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ललित निबंध : स्मृति, तुम्हारा स्मरण रहे..!

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शैली बक्षी खड़कोतकर

स्मृति क्या है?
 
अतीत की खिड़की से झांकते विभिन्न रंग-रूपों वाले चेहरे? प्रत्येक चेहरे पर समय ने अपनी छाप छोड़ी है। काल के कलाकार ने हर चेहरे को अपनी छैनी-हथौड़ी से मनचाहा आकार दिया है और विविध रंग भर दिए। इन स्मृति प्रतिमाओं में से कुछ अब बिलकुल जर्जर हो गई हैं, उनके रंग भी फीके हो चले हैं। लेकिन कुछ अभी भी उतनी ही जीवंत और सुंदर है, जितनी वर्षों पहले थीं। 
 
या कोई मनमौजी अवधूत? जब उनके प्रति जरा भी श्रद्धा न हो, तो अपनी भव्य-दिव्य मूर्ति लिए अकस्मात् आ खड़े हो दुवारे और जब आस्था जागने लगे तो जा बैठे किसी निर्जन वन में और व्याकुल मन वर्षों तक उनके पावन दर्शनों को तरसता रहे। 
 
या फिर मुक्त गगन प्रांगण में अठखेलियां करते नटखट बादल? कभी काजल से भी कजरारे और कभी नन्हें खरगोश से भी शुभ्र और कोमल। कभी तेजस्वी सूर्य को ढंककर दिन में रात का आभास करा देने वाले हठीले बादल और कभी सावन की सुहानी साँझ रिमझिम बरसते सलौने बादल। 
 
ऐसी ही होती है न, स्मृतियां? सजीव या खंडित प्रतिमाओं जैसी, मनमौजी अवधूत जैसी, नटखट बादलों जैसी!
 
पर कौन गढ़ता है इन्हें? हम स्वयं नहीं जानते कि कब कौन-सी बात स्मृति-पटल पर अंकित हो जाती है और जाने किस मोड़ पर ये बावरी दबे पांव हमारी पथ-सखी बन जाती है। बेटा जब दूर देश की यात्रा के लिए निकलता है, तो मां सजल नेत्रों से प्रेम-पगा कलेवा बांध उसे विदा करती है। परदेस में थका-हारा बेटा अपनी पोटली खोलता है, मां के वात्सल्य भरे स्पर्श को अनुभव करता है और यात्रा के सारे कष्ट भूल जाता है।

इसी तरह जीवन-पथ पर निरंतर चलता पथिक, जब किसी पड़ाव पर क्षण भर विश्रांति के बाद विदा लेता होगा तो आदि मां चुपके से उसके संग स्मृतियों का कलेवा बांध देती होगी। दुखों के हिमालय और परेशानियों के महासागर लांघते-लांघते थका मन जब एकांतिक सुख की चाह में आंखे मूंदता है, तब यह पोटली खुल जाती है और पंखुरी-पंखुरी बिखर जाती हैं, स्मृतियां।
 
 और स्मृतियां भी तो कितनी! कोई पहाड़ी झरने जैसी इठलाती, तो कोई बाढ़ सी उफनती, कोई ईश-नाम की तरह पावन, तो कोई अभिशप्त आत्मा के समान भयावह। दुखद स्मृतियों से मन बार-बार आहत होता है लेकिन ये पीछा नहीं छोड़तीं। बल्कि ये ही ज्यादा स्पष्ट और ताज़ा बनी रहती हैं और जिन रेशमी स्मृतियों को मन सहेजना चाहता है, वे कब धुंधली पड़ जाती हैं, पता भी नहीं चलता।

किसी दिन फुरसत में इन्हें धूप दिखाने निकालो तो बस रेशे हाथ आते हैं। कुछ स्मृतियां तो ऐसे गायब हो जाती हैं कि कोई अवशेष बाकी नहीं रहता और फिर अचानक कभी रूठे पाहुने की तरह मन की चौखट पर आ खड़ी होती हैं, द्वारचार की अपेक्षा लिए और मन उल्लास से भर उठता है।
 
मन तो जब चाहे, स्मृति के जादुई पंख लगा, अतीत की दिशा में उड़ जाता है। समय के निर्मम चक्र के पास स्मृतियों के देश का पता नहीं होता, इसलिए यहां कुछ नहीं बदला। सब कुछ वैसा ही है। बिटिया के तेल लगे बालों में लाल रिबिन के फुंदने बांध बिलैया लेती मां है, कंधे पर बैठाकर मेला घुमाते पिता हैं, सुनहले बालों वाली गुड़िया है, छोटा राजू है, उसका लंगड़ा-काना गुड्डा है, जिससे वह गुड़िया को ब्याहना चाहता है, कागज की नाव है, पांच पैसे की चार वाली खट्टी-मीठी गोलियां हैं।......फिर, साइकल सीखते समय फूटे हुए घुटने और महसूस न होता हुआ दर्द, गणित के कठिन सवाल, हर साल छोटे होते फ्रॉक....फिर दर्पण के मूक आमंत्रण, कॉलेज के पेड़ों पर खुदे नाम, मंच और तालियों से जुड़ता रिश्ता, शब्दों और अर्थों में उलझता मन और फिर.....
 
स्मृतियों को उड़ान को हर बार अधूरा छोड़ लौट आना पड़ता है, यथार्थ के ठोस धरातल पर। अतीतजीवी होना मनुष्य का स्वभाव है, लेकिन कभी-कभी आशंका होती है, क्या औचित्य है इसका, कहीं ये पलायन तो नहीं? कुछ स्मृतियां तो इतनी कटु होती हैं कि शूल सी चुभती हैं, लहूलुहान कर देती हैं। पर यही अपनी भूलों का अहसास भी कराती हैं। इमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो ये सबसे निष्पक्ष न्याय-व्यवस्था हो सकती है। और मधुर स्मृतियों की तो बात ही क्या? ये तो हर व्यक्ति की निजी संपदा है। हम किसी के कितने निकट है, इसे जांचना हो तो पूछिए कि उसने हमारे साथ कितनी स्मृतियां साझा की हैं? क्योंकि स्मृतियों की दुनिया बड़ी निराली है और उतनी ही आत्मकेंद्रित। यदि कोई आपसे सपने साझा करता है तो वह आपसे उम्मीद रखता है पर कोई आपको अपनी स्मृतियां सौंपता है, तो वह आप पर भरोसा करता है। 
 
आज की तेज रफ़्तार जिंदगी में स्मृतियों को समेटने का धैर्य और उन्हें पलटकर देख लेने की फुरसत कम ही है। सपनों का आकार वृहद होता जा रहा है और स्मृतियां सिकुड़ती जा रही हैं। लेकिन जब जीवन वृत्त पूर्णता की ओर बढ़ता है, तो मन अवश्य पीछे मुड़कर देखता है और तब स्मृतियों की फुलवारी की जगह वीरान मरुस्थल नजर आए तो कैसा लगेगा? स्मृतियां, दरअसल वे जड़े हैं, जो हमें अपनी मिट्टी से जोड़े रखती हैं, इनके होते आधारहीन होने का खतरा नहीं होता। अपनी क्षमता और सीमाओं का भान नहीं बिसूरता। अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने में जिन पड़ावों ने आश्रय दिया, उनके प्रति कृतज्ञता भाव नहीं चूकता।  
 
उम्र के साथ विस्मृति का अंदेशा होना सबसे बड़ा डर है। बुढ़ापे में स्मरणशक्ति साथ न रहे तो क्या अवस्था होगी, यह चिंता स्वाभाविक है। पर विस्मृति ही तो पूरे मानव जीवन की विडंबना है। संसार में रहने के लिए स्मृति चाहिए तो मुक्ति का मार्ग भी स्मरण में ही निहित है। हम भुला बैठे है, अपने-आप को, इसीलिए तो सारी उलझनें हैं। जिसने वह चेतना, वह स्मृति खोज ली, फिर किसी विस्मरण का भय नहीं रह जाएगा। उस दिन, उस क्षण बाकी किसी स्मृति के लिए न मोह रहेगा, न द्वेष बचेगा। तभी तो कबीर कहते हैं,
 
                      क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांह।
                      सांस-सांस सुमिरन करो और यतन कुछ नांह।। 
 
स्मृति के उस उच्चतम बिंदु को साधना ही हम सबका साझा लक्ष्य हो, जहां स्मृति में रहे राम, राम में ही बस जाए प्राण।

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