भोर हुई, दिन चढ़ा बांस भर, बजे नगाड़े गरमी के। गरमी है गरमी है की रट, दादा खूब लगाते। सभी लोग उनकी हां में हां, मुंडी हिला मिलाते। हुई दोपहर छत के ऊपर, शेर दहाड़े गरमी के। सत्तू घोल-घोल कर दादी, एक गंज भर लातीं। भर-भर प्लेट सभी लोगों को...