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जनजातियों के धर्मान्तरण के पीछे राष्ट्र को खंडित करने का षड्यंत्र

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कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

भारतीय सनातन संस्कृति सदैव से आक्रांताओं के निशाने पर रही है, जिसका क्रम मुगलों एवं अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भी थम नहीं पाया है।

विदेशी शक्तियां एवं देश के अन्दर राष्ट्रघाती तत्वों द्वारा गुपचुप तरीके से भारत राष्ट्र की एकता-अखण्डता-संस्कृति को खण्डित करने के लिए तरह-तरह के षड्यंत्रों के जाल बिछाए जा रहे हैं जो सरसरी निगाह से देखने पर तो स्पष्‍ट नहीं दिखते किन्तु यदि गहराई के साथ जमीनी स्तर पर इन विषयों पर चिन्तन-विश्लेषण किया जाए तो सबकुछ आईने की तरह सुस्पष्ट दिखने लगता है।

बर्बर अरबी तुर्क मुगलिया लुटेरों ने जहां भारत भूमि को रक्तरंजित करके भारतीय सनातन समाज का तलवार की नोंक पर धर्मांतरण करवाया, हमारे मन्दिरों को खण्डित किया, स्त्रियों की इज्जत लूटी उन्हें हरमों में भरा अपने बाजारों में वस्तु की तरह बोली लगाकर बेचा। हमारे आराध्य भगवानों की मूर्तियों को तोड़ा, धर्मग्रंथों को जलाया तथा अपनी क्रूरताओं की अति से सम्पूर्ण भारतभूमि को दहला कर रख दिया था, जिसके अध्यायों को यदि लिखा जाए तो शायद पन्ने कम पड़ जाएंगे। किन्तु हमारे यहां के बौध्दिक नक्सलियों ने उन्हीं बर्बर इस्लामी क्रूर लुटेरों को महान बतलाने में अकादमिक स्तर पर कोई कमी नहीं की तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात एक प्रकार से उन निकृष्ट क्रूर इस्लामी लुटेरों को पाक-साफ होने का सर्टिफिकेट बांट दिया। जबकि उन इस्लामी लुटेरों एवं उनकी नाजायज औलादों ने देश को सदैव ही अपनी निकृष्टताओं से हानि पहुंचाते रहे जिसे भारत विभाजन की त्रासदी हो या कि मोपला नरसंहार हो या बंगाल का नरसंहार हो।

उन जाहिलों ने हिन्दू समाज का नरसंहार किया उनकी स्त्रियों की इज्ज़त लूटी। नरपिशाचों ने छोटे-छोटे बच्चों को भालों से छेद कर मार डाला। क्रूरताओं की ऐसी कोई सीमा नहीं रही होगी जिसे उन नरपिशाचों और उनकी नाजायज औलादों ने लांघी न हो किन्तु उन जाहिलों को आज भी पाकसाफ का सर्टिफिकेट हमारे बौध्दिक नक्सली देते हैं।

इसी तरह अंग्रेजों ने भी हमारे राष्ट्र की संपदा का दोहन किया, व्यापक नरसंहार कर भारतभूमि को लहुलुहान तो किया ही साथ ही यहां की संस्कृति को नष्ट करने के लिए हमारे धर्मग्रंथों की मनमानी व्याख्याएं की। उनमें अपनी कुटिल मंशानुरुप अपने दूरदर्शी दृष्टिकोण के तहत राष्ट्र के सनातन समाज जो वर्तमान में हिन्दू समाज के तौर पर जाना जाता है।

उनके व्यापक, वैविध्यपूर्ण किन्तु आपसी सामंजस्य की परंपराओं के साथ साहचर्यता के साथ चलने वाले समाज में दरार डालने के लिए विभिन्न हथकंडों के तहत मैकॉले मॉडल ने फूट डालो, शासन करो की नीति के तहत अनेकानेक विवादास्पद आपसी मतभेदों को बढ़ाने वाले नैरेटिव गढ़े जिसके कारण हमारा समाज आपसी कलह का शिकार होकर टूट जाए और वे अपने मंसूबों को पूरा करने में सफल हों। अंग्रेजी हुकूमत के शासन काल में ईसाई मिशनरियों ने व्यापक स्तर पर धर्मांतरण करवाने की मुहिम को अंजाम दिया जिसमें सर्वाधिक निशाने पर राष्ट्र का जनजातीय वनवासी समाज रहा है।

आज देश भले ही आजाद हो गया हो लेकिन यह सिलसिला आज भी नहीं थम पाया है। वनांचलों में रहने वाला हमारा वह जनजातीय समाज जो सनातन हिन्दू समाज का अभिन्न अंग है वह आज भी मिशनरियों के निशानों पर है जिसे विभिन्न आर्थिक प्रलोभनों, हिन्दू धर्म, समाज एवं धर्मग्रन्थों के विरुद्ध विषवमन करते हुए धर्मान्तरित करवाया जा रहा है।

इस कार्य में देश एवं विदेश की वे विभिन्न शक्तियां लगी हुई हैं जो भारत की अखण्डता एवं वैविध्यपूर्ण सामाजिक ढांचे के बावजूद भी अपनी राष्ट्र एवं धर्मनिष्ठा को पचा नहीं पा रही हैं। इन सबमें विदेशी शक्तियां, वामपंथी, ईसाई मिशनरियां सभी अपने-अपने स्तर पर लगे हुए हैं। वे भारत के सुदूर वनांचलों में निवासरत जनजातीय बन्धुओं के मध्य भ्रामक प्रचार प्रसार एवं प्रलोभनों के माध्यम से उन्हें हिन्दू धर्म से अलग और हिन्दू न होने का अभियान चलाकर उनके धर्मान्तरण के लिए एड़ी-चोटी लगाई जा रही है। उनके मन में यह भ्रम उत्पन्न करवाया जा रहा है कि वे प्रताड़ित हैं तथा देश की सरकारें उनके अधिकारों को पूरा नहीं कर सकती और तो और वे उन्हें इस बात के लिए उकसा रहे हैं कि तुम्हारे अलावा यहां रहने वाले सभी बाहरी हैं।

इन सबके पीछे उन विदेशी शक्तियों की मंशा केवल जनजातीय हिन्दू समाज के धर्मांतरण तक ही नहीं है बल्कि वे शिक्षा-स्वास्थ्य एवं आर्थिक प्रलोभनों के हथियार के तौर पर भारत में वैमनस्य एवं अन्तर्कलह फैलाकर अलगाववाद की विषबेल के सहारे छोटे-छोटे देश की मांग के लिए आदिवासी बन्धुओं को आगे कर राष्ट्र की अखण्डता को खंडित करने का कुत्सित षड्यंत्र रचा जा रहा है।

ये विदेशी शक्तियां कभी मिशनरियों तो कभी एनजीओ के माध्यम से देश के अन्दर रहकर राष्ट्रघाती कार्य करने वाले तत्वों एवं वामपंथियों से साठगांठ कर विद्रोह की आग सुलगाने पर जुटे हुए हैं। वे जनजातियों को आगे करके छद्म तरीके से राष्ट्रद्रोह की बारूदी सुरंग बिछाने पर लगे हुए हैं। उनके इस जाल में जनजातीय हिन्दू समाज आसानी से उलझता चला जा रहा है, जबकि इन षड्यंत्रों में सबकुछ स्पष्ट दिख रहा है कि उनके मंसूबे क्या हैं? इन सबमें किसी भी प्रकार से जनजातीय हिन्दू समाज का हित नहीं है, बल्कि जनजातीय समाज के कंधों में बन्दूक रखकर ये सभी देश की आर्थिक प्रगति को रोकने एवं संसाधनों में कब्जा करके धर्मान्तरण के सहारे जनजातीय समाज को हिन्दू समाज से अलग करने का षड्यंत्र है।

इन सभी के पीछे वैश्विक षड्यंत्र से भी इंकार नहीं किया जा सकता जो भारत के अन्दर विद्रोह एवं अलगाववाद फैलाकर देश को खंडित किया जा सके। यह इसी की बानगी है कि ―11 वीं सदी से ही Crusades और Commercialprosperity परस्पर एक दूसरे की पूरक रही हैं। इसका आधार एवं कारण ‘न्यू क्रिश्चियन इकॉनॉमी थियरी’ है, जो कि समूचे विश्व के अश्वेत या अयूरोपिय लोगों को क्रिश्चियन धर्म के अंतर्गत लाना चाहते हैं। इसके लिए विकासशील देशों में विश्व की बड़ी यूरोपियन शक्तियां छद्म रूप से कार्यरत हैं, जो बहुत बड़ी संख्या में मानवतावादी कार्यों बहाने पहले धर्मान्तरण करवाते तथा उसके पश्चात फिर धर्म आधारित राष्ट्र के सिद्धांत पर कार्य करते हैं। जो कि भारत में भी व्यापक तौर पर संचालित है तथा आए दिनों मिशनरियों /एनजीओ द्वारा जनजातीय समाज के धर्मांतरण की खबरें आती हैं। यह इसी की परिणति है कि वनांचलों में निवासरत जनजातीय हिन्दू समाज धर्मांतरण का शिकार होता जा रहा है।

ज्यादातर अश्वेत और अयूरोपीय देशों में अलग देश की मांग करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था UNPO द्वारा सहायता प्रदान की जाती है। भारत से नागालैंड के अलगाववादी संगठन (नागालिम) UNPO का सदस्य है, जो भारत से अलग देश की मांग कर रहा है, जिसके पीछे नॉर्वे और कई यूरोपीय देश, धार्मिक आधार पर नागालैंड को अलग देश बनाने की हिमायत कर रहे हैं।

धर्मान्तरण के लिए सबसे ज्यादा कारगर उपाय जिसे षड्यंत्रकारी अपना रहे हैं वह यही है कि सबसे पहले उनके आत्मबोध एवं उनकी धर्मनिष्ठा से जनजातीय हिन्दू समाज को अलग कर उनकी संस्कृति एवं धर्म के प्रति उनके मन में घ्रणा का भाव उत्पन्न करें तथा उसके पश्चात सहानुभूति के तौर पर हाथ थामने के लिए उन्हें ईसाई धर्म की महानता के साथ जोड़कर उनका धर्मान्तरण करवाया जाए।

इसके लिए समय- समय पर विदेशी शक्तियों के आह्वान पर भारत में वामपंथियों/राष्ट्रघातियों द्वारा हिन्दू समाज एवं संस्कृति के प्रतीकों के विरुद्ध जहर उगलते हुए जनजातीय समाज को आगे लाकर खड़ा कर दिया जाता है। इसीलिए ‘विश्व मूलनिवासी दिवस’ जैसा वैश्विक षड्यंत्र भारत में भी फैलाया जा रहा है, जबकि भारत में इसका कोई भी अस्तित्व नहीं है। क्योंकि भारत का मूलनिवासी कौन इसे यूं ही समझे कि जो भारत को मां के समान पूजता एवं सम्पूर्ण प्रकृति की आराधना करता है। सनातनी चाहे वह गांवों/कस्बों /नगरों में रहने वाला हो या कि वनांचलों में निवास करने वाला जनजातीय समाज हो सभी का मूल सनातन हिन्दू धर्म ही है जिसकी विशालता एवं अक्षुण्णता तथा समन्वय किसी को भी आश्चर्य में डालने वाला है। हमारी इसी महान विशेषता को खंडित करने के लिए राष्ट्रघातियों द्वारा निरंतर अभियान चलाए जा रहे हैं।

इसी तरह आर्यों के आक्रमणकारी एवं बाहर से आने की थ्योरी को इतिहास में दर्ज कर सत्ता के संरक्षण में पाठ्यक्रम में शामिल कर सनातन हिन्दू समाज को तोड़ने का षड्यंत्र किया, क्योंकि उन सभी का उद्देश्य हर हाल में देश में वैमनस्य उत्पन्न कर हिन्दू समाज को विभाजित करना है। जबकि हाल ही में हरियाणा के राखीगढ़ी में प्राप्त मानव कंकाल के डीएनए टेस्ट की रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो चुका है कि आर्यों के यूरोप एवं पूर्व मध्य एशिया से आने की थ्योरी केवल कोरी बकवास एवं षड्यंत्र का हिस्सा ही था। 

इस सम्बन्ध में डॉक्टर अम्बेडकर राइटिंग एंड स्पीचेस खंड 7 में अम्बेडकर जी ने लिखा है कि आर्यों का मूलस्थान (भारत से बाहर) का सिद्धांत वैदिक साहित्य से मेल नही खाता। वेदों में गंगा, यमुना,सरस्वती, के प्रति आत्मीय भाव है। कोई विदेशी इस तरह नदी के प्रति आत्मस्नेह सम्बोधन नही कर सकता।
इसी तरह डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘शुद्र कौन’? Who were shudras? में स्पष्ट रूप से विदेशी लेखको की आर्यो के बाहर से आकर यहां पर बसने सम्बंधित मान्यताओ का खंडन किया है। डॉ अम्बेडकर लिखते है--

१. वेदो में आर्य जाति के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं है।
२. वेदो में ऐसा कोई प्रसंग उल्लेख नही है जिससे यह सिद्ध हो सके कि आर्यों ने भारत पर आक्रमण कर यहां के मूलनिवासियों दासों अथवा दस्युओं को विजय किया।
३. आर्य, दास और दस्यु जातियो के अलगाव को सिद्ध करने के लिए कोई साक्ष्य वेदों में उपलब्ध नही है।
४.वेदों में इस मत की पुष्टि नही की गई कि आर्य, दास और दस्युओं से भिन्न रंग के थे।
५.डॉ.अम्बेडकर ने स्पष्ट रूप से शूद्रों को भी आर्य कहा है (शूद्र कौन? पृष्ठ संख्या 80)


इस प्रकार इन तथ्यों एवं सन्दर्भों से यह स्पष्ट समझा जा सकता है कि इस तरह के षड्यंत्र जनजातीय समाज को हिन्दू समाज से तोड़कर धर्मान्तरण के रास्ते राष्ट्र विभाजन का दु:स्वप्न है जिसमें आन्तरिक और बाह्य शक्तियां संलग्न हैं। किन्तु ऐसा करने वाले रह भी जान लें कि हमारे जनजातीय समाज का निवास भले ही वनांचलों में हो किन्तु उनकी परम्पराएं, संस्कृति, धार्मिक आचरण एवं पूजा पध्दतियों के तरीके भले अलग ही क्यों न लेकिन जो सारतत्व हिन्दू समाज का है वही हमारे जनजातीय बान्धवों का है। चाहे कितने भी षड्यंत्र हों लेकिन यह जान लें कि जनजातीय समाज सनातन हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग था है और रहेगा जिसे किसी भी प्रलोभन या दुस्प्रचार के साथ तोड़ा नहीं जा सकता है।

(इस लेख में अभि‍व्‍यक्‍त विचार लेखक की निजी अनुभूति‍ है, वेबदुनिया का इससे कोई संबंध नहीं है।)

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