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ग्रीनलैंड बन सकता है ट्रंप का अगला शिकार

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राम यादव

, गुरुवार, 8 जनवरी 2026 (16:54 IST)
अमेरिका द्वारा वेनेजुएला पर हमले के बाद, इस बात की चिंता बढ़ रही है कि अमेरिका के सनकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उत्तरी ध्रुव के पास के बर्फीले देश ग्रीनलैंड की तरफ भी हाथ बढ़ा सकते हैं। ग्रीनलैंड के संरक्षक देश डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी है कि अमेरिका यदि किसी अन्य नाटो देश पर हमला करता है तो द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अब तक की वर्तमान व्यवस्था का अंत हो जाएगा।
 
ग्रीनलैंड की राजधानी नूक में डोनाल्ड ट्रंप के बारे में जब लोगों की राय पूछी जाती है, तो उनका दोटूक उत्तर यही होता है, वे हमारे ऊपर राज करना चाहते हैं, लेकिन हम ऐसा नहीं चाहते। हमें ख़रीदा नहीं जा सकता। क्या वे आकर हम पर क़ब्जा कर लेंगे? हम तो एक छोटी-सी, असुरक्षित आबादी हैं। ऐसे में हमारी रक्षा कौन करेगा?
 
बार-बार दावा : ट्रंप ग्रीनलैंड को ख़रीदने से लेकर सैन्य बल प्रयोग द्वारा हथियाने तक सभी विकल्प आजमाने की धमकी दे रहे हैं। ग्रीनलैंड में केवल लगभग 56000 लोग रहते हैं। यूरोपीय देश डेनमार्क के एक स्वायत्त अंग के रूप में लगभग सदा बर्फ से ढंका रहने वाला हमारी पृथ्वी पर का यह सबसे बड़ा द्वीप (ठीक अमेरिका की तरह ही) नाटो सैन्य गठबंधन का हिस्सा है।
 
अमेरिकियों की ग्रीनलैंड में लंबे समय से उपस्थिति रही है। नाटो सैन्य संगठन के बहाने से उनका वहां अपना एक सैन्य अड्डा भी है, लेकिन ट्रंप को यह काफी नहीं लगता। वे बार-बार ग्रीनलैंड पर अपना दावा जताया करते हैं। रविवार, 4 जनवरी को उन्होंने पुनः कहा कि अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अमेरिका को ग्रीनलैंड की ज़रूरत है।
 
वेनेजुएला में ट्रंप के सैन्य हस्तक्षेप के बाद से ग्रीनलैंड के संरक्षक डेनमार्क में चिंता बढ़ रही है कि ट्रंप जल्द ही एक ऐसी विकट स्थिति पैदा कर सकते हैं, जो घातक साबित हो सकती है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेत्ते फ्रेदरिक्सन (Mette Frederiksen) बहुत चिंतित हैं और इस स्थिति को गंभीरता से ले रही हैं। रविवार, 4 जनवरी को डेनिश टेलीविजन पर पत्रकारों और नागरिकों के प्रश्नों के उत्तर देते हुए उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी कि वह स्थिति को और न बिगाड़े। मैं बिल्कुल स्पष्ट कर देना चाहती हूं, अगर अमेरिका किसी अन्य नाटो देश पर हमला करता है, तो बस, बात ख़त्म!
 
डेनमार्क की चेतावनी : श्रीमती फ्रेदरिक्सन ने कहा कि इस ख़त्म का मतलब नाटो का अंत भी है। फिर द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद स्थापित विश्व-व्यवस्था का अंत हो जाएगा। लोकतांत्रिक नियमों का अंत हो जाएगा। अगर एक नाटो देश दूसरे (नाटो) देश पर हमला करता है तो सबकुछ ध्वस्त हो जाएगा। श्रीमती फ्रेदरिक्सन को यूरोप से प्रबल समर्थन मिल रहा है।
 
जर्मनी सहित कई देशों की सरकारें उनका समर्थन कर रही हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने कहा, केवल ग्रीनलैंड और डेनमार्क के पास ही अपने भविष्य का फैसला करने की शक्ति है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री फ्रेदरिक्सन ने अमेरिकी सरकार से अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करने की अपील की। कहा, हम एक अशांत दौर में जी रहे हैं, लेकिन अगर हम सबसे बुनियादी मूल्यों को त्याग देते हैं, तो हम सभी की स्थिति बद से बदतर हो जाएगी।
 
ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लोग अब अपने आप से पूछ रहे हैं। आगे क्या होगा? डेनिश रक्षा अकादमी के एक आर्कटिक शोधकर्ता ने डेनिश रेडियो को दिए एक साक्षात्कार में दो परिदृश्यों को यथार्थवादी बताया। एक संभावना यह है कि संघर्ष अगले कुछ वर्षों तक जारी रहेगा, अमेरिका की ओर से बार-बार धमकियां दी जाएंगी, ग्रीनलैंड और डेनमार्क में आक्रोश फैलेगा।
 
ट्रंप का कोई भरोसा नहीं : दूसरी संभावना यह है कि ट्रंप को अपनी लाज बचाने की कोई रणनीति पेश की जाए। डेनिश सरकार ने हाल ही में ग्रीनलैंड की रक्षा के लिए अधिक निवेश करने का निर्णय लिया है। ट्रंप कह सकते हैं, यही तो मैं हासिल करना चाहता था, मैंने जीत हासिल कर ली है लेकिन ग्रीनलैंड के बहुत से लोगों को यह भी डर है कि ट्रंप अपनी जनता को दिए गए पुराने चुनावी वादे को अक्षरशः पूरा करने की कोशिश कर सकते हैं यानी अमेरिका को बड़ा बनाना, मेक अमेरिका ग्रेट अगेन, चाहे नक्शे पर ही सही।
 
डेनमार्क बार-बार कह रहा है कि ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है। उत्तरी यूरोप के उसके पड़ोसी देश नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड उसका पुरज़ोर समर्थन कर रहे हैं। डेनमार्क की तरह उसके इन पड़ोसियों ने भी अमेरिका के सिरफिरे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड पर क्षेत्रीय दावे को सिरे से खारिज़ कर दिया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेत्ते फ्रेदरिक्सन ने अमेरिका से अपील की है कि वह ऐतिहासिक रूप से अपने क़रीबी सहयोगी और एक ऐसे देश और लोगों के खिलाफ धमकियां देना बंद करे, जिन्होंने साफतौर पर कहा है कि वे बिकने वाले नहीं हैं।
 
20 दिनों में फिर बात करेंगे : दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप किसी सिरफिरे ज़िद्दी की तरह स्थिति को और बिगाड़ रहे हैं। अपने विमान एयर फोर्स वन में सवार अपने साथ के पत्रकारों से डेनमार्क पर फ़ब्ती कसते हुए बोले, डेनमार्क इसे नहीं खरीद पाएगा। हमें ग्रीनलैंड चाहिए। दावा किया कि रणनीतिक रूप से यह द्वीप अमेरिका के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन फिलहाल रूसी और चीनी जहाजों से घिरा हुआ है। वे 20 दिनों में ग्रीनलैंड के बारे में फिर बात करेंगे। फिलहाल उनका ध्यान वेनेजुएला, रूस और यूक्रेन पर केंद्रित है।
 
नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड डेनमार्क के साथ खड़े हैं। नॉर्वे के प्रधानमंत्री योनास गार स्तोर ने फेसबुक पर लिखा, ग्रीनलैंड डेनमार्क साम्राज्य का अभिन्न अंग है। नॉर्वे डेनमार्क साम्राज्य के साथ पूरी एकजुटता से खड़ा है। फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेकसांदर स्तब ने लिखा, ग्रीनलैंड और डेनमार्क के लिए निर्णय लेने का अधिकार केवल ग्रीनलैंड और डेनमार्क के पास है। इससे पहले ट्रंप के डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर की पत्नी केटी मिलर की एक ऑनलाइन पोस्ट ने डेनमार्क और ग्रीनलैंड में नाराजगी पैदा कर दी थी।
 
केटी मिलर ने फेसबुक पर ग्रीनलैंड का अमेरिकी झंडे के रंगों वाला एक नक्शा साझा करते हुए टिप्पणी की जल्द ही यानी ग्रीनलैंड पर अब जल्द ही अमेरिका का राज होगा। ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री येन्स-फ्रेदरिक नील्सन ने इंस्टाग्राम पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इस तस्वीर को अपमानजनक बताया।
 
दुर्लभ खनिजों का धनी : ग्रीनलैंड काफी हद तक स्वायत्तशासी है, लेकिन आधिकारिक तौर पर राजशाही वाले डेनमार्क साम्राज्य का हिस्सा है। आर्थिक रूप से वह डेनमार्क पर बहुत अधिक निर्भर है। दुनिया के इस सबसे बड़े द्वीप के लगभग 56,000 निवासियों में से अधिकांश डेनमार्क से अलग स्वतंत्र देश बनना चाहते हैं। हालांकि इस स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए आवश्यक धन का भारी अभाव है। वहां के कई लोग, अन्य बातों के अलावा बर्फ के नीचे दबे अनेक प्रकार के दुर्लभ एवं बहुमूल्य खनिज पदार्थों के दोहन को अपनी स्वायत्तता बनाए रखने का उपाय मानते हैं।
 
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नज़र वेनेजुएला के तेल भंडारों की तरह ही ग्रीनलैंड के इन भूगर्भीय संसाधनों की लूट-खसोट पर है। नाटो के बहाने से अमेरिका का एक सैन्य अड्डा वहां बहुत पहले से ही मौजूद है। इसलिए ग्रीनलैंड पर अपने सैन्य नियंत्रण का विस्तार भी ट्रंप की एक महत्वाकांक्षा हो सकती है।

अमेरिका और डेनमार्क के बीच 1951 से एक समझौता है, जिस पर ग्रीनलैंड ने 2004 में हस्ताक्षर किए थे। बताया जाता है कि यह समझौता अमेरिका को अपनी रक्षा के लिए ग्रीनलैंड के क्षेत्र का उपयोग करने का अधिकार देता है। इसलिए इस संदर्भ में ट्रंप को वास्तव में क्या चाहिए, यह समझ सकना थोड़ा मुश्किल है।
 
ट्रंप की ज़िद : ट्रंप पहले भी कह चुके हैं और अब भी कहते हैं कि हमें जहां तक जाना होगा, हम जाएंगे।...हमें ग्रीनलैंड चाहिए।... डेनमार्क को ग्रीनलैंड हमें देना ही होगा। सुनने में आ रहा है कि डेनमार्क में भी अब इसे असंभव नहीं माना जाता कि ट्रंप यदि अपनी ज़िद पर अड़ गए, तो अंतरराष्ट्रीय क़ायदे-क़ानून चाहे जो कहते हों, डेनमार्क को झुकना पड़ेगा। डेनमार्क के रक्षामंत्री त्रोएल्स लुंद पाउल्सन कहते हैं, मुझे लगता है कि ये ऐसे कड़े बयान हैं, जो डेनमार्क जैसे क़रीबी सहयोगी के प्रसंग में अमेरिकी राष्ट्रपति की छवि को ख़राब करते हैं।
 
समस्या तो यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति की कोई अच्छी छवि होती, तब तो ख़राब होती! इस आत्ममुग्ध आत्मप्रशंसी बड़बोले नए तानाशाह को उचित और अनुचित, न्याय और अन्याय की रत्तीभर भी पहचान नहीं है। वह भूखा है सत्ता और महत्ता का। प्रशंसा और चाटुकारिता का।

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