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डोर रिश्तों की : एक रिश्ता जो दम तोड़ चुका था

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डॉ. छाया मंगल मिश्र

चानी के बेटे किशु का आई.आई. टी. में सिलेक्शन हुआ। भुवनेश्वर का कोई कॉलेज मिला। चानी ने याद किया कि कोई अपना है क्या वहां। एकदम से खुश हो गई कि वहां तो उसकी एक बुआ है। और निश्चिंत हो गई ये सोच कर कि सोड़ी बुआ से इतना प्यार और लगाव रहा है तो वह जरूर मदद कर देंगी। 
 
बार-बार बड़े उत्साह से पति और बेटे को अपनी और बुआ की अंतरंगता और प्रेम भरे रिश्तों को बखानती रही। बताती रही कि सगा रिश्ता नहीं था फिर भी सगों से बढ़ कर था। बुआ के दो कमरों का घर था और हमारा चार कमरों का। बुआ के घर सदस्य ज्यादा हमारे यहां हम चार ही। इसलिए बुआ पूरे समय हमारे ही घर रहती। कई बार तो सुबह नहाने से ले कर सोने तक का काम हमारे यहां ही करती थी। 
 
जब तक हम समझदार नहीं हुए, हमें तो पता ही नहीं था कि ये हमारी सगी बुआ नहीं हैं। पापा-मम्मी ने भी कभी ऐसा व्यवहार नहीं किया था।हम सभी के रिश्ते बिना लाग-लपेट के थे, पूरे अधिकार के साथ। एक दिन ऐसा नहीं जाता होगा जब एक दूसरे के घर से दाल सब्जी की कटोरियों का लेन-देन न होता हो। त्यौहारों पर तो सब एक ही जगह रहते। ये सारी बातें तब की हैं जब मीठा प्रेम ही रिश्ते में हुआ करता था और अपनापन उसकी बरक। 
 
संवेदना और सम्मान की केसर व इलाइची सी महक हुआ करती थी।सभी अपनी कम आय में सीमित खर्चों के साथ निम्न मध्यवर्गीय जीवन जी रहे थे। बड़ी मुश्किल से अपनी जरूरतों की पूर्ति कर पाते थे।एक दूसरे के सहयोग से ही समय काट रहे थे।चॉल और बाड़े से घर जिनमें संयुक्त शौचालय।पति और बेटे को भी इस रिश्ते से ठीक लगा। इतना प्यार और अपनापन रहा है तो परेशानी नहीं होगी। 
 
चानी ने सोड़ी का कॉन्टेक्ट नंबर जुटाया, बात की और बड़ी खुश हो फ्लाइट बुक की। सोड़ी ने आश्वासन दिया था कि वो सब आ जाएं।हम सब सम्हाल लेंगे। जितनी होगी मदद कर देंगी। हालांकि जब तक सभी की शादी नहीं हुई तब तक सभी साथ में रहे। फुफाजी भी यानि सोड़ी के पति भी बड़े करीब से चानी को व उसके परिवार को जानते थे। क्योंकि जब भी इंदौर आते एक समय का खाना और सोना, जगह न होने से चानी के घर ही करते। 
 
फिर उनकी जब बेटी हुई तब कहीं भी घूमने जाते तो उन्हीं के घर छोड़कर मजे से घूमते फिरते। उसने बात की बुआ से कि अनजान जगह है आप किसी अच्छी सी जगह देख कर, दो दिन हम रूक सकें, ऐसी कोई व्यवस्था करवा देना। निश्चित समय पर तय जगह पर चानी अपने पति और बेटे के साथ पुरानी बातों को दोहराती बड़ी प्रसन्नता से पहुंची।
 
वो जगह एक लोकल सी सस्ती लॉज थी। गंदगी और कॉकरोचों के साथ दिन में भी मच्छरों की भुनभुनाहट कानों में गूंज रही थी। बेहद गंदगी से भरा बाथरूम। चानी का मुंह उतर गया। उसके पति और बेटे उसे देख रहे थे।पूरे समय अपने वैभव का दिखावा करने में सोड़ी का ध्यान था।
 
चानी बेहद शर्मिंदा थी। पति-बेटे से नजर नहीं मिला पा रही थी। इस बोझिल वातावरण में सोड़ी का पति सरकारी लोकल बस के तीन टिकट ले कर आ धमका जिससे उन्हें बेटे के कॉलेज तक पहुंचना था।सोड़ी और उसके पति ने एक बार भी उन्हें अपने घर चलने का आग्रह तक नहीं किया।
 
चानी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। रुआंसी हो पति की ओर देखा। उसने भांप लिया कि चानी का दिल बहुत दुःखी और अपमान से आहत है। सम्हालने के उद्देश्य से बोला कि बुआ हम फ्लाईट से थक गए हैं सो निजी वाहन सुविधा जनक होगा। मिलने मिलाने की औपचारिकता से दूर, तुरंत उसका पति वो टिकट लौटाने दौड़ पड़ा। 
 
चानी ने भरे गले से पूछ ही डाला कि बुआ आप लोगों ने ऐसी जगह क्यों बुक की? मना कर देतीं तो एक बुकिंग और कर लेते हम।आपको तकलीफ नहीं देते। आजकल तो सब कुछ आसानी से हो जाता है। पैसे तो देना ही है। सुविधा और सफाई तो हो।सोड़ी के जवाब ने चानी को आसमान से नीचे गिरा दिया। बोली-'तुम' लोग ऐसे ही तो रहते थे। आदत है तुम सब को तो। मुझे लगा रह लोगे?
 
अब चानी का बेटा जो अब तक अपनी मां को दुःखी और शर्मिंदा होते देख रहा था बोल पड़ा-हां नानी, मम्मी ने बताया था सब।ये भी कि पहले आप भी वहीं रहतीं थीं,बल्कि मम्मी के यहां ही पड़ी रहती थीं। आपके घर में जगह जो नहीं होती थी। आपकी शादी के बाद भी जब जब आप आईं उन्हीं के घर अपने बच्चों के साथ रहते रहे, खाते पीते रहे। पहले तो आप भी....
 
चानी ने बेटे को रोका,एकदम हल्की हो गई। अब वो सम्हल चुकी थी। बुआ की इस घटिया मानसिकता और सोच पर एक तरसभरी बंजर नजर मारी और अपने परिवार के स्वाभिमान को सम्हाल उठ खड़ी हुई। सोड़ी का मुंह काला हो गया। 
 
ऐसे जवाब की उम्मीद जो नहीं थी। इज्जत का पानी उतर चुका था। वो दरवाजे से निकलने पर लिफाफे देने लगी। तीनों ने यह कहते हुए लौटा दिए कि ये आपके काम आएंगे.... और चल पड़े ठंडी-ठंडी सांस लेते हुए। जैसे किसी की मौत में बैठ कर आए हों, हां ये मौत ही तो थी क्योंकि एक रिश्ता दम जो तोड़ चुका था।

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