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डिजिटल हिंसा का ये नकारात्मक दौर

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डॉ. छाया मंगल मिश्र

बचपन में कुट्टी/कट्टी-पुच्ची का मासूमियत से भरा हुआ खेला चला करता। किसी बात से नाराज हो जाते तो दांतों के बीच में अंगूठा के कोने को लगा कर सामने वाले की ओर पूरी ताकत से बाहर की तरफ खींच कर कुट्टी/कट्टी की जाती। जिसका मतलब बात नहीं करना है और हाथों की दो उंगलियों को सामने वाले की दो उंगलियों से आड़ा-खड़ा स्पर्श करा कर के पुच्ची हो जाती। मतलब बात-चीत जारी रहेगी। शायद ही कोई ऐसा बचपन होगा जिसने ये न किया हो।  
 
अब डिजिटल युग है। आभासी दुनिया। तो बातचीत, संबंध, अभिव्यक्ति सभी डिजिटल की मोहताज हो चलीं। पारिवारिक संबंध, सामाजिक, पेशेवर संबंध भी इससे तगड़े प्रभावित हुए। देश की सरकारें बदलने की ताकत रखने वाला ये डिजिटल युग अपने नए नए रूप दिखा रहा है। एकल-संयुक्त परिवारों से लेकर प्रजातंत्र के चारों खंभों पर इसी की नक्काशी हो रही है। बात करें व्हाट्स अप ग्रुप्स की तो उसमें भी किसने क्या किया की प्रतिक्रिया के साथ राग-द्वेष, जलन-दुलार, प्रताड़ना-अपमान, तारीफ-जलालत, दोहरा व्यवहार भी पूरी नफरत और प्यार के साथ प्रदर्शित होता है....  
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इनमें आह-वाह और धिक्-धिक् करने वाले लोगों का अच्छा खासा जमावड़ा होता है। इसमें गिद्ध प्रजाति के इंसान भी होते हैं तो आत्ममुग्ध मियांमिट्ठू किस्म भी होती है। मान-अपमान के रंग में रंगे ये ग्रुप एक दूसरे पर अमृत और विष की बौछारें लगातार करते रहता है। शुभकामनाओं, बधाई के संदेशों तक में इनकी झलक होती है। 
 
कुछ को तो ग्रुप में केवल दरार डालने का ही काम होता है।  गलत फहमियां पैदा करना इनका शौक होता है। अच्छे-खासे संबंधों में आग लगाने का हुनर ये खूब जानते हैं। इससे बढ़कर “यदि आप ओहदे पर हैं तो मातहतों की “डिजिटल चापलूसी” भी निरंतर जरुरी है। कुछ केवल ‘खदेड़ने’ का काम करते हैं। कुछ को ज्ञान गंगा बहाना, सुविचार पेलना, आदर्श झाड़ना, और खुद को सर्व श्रेष्ठ दर्शाने की लाइलाज बीमारी हुई होती है जिसका कि उनके वास्तविक व्यक्तित्व और जीवन से कोई लेना देना ही नहीं होता केवल दूसरों को बांटने के अलावा।  पल-पल की खबर, पंचायत, निंदा स्तुति, बैर-भावों के पुलिंदों को इसकी जरुरत ज्यादा पड़ती है। क्योंकि इन्हें जीने के लिए एक छद्म आवरण की आवश्यकता होती है। अपने चरित्र की सड़ांध जो छुपानी होती है। 
 
यही हाल फेसबुक का है। यहां भी ऐसी ही तीरंदाजी होती है। आपके घर परिवार के लोग, रिश्तेदार इस पर खूब नजर रखते हैं। रिश्तेदारों की तो शिकारी प्रवृत्ति इस पर खूब दिखती है। यदि उन्हें ‘एड’ करो तो दिक्कत न करो तो दिक्कत। फिर वो अपना कुचक्र रचते हैं। इसमें आपके ‘निंदक-प्रशंसक’ दोनों खूब भूमिका निभाते हैं। 
 
 दुनिया जहान आपके आलेख, लेखन, फोटो अन्य रचनात्मक कार्यों की कायल हो पर मजाल है जो इनके ‘लाईक-कमेंट’ आपके लिए तारीफ में छूट जाएं। ऐसा नहीं है कि इन्हें नहीं दिख रहे। “अहो रूपम् अहो ध्वनि” के ये अनुयायी  आपके साथ के अन्य और आस पास के सभी मित्रगणों पर ‘कृपा’ बरसा रहे होते है’ ताकि आपको ये अपनी शिकायत, नाराजी, महत्व बता सकें और आपकी अवहेलना व नजरंदाजी का कोई मौका न छूटने पाए। आपकी रचनात्मकता, सकारात्मकता उनके लिए तेजाब का काम करती है जिसकी जलन से वे विचलित हो कर “डिजिटल हिंसा” के वे सब अस्त्र-शस्त्र अपनाते हैं जो उनके बूते  और बूते के बाहर होते हैं। 
 
“कमर के नीचे” भी वे वार करने से नहीं कतराते। अपने जीवन के अमूल्य पलों को वे इन सभी नक्कार कर्मों में झोंकते खर्च करते हैं। निजी जीवन को सार्वजनिक करते ये डिजिटल टूल्स किस स्तर पर जा कर रुकेंगे कोई नहीं जानता। रिश्तों की खटास मिठास को दुश्मनी और नफरत में बदलने का काम भी कर रहे हैं। इसकी जो मार है वो घाव भले ही नहीं करती पर नसों में द्वेष का जहर घोलती है जो सीधे ‘हृदयाघात’ का कारण बनता है। हिंसा का ये नया रूप बड़ा खतरनाक है।  कोरोना से भी ज्यादा। इसका कोई वेक्सिन नहीं है क्योंकि ये वास्तविक नहीं आभासी जो है...  
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