस दिन 24 तीर्थंकरों की पूजा की जाती है, जिसे 'चौबीसी विधान' भी कहते हैं। तथा पंचपरमेष्ठी विधान किया जाता है। 
• पुरुष वर्ग भगवान की प्रतिमाओं का अभिषेक करते हैं।
• मंत्र-  'ॐ ह्रीं श्री क्लीं चौबीसी व्रताय जन्म जरा मृत्यु विनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा' तथा 'ॐ ह्रीं वृषाभादि-महावीर-पर्यंत-चतुर्विशति-तीर्थंकर असि आ उसा नम: स्वाहा' मंत्रों का जाप करें।ALSO READ: पर्युषण महापर्व 2025 के शुभ अवसर पर अपनों को भेजें ये 10 शुभकामना संदेश
 
3. रोट का भोग: 
• घर में बने हुए रोट, खीर और तुरई की सब्जी का भोग अलग निकालकर उसका पूजन करके गाय को खिलाया जाता है।
 
• भोग लगाने के बाद, रोट को प्रसाद के रूप में परिवार के सभी सदस्यों और रिश्तेदार खाते हैं। 
 
4. एकासन और दान
• इस व्रत में दिन में केवल एक बार 'एकासन' किया जाता है, जिसमें केवल एक ही स्थान पर बैठकर अन्न और पानी ग्रहण किया जाता है।
 
• व्रत के दौरान निंदा का त्याग करके धर्म ध्यान में लीन रहते हैं।
 
• इस दिन जैन मंदिरों में शास्त्र दान और चतुर्विध संघ (साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका) को चार प्रकार का दान देने का भी विशेष महत्व है।
 
यह व्रत न केवल आत्मिक शुद्धि देता है, बल्कि जीवन में सुख-समृद्धि और शांति भी लाता है।
 
अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: जैन पर्युषण पर्व पर भेजें ये सुंदर 10 स्टेटस

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