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ढेबरी से बल्ब तक का सफर और बिजली का पहला झटका

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गिरीश पांडेय

मेरी पढ़ाई मिडिल क्लास (कक्षा आठ) तक गांव में हुई। गांव गोरखपुर जिले के गगहा थाने में पड़ता था। गांव का नाम था.. सोनइचा। वह दौर था ढेबरी (दीया) का—लालटेन भी हर घर में नहीं होती थी। बड़े-बड़े घरों में भी सीमित लालटेनें ही होतीं। मेंटल वाली गैस की चकाचौंध तो बस शादी-ब्याह या किसी बड़े आयोजन में ही नजर आती थी।
 
गैस भी दो तरह की होती थी—एक सामान्य, दूसरी जिसकी पेंदी बड़ी होने से हम बच्चे उसे "हड़ियहवा" कहते थे। या तो इसकी रोशनी बहुत तेज होती थी, या जलने की क्षमता ज्यादा—याद नहीं ठीक-ठीक। पर इसे जलाने का भी अलग हुनर था। शुरू-शुरू में यह सिर्फ गांव के कुछ संभ्रांत घरों में होता था। जिसे यह जलाने का कौशल आता, उसे हम "गैसड़ी" कहते थे। बाद में कुछ गैसड़ियों के लिए यह अस्थायी रोजगार का साधन भी बन गया।
 
ढेबरी की अपनी रेंज थी—मिट्टी की, कांच की, टिन की। इनका एक परिष्कृत रूप भी था—शीशे लगे छोटे-बड़े लैंप। इनमें लालटेन की तरह लीवर लगा होता था। जिससे बत्ती बढ़ाई-घटाई जा सकती थी। इससे रौशनी पर नियंत्रण आसान रहता था। शीशा साफ रहता तो रोशनी अच्छी आती और धुआं भी कम निकलता।
 
उस समय मिट्टी के तेल (किरोसीन) की राशनिंग होती थी। कोटे की दुकानों पर यह सीमित मात्रा में मिलता। इसलिए रोशनी का मतलब बस इतना था—अंधेरे को थोड़ी देर के लिए दूर रखना, जब तक लोग खा-पीकर बिस्तर पर न पहुंच जाएं। उसके बाद गांव में अंधेरे का राज चलता। कभी-कभी चोरबत्ती (टॉर्च) की रोशनी से यह टूटता। टॉर्च भी आज जैसी नहीं—दो सेल वाली जीप या एवररेडी वाली आम थी। तीन-पांच सेल वाली दुर्लभ, ज्यादातर उन घरों में जहां कोई कोलकाता, बैंकॉक, रंगून या सिंगापुर में रहता हो।
 
अगर किसी घर में पढ़ने वाला बच्चा देर रात तक लालटेन, लैंप या ढेबरी जलाए रखता, तो बुजुर्गों की चिंता बढ़ जाती। पहले टोकते, न मानने पर ठोंक भी देते। गाली? वह तो आशीर्वाद मानी जाती थी!
 
जाड़ों में दिन छोटे होने पर रात सात बजे तक पूरा गांव सो जाता। दूर कहीं कुत्तों के भौंकने या सियारों की "हुआ-हुआ" से सन्नाटा टूटता।
 
फिर आया बिजली का दौर—शायद 1970 के दशक के आखिरी साल। हमारे घर में टेम्पररी कनेक्शन जुड़ चुका था, वायरिंग चल रही थी। उसी समय चचेरी बहन शशिकला की शादी तय हुई। घर रिश्तेदारों से भरा था, उत्साह का माहौल। एक तो बहन की शादी, ऊपर से पहली बार बिजली की रोशनी में!
 
एक रात जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के कारण आंगन के हैंडपंप का वॉशर खराब हो गया। हरफनमौला गोरख कहार को बुलाया गया। रिंच-पिलास लेकर वे काम में जुट गए। रोशनी दिखाने की जिम्मेदारी मेरी थी। मैं तार से जुड़े होल्डर में लगा बल्ब लेकर उन्हें रोशनी दिखाने लगा।
 
बच्चा था न, मन में ख्याल आया—गांव में कभी-कभी चोरी-चकारी होती थी। "पकड़ो-मारो" का शोर सुनाई देता, पर चोर कभी पकड़े नहीं जाते, हमेशा फरार। सोचा, काश यह तार द्रौपदी की चीर की तरह लंबा हो जाए! चोर आए तो हमारे हाथ में बल्ब रहे, हम दौड़कर उन्हें पकड़ लें। सोचते-सोचते मैं कल्पना में खो गया।
 
तभी पूरे शरीर में तेज झटका लगा। झनझना उठा सब कुछ। होल्डर सहित बल्ब एक तरफ गिरा, मैं दूसरी तरफ। किसी को समझ नहीं आया कि मुझे क्या हुआ? मुझे भी नहीं। बाद में पता चला—करंट का झटका था।
यह मेरा बिजली युग में प्रवेश था—पहला झटका, पर बहुत जोरदार!

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