Hanuman Chalisa

इन पांच गांवों के कारण हुआ था पांडव और कौरवों में महाभारत का युद्ध

अनिरुद्ध जोशी
कुरु देश की राजधानी थी हस्तिनापुर। उत्तरप्रदेश के मेरठ का क्षेत्र उस काल में हस्तिनापुर कहलाता था। कुरुवंश के राजा हस्ति ने यह शहर बसाया था। यह स्थान चन्द्रवंशी राजाओं की राजधानी थी। कहते हैं कि एक जलप्रलय के कारण जब इन्द्रप्रस्थ डूब गया तब राजा हस्ति ने यह नई राजधानी बनाई थी।
 
 
महाभारत का युद्ध कई कारणों से हुआ था जिसमें सबसे बड़ा कारण भूमि या राज्य बंटवारे को लेकर था। बहुत दिनों की कशमकश के बाद भी जब कोई हल नहीं निकला तो फिर द्युतक्रीड़ा का आयोजन किया गया। द्युतक्रीड़ा में पांडव इन्द्रप्रस्थ सहित सबकुछ हार गए, अपमान सहना पड़ा, द्रौपदी का चीरहरण हुआ और अंतत: उनको 12 वर्ष का वनवास मिला। वनवास काल में कई राजाओं से मैत्री कर पांडवों ने अपनी शक्ति को बढ़ाया और कौरवों से युद्ध करने की ठानी।
 
 
वनवास काल खत्म होने के बाद दुर्योधन के पास यह प्रस्ताव भिजवाया गया कि अगर वे राज्य का बंटवारा चाहते हैं तो बंटवारे में हस्तिनापुर की राजगद्दी पर अपना दावा छोड़ देंगे।
 
युद्ध की आहट जानकर सभी राजाओं ने भी अपना अपना पक्ष तय कर लिया। अंत में दुर्योधन और अर्जुन ने श्रीकृष्ण से सहायता मांगी। दोनों जब सहायता मांगने श्रीकृष्ण के पास पहुंचे तब वे बिस्तर पर सो रहे थे। उनके पैरों के समक्ष अर्जुन और सिर के समक्ष दुर्योधन बैठ गए थे। जब श्रीकृष्ण जागे तो उन्होंने सर्वप्रथम अपने पैरों की तरफ बैठे अर्जुन को देखा इसलिए उन्होंने अर्जुन को उसका अनुरोध सुनने का अधिकार दिया।
 
 
श्रीकृष्ण ने अर्जुन और दुर्योधन दोनों को ही संबोधित करते हुए कहा कि जैसा कि तुम जानते हो कि मेरे पास नारायणी नामक वीरों की सेना है लेकिन मेरे लिए तुम दोनों एक समान हो इसलिए मैं ये प्रतिज्ञा लेता हूं कि युद्ध में कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं उठाऊंगा और एक सेना में मैं अकेला नि:शस्त्र रहूंगा और दुसरी तरफ मेरी नारायणी सेना रहेगी इसलिए अर्जुन मैं तुमको चुनाव का पहला मौका देता हूं कि तुम मुझे या मेरी नारायणी सेना में से किसी एक को चुन लो।
 
 
श्रीकृष्ण की यह बात सुनकर दुर्योधन घबरा गया। वह सोचने लगा कि निश्चित ही अर्जुन तो नारायणी सेना मांग लेगा, जो कि बहुत ही शक्तिशाली है। यदि ऐसा हुआ तो मैं नि:शस्त्र श्रीकृष्ण का क्या करूंगा? वह यह सोच ही रहा था कि अर्जुन ने बड़ी विनम्रता से श्रीकृष्ण से कहा कि आप चाहे कोई शस्त्र उठाए या न उठाएं, आप चाहे लड़ें या न लड़ें, लेकिन आपसे विन्रम विनती है कि मैं आपको ही अपनी सेना में चाहता हूं। यह सुनकर दुर्योधन मन ही मन खुश हो गया।
 
 
इतना सबकुछ हो जाने के बाद भीष्म पितामह के कहने पर धृतराष्ट्र ने संजय को दूत बनाकर पांड्वों से मित्रता और संधि का प्रस्ताव देकर भेजा। संजय ने उपलव्यनगर जाकर युधिष्ठिर से मुलाकात की और संधि का प्रस्ताव रखा। युधिष्ठिर तो यही चाहते थे कि युद्ध न हो। फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण की सलाह लेना उचित समझा और पांडवों की ओर से शांतिदूत बनाकर श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर भेजा। उसने संजय को ये कहकर भेजा कि यदि वो उनको केवल 5 गांव ही दे दे तो वे संतोष कर लेंगे और संधि कर लेंगे।
 
 
राजदूत संजय के साथ श्रीकृष्ण हस्तिनापुर के लिए रवाना हो गए। वहां श्रीकृष्ण ने पांडवों को संधि प्रस्ताव की शर्त को रखा। दुर्योधन ने अपने पिता को संधि प्रस्ताव स्वीकार करने से रोकते हुए कहा कि पिताश्री आप पांडवों की चाल समझे नहीं, वे हमारी विशाल सेना से डर गए हैं इसलिए केवल 5 गांव मांग रहे हैं और अब हम युद्ध से पीछे नहीं हटेंगे।
 
सभा में श्रीकृष्ण बोले, हे राजन! आप जानते हैं कि पांडव शांतिप्रिय हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि वे युद्ध के लिए तैयार नहीं हैं। पांडव आपको पितास्वरूप मानते हैं इसलिए आप ही उचित फैसला लें...। श्रीकृष्ण ने अपनी बात जारी रखते हुए दुर्योधन से कहा कि दुर्योधन मैं तो केवल इतना चाहता हुं कि तुम पांडवों को आधा राज्य लौटकर उनसे संधि कर लो, अगर ये शर्त तुम मान लो तो पांडव तुम्हें युवराज के रूप में स्वीकार कर लेंगे।
 

धृतराष्ट्र ने समझाया कि पुत्र, यदि केवल 5 गांव देने से युद्ध टलता है, तो इससे बेहतर क्या हो सकता है इसलिए अपनी हठ छोड़कर पांडवों से संधि कर लो ताकि ये विनाश टल जाए। दुर्योधन अब गुस्से में आकर बोला कि पिताश्री, मैं एक तिनके की भी भूमि उन पांडवों को नहीं दूंगा और अब फैसला केवल रणभूमि में ही होगा।
 
धृतराष्ट्र के बाद भीष्म पितामह और गुरु द्रोण ने भी दुर्योधन को समझाया लेकिन वो अपनी हठ पर अड़ा रहा और उसने अपनी मां गांधारी की बात भी नहीं मानी। तब शांतिदूत बने श्रीकृष्ण को ज्ञात हो गया कि अब शांति स्थापना की सभावना लुप्त हो चुकी है और वो वापस उपलव्यनगर लौट आए।
 
 
ये पांच गांव निम्न थे-
श्रीपत (सिही) या इन्द्रप्रस्थ : कहीं-कहीं श्रीपत और कहीं-कहीं इन्द्रप्रस्थ का उल्लेख मिलता है। मौजूदा समय में दक्षिण दिल्ली के इस इलाके का वर्णन महाभारत में इन्द्रप्रस्थ के रूप में है। पांडवों और कौरवों के बीच जब संबंध खराब हुए थे, तो धृतराष्ट्र ने यमुना के किनारे खांडवप्रस्थ क्षेत्र को पांडवों को देकर अलग कर दिया था। यह क्षेत्र उजाड़ और दुर्गम था लेकिन पांडवों ने मयासुर के सहयोग से इसे आबाद कर दिया था। इसी खांडव क्षेत्र को आबाद कर पांडवों ने मयासुर से यहां एक किला और उसमें महल बनवाया था। इस क्षेत्र का नाम उन्होंने इन्द्रप्रस्थ रखा था।
 
बागपत : इसे महाभारत काल में व्याघ्रप्रस्थ कहा जाता था। व्याघ्रप्रस्थ यानी बाघों के रहने की जगह। यहां सैकड़ों साल पहले से बाघ पाए जाते रहे हैं। यही जगह मुगलकाल से बागपत के नाम से जाना जाने लगा। यह उत्तरप्रदेश का एक जिला है। बागपत ही वह जगह है, जहां कौरवों ने लाक्षागृह बनवाकर उसमें पांडवों को जलाने की कोशिश की थी।
 
सोनीपत : सोनीपत को पहले स्वर्णप्रस्थ कहा जाता था। बाद में यह 'सोनप्रस्थ' होकर सोनीपत हो गया। स्वर्णपथ का मतलब 'सोने का शहर'।
 
 
पानीपत : पानीपत को पांडुप्रस्थ कहा जाता था। भारतीय इतिहास में यह जगह बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां 3 बड़ी लड़ाइयां लड़ी गईं। इसी पानीपत के पास कुरुक्षेत्र है, जहां महाभारत की लड़ाई हुई। पानीपत राजधानी नई दिल्ली से 90 किलोमीटर उत्तर में है। इसे 'सिटी ऑफ वीबर' यानी 'बुनकरों का शहर' भी कहा जाता है।
 
 
तिलपत : तिलपत को पहले तिलप्रस्थ कहा जाता था। यह हरियाणा के फरीदाबाद जिले का एक कस्बा है। 
 

वेबदुनिया पर पढ़ें

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

2026 का दूसरा चंद्र ग्रहण कब लगेगा? 5 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान

ज्योतिषीय भविष्यवाणी: शनि के रेवती नक्षत्र में आते ही बदल सकते हैं देश के हालात

2026 में दुर्लभ संयोग 2 ज्येष्ठ माह, 5 राशियों की चमकेगी किस्मत, भारत में होंगी 3 बड़ी घटनाएं

2026 का दूसरा सूर्य ग्रहण कब लगेगा? 5 राशियों पर अशुभ असर, 3 की चमकेगी किस्मत, जानें तारीख और उपाय

Nautapa 2026: नौतपा क्या है? जानें इसके कारण और लक्षण

सभी देखें

धर्म संसार

Guru Pradosh Vrat 2026: गुरु प्रदोष का व्रत रखने का महत्व और विधि

Achala Ekadashi 2026: अचला एकादशी व्रत का समय, पूजा और पारण विधि

Aaj Ka Rashifal: आज का दैनिक राशिफल: मेष से मीन तक 12 राशियों का राशिफल (13 मई, 2026)

13 May Birthday: आपको 13 मई, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 13 मई 2026: बुधवार का पंचांग और शुभ समय

अगला लेख