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बंगाल के नतीजे तय करेंगे देश की राजनीति की दिशा, ममता और भाजपा में हो रही अस्तित्व की लड़ाई

वेबदुनिया की वरिष्ठ पत्रकार और चुनाव विश्लेषक दिनेश गुप्ता से खास बातचीत

विकास सिंह

गुरुवार, 16 मई 2019 (09:01 IST)
भोपाल। 2019 का लोकसभा चुनाव अब अंतिम चरण में है। अंतिम चरण के चुनाव को लेकर भी सियासी वार पूरे उफान पर है। 19 मई को आखिरी चरण में देश की 59 लोकसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे इसके बाद सबकी निगाह 23 मई की तारीख पर टिक जाएंगी। इस बार का लोकसभा चुनाव देश भर में किन मुद्दों पर लड़ा गया और चुनाव में कौन से मुद्दे पार्टियों के लिए ट्रंप कार्ड साबित हो सकते हैं इसको लेकर वेबदुनिया ने अपनी चुनावी विश्लेषण सीरिज में मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार और चुनाव विश्लेषक दिनेश गुप्ता से खास बातचीत की।
 
बंगाल के नतीजे तय करेंगे देश की राजनीति की दिशा – लोकसभा चुनाव में बंगाल में जारी सियासी घमासान पर वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता कहते हैं कि बंगाल में आज जो वातावरण है, उससे साफ समझ में आता है कि ये बंगाल की 42 लोकसभा सीटे जीतने की जद्दोजहद है।
 
दिनेश गुप्ता कहते हैं कि 2014 की तुलना में इस बार हिंदी प्रदेशों में भाजपा के सामने अपना पिछले प्रदर्शन दोहराना बड़ी चुनौती बन गया है और पार्टी नेता इसकी भरपाई बंगाल से करने की बात कर रहे हैं। इसलिए बंगाल में लोकसभा चुनाव में इस बार सभी सियासी हथकंडे अपनाए गए और अब आखिरी दौर में ममता बनर्जी और भाजपा दोनों ही वहां अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।
 
दिनेश गुप्ता कहते हैं कि बंगाल के नतीजे देश की राजनीति का दिशा तय कर सकते हैं। अगर भाजपा ममता के गढ़ में सेंध लगाने में सफल होती है तो देश की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा और केरल के बाद बंगाल भाजपा की विचारधारा को बढ़ावा देने वाला नया राज्य बन जाएगा।
 
जनता नहीं विश्वसनीयता का मुद्दा रहा हावी – 2019 लोकसभा चुनाव जनता के मुद्दों पर नहीं होकर विश्वसनीयता के मुद्दे पर लड़ा गया, ये मानना है वरिष्ठ पत्रकार दिनेश गुप्ता का। उनका मानना है कि पूरा लोकसभा चुनाव विश्वसनीयता के मुद्दे पर लड़ा गया। कांग्रेस ने जहां चौकीदार चोर को अपने चुनावी कैंपेन का मुख्य मुद्दा बनाया तो प्रधानमंत्री मोदी समेत पूरी भाजपा के निशाने पर चुनावी कैंपेन में गांधी परिवार रहा।
 
उन्होंने कहा कि पूरे चुनाव में जनता के मूलभूत मुद्दे जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोअजगार जैसे मुद्दे गायब ही रहे। वहीं कांग्रेस ने राफेल के मुद्दे को उठाकर सीधे प्रधानमंत्री मोदी की विश्वसनीयता और ईमानदारी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की।
 
पकौड़े तलना रोजगार नहीं - गुप्ता कहते हैं कि आज मजबूरी के चलते जो लोग चाट के ठेले लगातेे हैं या पकौड़े तलते हैं, उसको प्रधानमंत्री मोदी रोजगार बताते हुए उसे अपनी उपलब्धि बताते हैं जबकि इसके पहले किसी सरकार ने ऐसा नहीं किया। अगर सरकार इसको रोजगार मानती है तो देश बहुत पहले विकसित हो चुका था। पूरे चुनाव में सरकार में काफी विरोधभास देखा गया। पूरा चुनाव भ्रम और असमंजस का वातावरण बनाकर लड़ा गया। 2019 की पूरी चुनावी तस्वीर 2014 की तुलना में बहुत अलग रही, पिछले चुनाव में केंद्र की यूपीए सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाले नरेंद्र मोदी के सामने इस बार विपक्ष को घेरने के लिए कोई बड़ा मुद्दा नहीं था।
 
मध्य प्रदेश के हर क्षेत्र में अलग-अलग मुद्दे रहे – उन्होंने कहा कि लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में कोई एक मुद्दा नहीं बना। वो कहते हैं कि चूंकि मध्य प्रदेश एक विविधता वाला प्रदेश है और यहां अलग–अलग इलाकों में अलग-अलग मुद्दे वोटरों को प्रभावित करते हुए दिखाई दिए। ग्रामीण इलाकों में राष्ट्रवाद और मोदी के चेहरे का असर दिखाई दिया तो शहरी इलाकों में इसके विपरीत माहौल देखने को मिला। 

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