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बाल कविता : टेढ़े आंगन नहीं नाचना

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव

Bear Poem
 

मार-मार कर लगा नचाने, 
पर भालू न नाचा।
जड़ा मदारी ने गुस्से में, 
उसके गाल तमाचा।
 
भालू बोला नाच नहीं,
होता है लड्डू पेड़ा।
नहीं देखते यह आंगन है, 
कितना टेढा मेढा।
 
ऐसे आंगन और नाच का, 
है संबंध पुराना।
टेढ़े आंगन नहीं नाचना,
बोल गए हैं नाना।

(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)
 

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