rashifal-2026

बस उस क्षण को जीत लेने की बात है, फिर जिंदगी खूबसूरत है

स्मृति आदित्य
आत्महत्या। किसी के लिए हर मुश्किल से बचने का सबसे आसान रास्ता तो किसी के लिए मौत को चुनना सबसे कठिन। मैं यह नहीं कह सकती कि आत्महत्या कायरों का काम है, मुझे लगता है मौत का चयन भी बहुत साहस मांगता है। उपदेश देना बहुत आसान है लेकिन जो अवसाद के चगुंल में फंसा है उसके लिए जिंदगी बड़ी मुश्किल होती है और वह अपने सारे रास्ते बंद कर सिर्फ एक ही अंधियारे पथ को अपनाता है जिसे आत्महत्या कहते हैं।
 

भय्यू महाराज के बहाने ही सही पर बात तो होना चाहिए। यह जानते हुए भी कि हम कोई ज्ञानी नहीं, संत नहीं, उपदेशक भी नहीं पर जिंदगी में इस मुकाम से एक न एक बार हम सब गुजरते हैं जब लगता है कि जिंदगी ने सारे इम्तहान ले लिए अब कुछ नहीं बचा। संवेदनशील मन वाले आत्मघात जैसे रास्ते पर चलने की चूक सबसे पहले करते हैं। बात व्यक्तिगत हो सकती है लेकिन यह भोगा हुआ अनुभव है। वह एक छोटा सा लम्हा होता है जिसे जीतने की जरूरत होती है। बस एक नन्ही सी आशा की किरण, एक महीन सी रोशनी, एक छोटा सा दीपक, एक थरथराती उम्मीद की लौ और फिर सारा उफनता समंदर शांत हो जाता है। सारे आलोड़न-विलोड़न थम जाते हैं।
 

लहरों के तड़ातड़ पड़ते थपेड़े भी फिर विचलित नहीं कर पाते हैं लेकिन बस वह एक लम्हा थामने की दरकार है जब आप मर जाना चाहते हैं। सब कुछ खत्म कर देना चाहते हैं और उसी बीच एक कोई संदेश, एक कोई फोन, एक कोई अच्छी स्मृति, एक कोई लगाव, एक कोई रिश्ता, एक कोई विचार, एक कोई पंक्ति, एक कोई चेहरा आपको सामने नजर आता है और कदम पीछे हट जाते हैं मन आत्मग्लानि से भर उठता है ... छी.. यह क्या सोच लिया ... हम अपनी जिंदगी के अकेले मालिक नहीं है। हमसे जुड़ी कई जिंदगियां है जो हमें देखकर खुश होती हैं, हमारी हंसी से पोषित होती है। हमारी खुशी से खिलखिलाती हैं।

 

जब हम मरते हैं तो हमारे साथ थोड़े-थोड़े सब मरते हैं आसपास के, हमारे साथ के, हमारे अपने... फिर यह भी तो सच है कि मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे.. क्या गारंटी है कि मरने के बाद सुकून है... हममें से कोई नहीं जानता कि वहां उस परालौकिक दुनिया में क्या है, कैसा है? मृत्यु की एक अपनी व्यवस्था है उसे तोड़ने की हो सकता है वहां भी सजा ही तय हो..तब क्या करेंगे। यहां तो हमारे अपने इतने सारे हैं वहां कौन होगा...

मेरा अपना अनुभव कह लीजिए या मेरे अपनों का... पर सच है कि मृत्यु के उस मुहाने से लौटकर आने का अपना एक सुख है। उसके कई सालों बाद मुड़कर देखें तो लगता है कैसे हमारी जिंदगी में भी वह क्षण आया था जब हमने सब कुछ हार कर मर जाने का प्रण लिया था.. अगर वह एक क्षण नहीं जीता होता तो आज जो यह खूबसूरत सी खुशियां चारों तरफ बिखरी हैं वह कहां मिलती। यह जो मेरे अपनों के चेहरे चमक रहे हैं वह कितने म्लान होते। और गर्व हो उठता है कि सही फैसला लिया जो बच गए और नकारात्मक विचार से बचकर रहें।

हम खुद अपने सबसे बड़े मार्गदर्शक है। हम खुद अपने गुरु हैं। हम ही अपने चिकित्सक हैं और हम ही अपने ज्योतिषी। हमें पहले अपने आपको ही साधना है फिर तो सब सध जाएगा। 'मुझे नहीं हारना है' के मंत्र को थोड़ा सुधारें कहें कि मुझे बस जीतना है। मुझे नहीं हारना है, में भी नकारात्मक भाव तो है ना 'हार' और 'नहीं'. ..यह आपको कमजोर करता है..मुझे जीतना है वाक्य मजबूती देता है निश्चित तौर पर... फिर कहती हूं कि कहीं से पढ़ी-सुनी बातें नहीं है मेरा अपना अनुभव है बेरोजगारी के दिनों का .... आज लगा कि बात कर ही लेना चाहिए.... भय्यू जी महाराज तो स्वयं आत्महत्या के लिए कांउसलिंग करते थे। उनकी जिंदगी पर विमर्श करने का हम में से किसी को हक नहीं क्योंकि हम नहीं जानते कि उस शख्स के अपने क्या तनाव थे, क्या संघर्ष थे.. पर बात स्वयं को खत्म कर लेने की है तो यहां मानवता का तकाजा है कि जिंदगी कैसी भी हो बचाई जाए...बस थोड़ा अच्छा सोच लिया जाए...

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