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महाभारत के दुर्योधन की 10 खास रोचक बातें

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अनिरुद्ध जोशी

कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडवों की लड़ाई में दुर्योधन कौरवों का सबसे बड़ा भाई था। दुर्योधन अधर्मी, जिद्दी और मूर्ख भी था। वह गांधारी और धृतराष्ट्र का पुत्र एवं कर्ण का मित्र था, परंतु वह अधिकतर बातें अपने मामा शकुनि की ही मानता था। दुर्योधन की जिद, अहंकार और लालच ने लोगों को यद्ध की आग में झोंक दिया था इसलिए दुर्योधन को महाभारत का खलनायक कहा जाता है। आओ जानते हैं उसके बारे में 10 रोचक बातें।
 
 
1. दुर्योधन का जन्म सौ घड़े में से पहले घड़े से हुआ था। जब दुर्योधन का जन्म हुआ तो वह रोने के बजाया गधे की तरह रेंकने लगा और जन्म लेते ही बोलने भी लगा था। दुर्योधन ने जैसे ही जन्म लिया तो कई तरह के अपशकुन देखने को मिले जैसे शियार जोर जोर से रोने लगे। उल्लू शोर मचाने लगे। आसमान में अचानक काले बादल छा गए। इन घटनाओं को देखकर विदुर ने कहा कि ये अपशकुन बता रहे हैं कि यह पुत्र हस्तिानपुर के विनाश का कारण बनेगा, इसे त्यागने में ही भलाई है, परंतु पुत्र मोह में धृतराष्ट्र और गांधारी ने ऐसा करने से मना कर दिया।
 
2. दुर्योधन को कलयुग का अवतार माना जाता है, क्योंकि दुर्योधन में वे सभी गुण मौजूद थे जो कलयुग के मनुष्‍य में होने चाहिए। इसीलिए दुर्योधन को कलयुग का अवतार कहा जाता था। कहते हैं कि दुर्योधन कलियुग का अंश था तो उसके 100 भाई पुलस्त्य वंश के राक्षस के अंश से थे। वायु पुराण (70.51.65) में राक्षसों को पुलह, पुलस्त्य, कश्यप एवं अगस्त्य ऋषि की संतान माना गया है।
 
3. दुर्योधन कुटिल, क्रूर होने के साथ ही गदा युद्ध में भी परंगत हो गया था। उसने शकुनि की चाल के तहत बलरामजी से गदा युद्ध करना सीख लिया था। महाभारत काल में बलराम, जरासंध, भीम और दुर्योधन को ही सर्वश्रेष्ठ गदाधर माना जाता था। भीम ने भी बलरामजी से गदा सीखी थी।
 
4. गांधारी ने अपनी दिव्य दृष्टि से दुर्योधन के शरीर को व्रज के समान बना दिया था परंतु श्रीकृष्‍ण की नीति के तहत दुर्योधन के गुप्तां और जंघा कठोर नहीं बन पाई थी।
 
5. दुर्योधन की मृत्यु सबसे अंत में हुई और खास बात यह कि महाभारत के 18 दिन तक चले युद्ध के अंत के बाद दुर्योधन और भीम के बीच गया युद्ध हुआ जिसमें भीम ने दुर्योधन की जंघा उखाड़कर फेंक दी थी, जिसके चलते दुर्योधन की मृत्यु हो गई थी। एक बार महर्षि मैत्रेय हस्तिनापुर पथारे। विश्राम के बाद धृतराष्ट्र ने पूछा- भगवन् वन में पांचों पांडव कुशलपूर्वक तो हैं न। महर्षि ने कहा, वे कुशल है, लेकिन मैंने सुना कि तुम्हारे पुत्रों ने पाण्डवों को जुए में धोखे से हराकर वन भेज दिया? ऐसा कहकर पीछे मुड़ते हुए उन्होंने दुर्योधन से कहा, तुम जानते हो पाण्डव कितने वीर और शक्तिशाली हैं? महर्षि की बात सुनकर दुर्योधन ने क्रोध में अपनी जांघ पर हाथ से ताल ठोंक दी। दुर्योधन की यह उद्दण्डता देखकर महर्षि को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा, तू मेरा तिरस्कार करता है, मेरी बात शांतिपूर्वक सुन नहीं सकता। जा उद्दण्डी जिस जंघा पर तू ताल ठोंक रहा है, उस जंघा को भीम अपनी गदा से तोड़ देगा। बस यही शाप दुर्योधन को ले डूबा।
 
6. रिश्तों में दुर्योधन जहां अर्जुन का सौतेला भाई था वहीं वह श्रीकृष्ण का समधी भी था। श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब ने दुर्योधन की पुत्री लक्ष्मणा से विवाह किया था। अर्जुन और श्रीकृष्ण भी आपस में भाई ही थे, क्योंकि अर्जुन श्रीकृष्ण की बुआ कुंती का लड़का था। लेकिन अर्जुन ने जब श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा से विवाह किया तो वे उनके जीजा भी बन गए थे। 
 
7. दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए सबसे पहले भीम को जहर देकर नदी में फिंकवा दिया था लेकिन भीम बच गए थे। फिर दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए वारणावत में लक्ष्यागृह का निर्माण कराया वहां से भी पांडव बचकर निकल गए थे। फिर पांडवों के वनवास होने के बाद अज्ञातवास में दुर्योधन जंगल जंगल पांहवों को ढूंढने के लिए अपनी सेनाएं भेजता रहता था। दुर्योधन ने शकुनि की कुटिल नीति के चलते ही पांडवों के मामा शल्य को अपनी ओर से युद्ध लड़ने के लिए राजी कर लिया था। 
 
8. महाभारत की कथा में ऐसा प्रसंग भी आया है कि दुर्योधन ने काम-पीड़ित होकर कुंवारी कन्याओं का अपहरण किया था। द्यूतक्रीड़ा में पांडवों के हार जाने पर जब दुर्योधन भरी सभा में द्रौपदी का का अपमान कर रहा था, तब गांधारी ने भी इसका विरोध किया था फिर भी दुर्योधन नहीं माना था। यह आचरण धर्म-विरुद्ध ही तो था। जब दुर्योधन को लगा कि अब तो युद्ध होने वाला है तो वह महाभारत युद्ध के अंतिम समय में अपनी माता के समक्ष नग्न खड़ा होने के लिए भी तैयार हो गया। महाभारत में दुर्योधन के अनाचार और अत्याचार के किस्से भरे पड़े हैं। 
 
9. पांडवों और कौरवों द्वारा यादवों से सहायता मांगने पर श्रीकृष्ण ने पहले तो युद्ध में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की और फिर कहा कि एक तरफ मैं अकेला और दूसरी तरफ मेरी एक अक्षौहिणी नारायणी सेना होगी। अब अर्जुन व दुर्योधन को इनमें से एक का चुनाव करना था। अर्जुन ने तो श्रीकृष्ण को ही चुना, तब श्रीकृष्ण ने अपनी एक अक्षौहिणी सेना दुर्योधन को दे दी और खुद अर्जुन का सारथी बनना स्वीकार किया। इस प्रकार दुर्योधन ने 11 अक्षौहिणी तथा पांडवों ने 7 अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर ली।
 
10. दुर्योधन की पत्नी का नाम भानुमति था जो मल्ल और द्वंद्व युद्ध में पारंगत थी और वह दुर्योधन के साथ अखाड़े में कुश्ती लड़ती थी। दुर्योधन ने भानुमती के साथ जबरन विवाह किया था। गंधारी ने सती पर्व में बताया है की भानुमती दुर्योधन से खेल-खेल में ही कुश्ती करती थी जिसमें दुर्योधन उससे कई बार हार भी जाता था। भले ही दुर्योधन भानुमति को हरण करके लाया था लेकिन भानुमति को दुर्योधन से प्यार हो गया था। भानुमति को दुर्योधन और पुत्र लक्ष्मण की मौत का गहरा धक्का लगा था। उससे सांत्वना देने वाला कोई नहीं बचा था। अंत में वह बिचारी पांडवों के आश्रय पर जिंदा रही और बड़ी मुश्किल से जीवन गुजारा। दुर्योधन की बहन का नाम दुश्शला था जिसका विवाह सिंधु नरेश जयद्रथ से हुआ था। 

10. कौरवों की सेना सभी तरह के शक्तिशाली थी। एक से बढ़कर एक महारथी थे परंतु फिर भी सभी हार गए और इसका एकमात्र कारण दुर्योधन ही था, क्योंकि उसने सही समय पर सही निर्णय नहीं लिया और कई तर की गलतियां की। पहली गलती उसने श्रीकृष्‍ण की बजाया नारायणी सेना मांगकर की। दूसरी गलती उसने भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य की बातों पर ध्यान नहीं दिया। भीष्म ने उसे पांच सोने के तीर दिए थे और कहा था कि कल सुबह में इन तीसरों से पांचों पांडवों का वध कर दूंगा। दुर्योधन वह तीर अपने पास रख लिए और अर्जुन के वरदान मांगने पर उसे दे दिए। चौथी चूक उसने कर्ण से कहा कि घटोत्कच को मार दो और कर्ण ने अपना अचूक अमोघ अस्त्र घटोत्कच पर चलाकर अपनी शक्ति खो दी। पांचवीं चूक उसने यह की कि जयद्रथ को वह उचित सुरक्षा नहीं दे पाया और छठी चूक यह की कि उसने उचित समय पर अश्‍वत्‍थामा को सेनापति नहीं बनाया अन्यथा युद्ध का परिणाम कुछ और ही होता।

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