दम तोड़ता पर्यावरण, संतुलन खोती प्रकृति..!

फरवरी बीतने की कगार पर है लेकिन देश में कई जगह बेमौसम झमाझम बारिश, ओले, बिजली का कहर जारी है। ठण्ड के तेवर ठण्डे पड़ने के साथ वापस अपने शवाब पर आ गए हैं। तमाम बीमारियों सहित मुसीबतें पीछा नहीं छोड़ रही हैं। इंसान और जानवर सहित वनस्पति तक सभी परेशान हैं। बारिश से फसलों को नुकसान तय है और किसानों के माथे पर फिर मायूसी भऱी चिन्ता झलक रही है। सरसों, अरहर, चना की फसलों में लगे फूल गिर गए हैं। मसूर,अरहर के साथ ही गेंहू का अब क्या होगा इसकी चिन्ता में अन्नदाता की सुबह का चैन रात की नींद सब कुछ हराम है।

बारिश का कहर ऐसा कि गेहूं की खड़ी फसलें भी जहां-तहां लोट रही हैं वहीं सरसों के गलने के खतरे तय माने जा रहे हैं गन्ने की बसंतकालीन बुवाई में देरी सिर पर है। आम, मुनगा (सहजन) के फूल अभी तो आए ही थे और दम तोड़ने को मजबूर हो रहे हैं। जनवरी में आलू की फसल पर इसी बेमौसम बारिश ने गजब का कहर ढाहाया जिससे पत्तियां ही झड़ गईं अब फसल से क्या उम्मीद?

यह सारा कुछ जलवायु परिवर्तन का असर है जिसके लिए कहीं न कहीं आज की तथा कथित विकसित सभ्यता जिम्मेदार है। अंधाधुंध प्राकृतिक स्त्रोतों का दोहन, यहां तक भूगर्भीय जल की भी बेहिसाब निकासी, जमीन में दफन तथा धरती व पहाड़ पर मौजूद खनिज, मृदा और दूसरे तत्वों का ताबड़ तोड़ उत्खनन कहीं न कहीं प्रकृति के संतुलन को प्रभावित कर रहा है। इसके चलते जहरीली गैसों का उत्सर्जन भी काफी हद तक बढ़ गया है नतीजन अंधाधुंध ग्लोबल वार्मिंग बढ़ गई है और हम बेफिक्र हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। कितनी अंजान और अनाम बीमारियां दस्तक दे चुकी हैं। हर साल दर्जनों नए और दिनों दिन गंभीर होते रोगों का नाम सुनने को मिलता है। लेकिन हम फिर भी बेफिक्र हैं।

धरती पर जीवन को बचाने के लिए कब गंभीर होंगे नहीं पता। लेकिन इतना जरूर पता है कि जब जागेंगे तब तक काफी देर हो चुकी होगी और हम अपनी आने वाली पीढ़ी के साथ खुले तौर पर नाइंसाफी के लिए जिम्मेदार होंगे।
आज प्रकृति ऐसे बदले स्वरूप में देखने को मिल रही है जिसको किसी ने कभी सोचा नहीं होगा। अब तो स्थितियां इतनी बदतर हो गई हैं कि मौसम के छिन-पल बदलते मिजाज का कोई भरोसा नहीं। कई बार तो आधुनिक विज्ञान, सैटेलाइट और टेक्नालॉजी भी गच्चा खा जाते हैं। लेकिन फिर भी प्रकृति की वेदना को हम अनसुना करते ही जा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ने बीते वर्ष जलवायु परिवर्तन पर एक सम्मेलन किया था जिसमें मानव जनित जलवायु परिवर्तन पर चिन्तन हुआ।

सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन के प्राकृतिक कारणों में अंतर बताने की कोशिश के साथ ही इसे परिभाषित भी किया गया जिसमें इसके लिए सीधे-सीधे हमारे द्वारा पैदा किए गए हालातों को दोषी बताया गया। बढ़ती गर्मी और बारिश के बदलते पैटर्न को लेकर अलग चिन्ताएं जताई जा रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि बदलती जलवायु का सीधे तौर पर हम सबके जीवनयापन पर तो असर पड़ता ही है साथ ही खाद्य सुरक्षा पर भी।

प्रकृति पहले तो ऐसी न थी। आखिर इस पर हम कब मंथन, चिन्तन करेंगे और नतीजे पर पहुंचेंगे। समय तेजी से बीत रहा है। बदलाव दिन प्रतिदिन साफ दिख रहा है। बेमौसम बारिश और बर्फबारी,  सूखा, अतिवृष्टि की घटनाएं जैसे आम हो गईं हैं। यह सीधे तो नहीं लेकिन परोक्ष रूप से धरती पर सभी के जीवन चाहे मानव हो, पशु, पक्षी, कीट, पतंग या फिर वनस्पति ही क्यों न हो प्रभावित कर रही है। साफ दिख रहा है कि चाहे जीव, जन्तु हों या वनस्पति सभी का जीवन चक्र प्रभावित हो रहा है।  सबका संतुलन बिगड़ रहा है।

पहले ऐसा नहीं था भरपूर हरे-भरे जंगल और साफ, सुथरी नदियां थीं। लेकिन नदियों का सीना छलनी करने वाले, पहाड़ों को तोड़कर रेगिस्तान बनाने वाले और जंगलों को काट कर पर्यावरण बिगाड़ने वाले माफिया इस कदर और इतने बेखौफ नहीं थे जैसा अभी हैं। लगभग हर गांव के पोखर, तालाब, कुंए, झरने वहां की शान होते थे। पानी की कोई कमीं नहीं थी। नदियों के किनारे हरियाली और साग-सब्जी की बहार हुआ करती थी। बारहों महीने बहने वाले नाले थे। अब यह सब एक सपने सा हो गया है।

जहां पर्यावरण को हमने भरपूर चोट पहुंचाई वहीं आबादी पर भी कोई नियंत्रण है ही नहीं। केवल तीन दशकों में लगभग 35 प्रतिशत आबादी बढ़ी है जिसका यही अनुपात रहा तो संसाधनों की किस तरह की कमीं होगी सोचकर ही डर लगता है। इतना ही नहीं आबादी के साथ-साथ प्रकृति पर अत्याचार भी उसी अनुपात में बढ़े हैं। उसी का नतीजा है कि कहीं बाढ़, कहीं गर्मी तो कहीं सर्दी का सितम कहर बरप रहा है।

आज धरती का बुखार असामान्य है तो पसीने के रूप में बेमौसम की बारिश कब आ जाए नहीं पता। आसमान का भी मिजाज अलग काला,पीला हो रहा है। पानी खत्म हो रहा है। बची खुची बारिश को सहेजने को लेकर भी हम लापरवाह हैं। न कोई नीति है न ही किसी तरह की राजनीतिक सोच। धरती और पर्यावरण को बचाने की चिन्ता की रेंगती रफ्तार बहुत धीमी और दिखावटी है। हमारी आने वाली पीढ़ी पर्यावरण से ज्यादा अपने अस्तित्व को लेकर जूझ रही है। ऐसे में बिगड़ते मौसम पर कौन, कब और कितनी चिन्ता करेगा?

यहां तो हम आज की चिन्ता में अपनी आने वाली पीढ़ी के कल का सर्वनाश लगातार करते जा रहे हैं। जल स्त्रोत दम तोड़ रहे हैं लेकिन धरती के गर्भ में बचे पानी को भी गहरे ट्यूब वेल से कदम-कदम पर पानी निकालने की होड़ में पीछे नहीं है। बारिश के पानी को सहेजने खातिर कोई जरूरी कोशिशें भी नहीं हो रही है। पहाड़ गिट्टियों की तो नदियां रेत का जरियां बन जेब भरने का जुगाड़ गईं है। इनके अंधाधुंध दोहन से क्या मिला या प्रकृति ने क्या खोया इसकी चिन्ता या हिसाब की फिक्र किसी को नहीं है। सच तो यह है कि पर्यावरण खातिर जो भी कुछ हो रहा है वह कागजों में तो सुव्यवस्थित है लेकिन हकीकत में नदारत है।

साफ हवा तक नसीब में नहीं रह गई है। बड़े शहर, इफरात वाहन, कारखानों के प्रदूषण, कूड़ा-करकट के जलते धुंए तो गांव व कस्बे की नरवाई, पराली जलाने के अलावा साफ हो चुके जंगलों के कारण स्वच्छ न होती दूषित हवा व खत्म होती हरियाली से अनियंत्रित होते तापमान से सभी हलाकान हैं। सब कुछ जानते हुए भी खराब हो चुके वायुमण्डल को लगातार खराब किए जा रहे हैं। अपनी खुद की भावी पीढ़ी के बारे में सोचने की न किसी को चिन्ता है और न कोई तैयार ही दिखता।

केन्द्र और राज्य सरकारें पर्यावरण बचाने खातिर सख्ती करती हैं तो स्वागत योग्य होगा। नागरिकों के साथ-साथ प्रशासनिक मशीनरी और जनप्रतिनिधियों पर भी बराबर की जिम्मेदारी और कार्रवाई हो तभी इसके नतीजे निकलेंगे वरना अफसरशाही के झूले में योजनाएं झूलेंगी और सरकारें आती जाती रहेंगी.  धरती, आसमान, जल, जंगल, जमीन, पहाड़ यूं ही विकास के नाम पर दम तोड़ते रह जाएंगे। बेमौसम बारिश और गर्मीं की तबाही का आलम जल्द ही हमारी आदतों में शुमार हो जाएगा लेकिन इस बात से बेफिक्र ही रहेंगे कि यह हमारी सेहत के कितने घातक हैं?

निश्चित रूप से यह अनदेखी एक दिन वो भयावह महामारी मरेगी जिस पर नियंत्रण का तरीका तथा कथित विकसित या विकासशील किसी भी देश या ताकत के पास नहीं होगा. लेकिन सवाल वही कि मौत के मुंहाने बैठकर भी हम बेफिक्री और ढ़िठाई के साथ केवल आज में जीकर अपनी भावी पीढ़ी के साथ कितना बड़ा छल किए जा रहे हैं और बेमौसम की बारिश और गर्मी को कोस रहे हैं। आइए बसंत में ठण्ड, सूखे में बारिश और गर्मीं में झुलसन के बीच जीने की आदत डाल लें पता नहीं कल कहीं धधकती ज्वाला में भी जीने की मजबूरी हो?

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