ग्रीनलैंड को लेकर चिंतित हैं वैज्ञानिक, अगर टूटा वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग तो बढ़ेगा जलवायु संकट
आर्कटिक और ग्रीनलैंड में हो रहा शोध जलवायु परिवर्तन और जेनेटिक्स जैसी सबसे बड़ी चुनौतियों से निपटने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन रिसर्चरों को डर है कि अब इस क्षेत्र में देशों के बीच होने वाला आपसी
Publish Date: Wed, 04 Feb 2026 (07:50 IST)
Updated Date: Wed, 04 Feb 2026 (08:00 IST)
मैथ्यू वार्ड आगीयूस
व्यापारिक और रक्षा संबंधी विवादों के कारण यूरोप-अमेरिका संबंधों में आई दरार अब विज्ञान के क्षेत्र पर भी असर डाल सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन मतभेदों को जल्द नहीं सुलझाया गया, तो दशकों पुरानी वैश्विक वैज्ञानिक साझेदारी खतरे में पड़ जाएगी।
पिछले 30 से भी ज्यादा सालों से, आर्कटिक के देश मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि इस क्षेत्र में हो रहे भौतिक, जैविक और सामाजिक बदलावों को समझा जा सके। 1970 के दशक के बाद से, आर्कटिक हर साल लगभग 33,000 वर्ग मील समुद्री बर्फ खो रहा है, जो कि चेक गणराज्य के कुल क्षेत्रफल के बराबर है।
यहां तक कि शीत युद्ध के दौरान भी, अमेरिका और रूस के वैज्ञानिकों ने कनाडा, डेनमार्क, नॉर्वे, आइसलैंड, फिनलैंड और स्वीडन के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर काम किया और अपने शोध साझा किए। जब शीत युद्ध खत्म हुआ, तब 1991 में 'आर्कटिक काउंसिल' की स्थापना ने इस वैज्ञानिक सहयोग को और भी मजबूत बना दिया।
हालांकि, 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो पुरानी दीवारें फिर से खड़ी हो गईं और आर्कटिक में दशकों से चल रहा साझा वैज्ञानिक काम रुक गया। अब अगर यूरोप और अमेरिका के बीच भी राजनीतिक रिश्ते खराब होते हैं, तो स्थिति और भी उलझ सकती है।
आर्कटिक और ग्रीनलैंड में शोध क्यों जरूरी है?
ग्रीनलैंड आज भले ही अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की महत्वाकांक्षाओं की वजह से चर्चा में है, लेकिन यह असल में पृथ्वी के लिए कोयले की खान में कैनरी' यानी खतरे के शुरुआती संकेत की तरह है। यह उन चुनिंदा जगहों में से एक है जो बढ़ते पर्यावरणीय खतरों का सबसे पहले और सबसे सटीक संकेत देते हैं। यह जगह दुनिया पर मंडराते खतरों की समय रहते चेतावनी देता है।
ग्रीनलैंड का लगभग 80 फीसदी हिस्सा बर्फ की एक विशाल चादर से ढका हुआ है। यह बर्फ जलवायु संकट के उस नाजुक मोड़ पर है, जहां से वापसी शायद मुमकिन नहीं है। इंसानी गतिविधियों की वजह से बढ़े कार्बन उत्सर्जन के कारण यह बर्फ अब तेजी से पिघल रही है। पिघलती बर्फ की वजह से ग्रीनलैंड के दुर्लभ खनिजों तक पहुंच आसान हो सकती है, जो संसाधन की कमी झेल रही अर्थव्यवस्थाओं के लिए फायदेमंद हो सकता है। लेकिन, अगर यह पूरी बर्फ पिघल गई, तो दुनिया भर में समुद्र का स्तर 7।4 मीटर तक बढ़ सकता है। इससे तटीय क्षेत्रों में रहने वाले करोड़ों लोगों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।
यह बर्फ शोध के लिए भी काफी अहम है। गहराई तक ड्रिल करके निकाले गए बर्फ के नमूने किसी टाइम मशीन से कम नहीं हैं। इन विशाल टुकड़ों में कैद हवा के छोटे-छोटे बुलबुले और कार्बन के कण हमें पृथ्वी के वायुमंडल के हजारों साल पुराने इतिहास की झलक दिखाते हैं। वैज्ञानिक पिछले कई दशकों से मिलकर काम कर रहे हैं, ताकि पर्यावरण में हो रहे बदलावों, बर्फ की चादरों एवं ग्लेशियरों के पिघलने, और ग्रीनलैंड के साथ-साथ पूरे आर्कटिक की जमीन और समुद्र के जटिल पारिस्थितिक तंत्र को समझा जा सके।
यह जगह कई बड़ी खोजों का गवाह रही है। जैसे, यॉर्क उल्कापिंड', जो धरती से टकराने वाली लोहे की सबसे बड़ी चट्टानों में से एक है। साथ ही, यहां मिले चुंबकीय गुणों वाले प्राचीन पत्थरों की मदद से ही 2024 में अमेरिका और ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र 37 लाख साल पुराना है। आर्कटिक क्षेत्र के मूल समुदायों की संस्कृति को संरक्षित करने और उनके स्वास्थ्य की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने के लिए सामाजिक विज्ञान और चिकित्सा शोध काफी अहम हैं। ये शोध उन समुदायों की जीवनशैली और उनकी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हैं।
मैरिबेथ मैरी, कनाडा की एनवायरनमेंटल आर्कियोलॉजिस्ट और आर्कटिक इंस्टीट्यूट ऑफ नॉर्थ अमेरिका की डायरेक्टर हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "यह सुनने में भले ही पुरानी घिसी-पिटी बात लगे, लेकिन सच यही है कि आर्कटिक में जो भी होता है, उसका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। यह मुद्दा इतना बड़ा है कि कोई भी छोटी संस्था या अकेला देश इसे अपने दम पर नहीं संभाल सकता।”
इस इलाके को लेकर चिंतित हैं वैज्ञानिक
ग्रीनलैंड पर ट्रंप का रुख फिलहाल शांत हो गया है, लेकिन वैज्ञानिक चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं। मैरी ने कहा कि ग्रीनलैंड को लेकर तनाव के कारण वैज्ञानिक समुदाय का एक हिस्सा इस इलाके में भविष्य की परियोजनाओं को लेकर सावधानी बरत रहा है। उन्होंने कहा, "हम काफी असहज महसूस कर रहे हैं।”
ध्रुवों के बारे में शोध करने वाले वैज्ञानिकों ने अपनी आंखों से देखा है कि कैसे देशों के आपसी झगड़े वैज्ञानिक शोध पर असर डाल सकते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने वैज्ञानिकों के बीच दशकों पुराने रिश्तों को खत्म कर दिया है। उनके बीच अच्छे शोध की अदला-बदली भी रुक गई है। इंटरैक्ट (INTERACT) प्रोजेक्ट इसका एक बड़ा उदाहरण है। इंटरैक्ट को पूरे आर्कटिक के लिए एक ऐसे कार्यक्रम के तौर पर बनाया गया था जो शोध को साझा करता था। इसके जरिए वैज्ञानिकों को अलग-अलग देशों में मौजूद दर्जनों शोध केंद्रों और सुविधाओं का इस्तेमाल करने की आजादी मिलती थी।
मार्गरिटा योहानसन, एक क्रायोस्फीयर वैज्ञानिक हैं और इंटेरैक्ट की कोऑर्डिनेटर थीं। अब वह स्वीडिश पोलर रिसर्च सेक्रेटेरिएट से जुड़ी हैं। उन्होंने बताया, "हमने पूरे आर्कटिक में यह संघ बनाने में कामयाबी हासिल की थी, जिसमें आर्कटिक के सभी आठ देश शामिल थे।”
यूरोपीय संघ की फंडिंग की मदद से यूरोपीय वैज्ञानिक शोध के लिए रूस जा पाते थे और रूस का डेटा भी आसानी से यूरोपीय शोध केंद्रों तक पहुंचता था। बाद में, अमेरिका और कनाडा के शोधकर्ता भी अपने यूरोपीय साथियों के साथ शोध साझा करने में सफल रहे। योहानसन ने डीडब्ल्यू को बताया, "लेकिन फिर फरवरी 2022 में स्थितियां बदल गईं और हमारे लिए उस तरह का तालमेल बनाए रखना मुमकिन नहीं रह गया।”
यूरोप के रुख की वजह से रूस के 21 रिसर्च स्टेशनों को काम से अलग कर दिया गया है, जिसका विज्ञान पर बहुत गहरा असर पड़ा है। 2025 की शुरुआत में योहानसन की एक रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे देशों की नीतियों और लोगों के निजी नैतिक फैसलों की वजह से रूसी विज्ञान को इंटरैक्ट' से बाहर कर दिया गया और साइंस डिप्लोमेसी के रास्ते बंद हो गए। योहानसन ने कहा, "अगर आप सभी रूसी स्टेशनों को हटा देते हैं, तो हमें असल में पता ही नहीं चलेगा कि आर्कटिक में क्या हो रहा है।”
वैज्ञानिक शोधों के जरिए भी मजबूत होते हैं अंतरराष्ट्रीय संबंध
इंटरैक्ट जैसे प्रोग्राम और सामान्य रूप से आर्कटिक रिसर्च, वास्तव में साइंस डिप्लोमेसी' के उदाहरण हैं। आसान शब्दों में कहें, तो यह कूटनीतिक प्रयासों के जरिए विज्ञान को बढ़ावा देने या फिर अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को मजबूत करने के लिए विज्ञान को इस्तेमाल करने का तरीका है।
पॉल बर्कमान, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े साइंस डिप्लोमैट हैं। उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि विज्ञान अलग-अलग देशों के साझा हितों को पूरा करने और उनके बीच की कड़वाहट या दुश्मनी को कम करने में मदद कर सकता है। वह आगे कहते हैं, "साइंस डिप्लोमेसी सहयोगियों और विरोधियों, दोनों के लिए समान रूप से एक ऐसा रास्ता है जिसके जरिए वे साझा हित तैयार कर सकते हैं। इसके अलावा, जरूरी मुद्दों पर अल्पकालिक से लेकर दीर्घकालिक सोच के साथ काम कर सकते हैं।”
बर्कमान ने कहा कि साइंस डिप्लोमेसी जरूरी चुनौतियों से निपटने का रास्ता दे सकती है, चाहे वह सैन्य टकराव हो या जलवायु परिवर्तन। वह बताते हैं, "आर्कटिक एक दोधारी तलवार की तरह है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां वैश्विक संघर्ष भड़क सकता है, लेकिन साथ ही यह वैश्विक शांति का स्रोत भी बन सकता है। चीन, रूस, अमेरिका, यूरोप और अब दुनिया भर के कई देशों का जिस तरह यहां जमावड़ा हो रहा है, वह आपसी बातचीत को बढ़ावा देने का एक बड़ा अवसर है।"