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लौट आओ लिली!

विशाल मिश्रा

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आज दुनिया से आँखें कैसे मिलाऊँ। उस दुनिया से जो तुमको मेरी ताकत के रूप में जानती थी आज तुमसे बड़ी कमजोरी मेरी कोई नहीं रह गई। बस इस सवाल का जवाब दे दो मुझे मेरी नजरों में तुम्हारी कद्र और भी बढ़ जाएगी। कल तक लोग मेरी और तुम्हारी बातें करते नहीं थकते थे और जब भी मैंने उनसे बात की हर दूसरी बात में तुम ही शामिल रहीं लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि जिस लि‍ली की तरफ मैं दौड़ता-भागता हर हाल में पहुँच जाता था आज उससे कोसों दूर होता जा रहा हूँ।

कल तक जिन बाँहों में मैंने अपनी ज़िंदगी गुजारी, आज उन्हीं बाँहों ने किसी और को अपने भीतर समेट लिया। मेरा हमसफर आज आँखें फेरकर बहुत आगे बढ़ गया। न जाने वह कहाँ चला गया? जिसे मेरी नजर आज तक हर-जगह ढूँढ रही है। काश.. आज वह मेरे पास होता तो मेरी हर डगर गुलिस्ताँ थी। वह इन बाँहों और प्यार की ठंडी छाँव को छोड़कर बहुत-बहुत दूर चला गया है।

कभी तो उसका मेरी नजरों के सामने होना मुझे सुकून देता था आज कचोट रहा है। आज तुम मुझसे नजरें चुरा रही हो या मेरी कोई ऐसी खता है जो तुम मेरी तरफ देखना भी नहीं चाहतीं। मुझे कम से कम मेरी इस गलती का अहसास करा दो। मैं हर सजा के लिए तैयार हूँ लेकिन आज जो सजा भुगत रहा हूँ उसके लिए तो मेरी अंतरात्मा भी गवारा नहीं कर रही कि बगैर गलती के कैसे मैं यह दिन गुजार रहा हूँ।

तुम्हें हमारे उसी प्यार का वास्ता जो मैंने तुमसे किय ा था और यदि मेरा भ्रम नहीं तो तुमने भी मुझसे किया था। और यदि वह भ्रम था तो इसी बात का यकीन मुझे दिला दो।

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इतना मजबूर तो लिली मैंने कभी तुम्हें नहीं पाया। फिर आज क्यों? क्या मेरे प्यार से तुम्हें इतनी भी ताकत नहीं मिली कि केवल 10 मिनट का समय निकालकर यह सब बातें मुझे मिलकर या फोन पर ही बता सको। लिली इस दास्तान का अंत मैं केवल तुम्हारे मुँह से सुनना चाहता हूँ।

हालाँकि मैं जानता हूँ कि मुझे मेरी करनी की ही सजा मिली है। लिली जैसा कि तुम जानती हो मैंने अपनी पूर्व प्रेमिका डॉली को अनजाने में धोखा दिया था। यह मुझे उसी की सजा मिली है कि मैं तुमसे मिल नहीं सका। शायर की वह पंक्तियाँ याद आ जाती हैं मुझे

' आज किसी ने दिल तोड़ा तो हमको जैसे याद आया
जिसका दिल हमने तोड़ा था वो जाने कैसा होगा।'

जो गलती मैंने डॉली के समक्ष की थी वह मैं दोहराना नहीं चाहता था इसलिए मैंने तुम्हें पाने के‍ लिए अपने घर वालों से भी बगावत की। और तुम्हारी भी वह सभी बातें मानी जोकि तुम चाहती थीं। हमने कभी भागकर शादी करने की नहीं सोची। उसके लिए मैंने तुम्हें अपने माता-पिता से मिलवाया और मैं खुद तुम्हारे माता-पिता से भी मिला और अपनी शादी की बात की थी।

मुझे शिकायत तुमसे तो कभी थी ही नहीं और यकीन मानो आज भी नहीं मैं आज भी तुम्हें उतना ही चाहता हूँ जितना कि कल। लेकिन मेरे प्यार का भरम रखने के लिए ही मुझे चंद सवालों के जवाब जरूर देना, मेरी गलती जरूर बताना। नहीं तो जिंदगी भर इस बात का पछतावा मुझे रहेगा कि मैंने आखिर किस गलती की सजा भुगती।

- जॉन (जो कभी तुम्हारा था)

* रब्बा इश्क ना होवे...

घटनाक्रम कुछ ऐसा है कि जॉन और लिली दोनों एक-दूसरे को लगभग 4 वर्षों से जानते थे और दोनों के बीच लगभग 2 वर्षों से प्रेम प्रसंग चल रहा था। जॉन ने ही लिली को प्रपोज किया था जिसे लिली ने दोस्ती मानकर स्वीकार कर लिया था। धीरे-धीरे दोनों की दोस्ती प्यार में बदल गई। इस रिश्ते की कद्र करते हुए दोनों शादी के लिए सहमत हो गए। जॉन बाकायदा जाकर लिली के माता-पिता से मिला और लिली को भी अपने माता-पिता से मिलवाया। दोनों के घर वालों से भी उन्हें सहमति‍ मिली। दोनों की एक-दूसरे के घर में घनिष्ठता भी बढ़ गई।

लेकिन इसके थोड़े ही दिनों बाद लिली ने जॉन की तरफ देखना भी बंद कर दिया। करीब 3 महीने निकलने के बाद जॉन ने लिली से इस बेरुखी के बारे में जानना चाहा। लिली पहले तो टालती रही और स्पष्ट कुछ नहीं बोली। लेकिन जॉन को अपने दोस्तों से पता चला कि लिली की एंगेजमेंट किसी दूसरे शहर में रहने वाले लड़के से हो गई है और अगले माह दोनों शादी भी करने वाले हैं।

कल तक जिन बाँहों में मैंने अपनी ज़िंदगी गुजारी, आज उन्हीं बाँहों ने किसी और को अपने भीतर समेट लिया। मेरा हमसफर आज आँखें फेरकर बहुत आगे बढ़ गया। न जाने वह कहाँ चला गया? जिसे मेरी नजर आज तक हर-जगह ढूँढ रही है।
जॉन के तो जैसे पैरों तले धरती ही खिसक गई। मानो आसमान टूट पड़ा हो उसके सिर पर। फिर भी थोड़ा सँभलते हुए जब उसे विस्तार से इसके बारे में पता चला तो समझ ही नहीं पा रहा था कि अब कैसे वह इस सदमे से उबरे। हरदम हँसते-खिलतेखिलाते चेहरे का स्वामी जॉन डिप्रेशन में चला गया।

योग, आर्ट ऑफ लिविंग आदि कई चीजों की मदद से जैसे-तैसे अपने आपको सँभालते हुए अपना आगे का जीवन काट रहा है। जी हाँ, जीवन काटना ही कहूँगा क्योंकि लिली के बिना तो उसने कभी इस जीवन की कल्पना ही नहीं की थी। जिस बेवफाई के किस्से अब तक उसने किताबों में पढ़े और फिल्मों की पटकथाओं के रूप में रुपहले पर्दे पर देखे थे आज उसके जीवन की वास्तविकता बन गई थी। एक टूटे हुए व्यक्ति की भाँति अब उस पात्र को वह जी रहा था, लिली की बेवफाई को सहते हुए या डॉली की यादों के सहारे। जीवन में रिश्तों के समीकरण कब, कहाँ कैसे बदल जाते हैं कोई नहीं जानता। लेकिन यह हमारे हाथों में होता है कि रिश्तों की बुनियाद को विश्वास के जल से सींचे ताकि ना डॉली का दिल टूटे ना कोई लिली दिल तोड़ने पाए।

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