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चुप्पी, सींच रही अपराधों को...

प्रीति सोनी
बैंगलुरू में नए साल की रात एक लड़की के साथ जो असभ्यता हुई, वह कोई नई घटना नहीं है समाज के लिए, और पुलिस के लिए तो बिल्कुल भी नहीं। पुलिस के गैरजिम्मेदाराना रवैये से तो यही साफ जाहिर होता है, कि ऐसी शिकायतें तो रोज ही आती हैं, इसमें कौन मेहनत करे इतनी...अगर कोई अपराधी तो बताओ या कोई सबूत हो तो बताओ, हम जरूर पकड़ेंगे। प्रयास कोई नहीं करना चाहता।

इस तरह की घटनाओं के लिए लड़की को या फिर बदमाशों को जिम्मेदार ठहराकर एक तरफ हो लेना बेहद आसान तरीका है, और सच कहूं तो निरर्थक भी। ये सब उथली बातें हैं, उथली जानकारी और उथली जिम्मेदारी भी, जिसे बस जुबान और होंठ हिलाकर, ऊंगली उठाकर अपराध की गेंद सामने वाले की ओर डाल देते हैं और अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेते हैं। उथला सा यह इलाज, इस बीमारी को ठीक नहीं कर सकता, बल्कि उसके रोगाणुओं को अंदर ही अंदर पनपने के लिए हवा देता है। 
 
जिम्मेदार है संस्कार, जिम्मेदार है गलत सोच, जिम्मेदार है गलत नजरिया और जिम्मेदार है वह समाज, जिसने महिला सशक्तिकरण पर बाद में ध्यान दिया लेकिन पुरुषों की उनके सशक्त और महान होने की सोच को सदियों से पोषित करता आ रहा है। इस सोच का सदुपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा हुआ। तभी तो अपने सशक्त होने का अर्थ, वह गलत अधिकारों के रूप में समझता है। इस अधिकार के रूप में भी, कि वह रास्ते चलते किसी की देह को भी अपवित्र मानसिकता के साथ छू सकता है, और जो चाहे कर सकता है। क्या यह पुरुष होने का दुरुपयोग नहीं, क्या यह सशक्त होने का दुरुपयोग नहीं? 
 
बात गहरी है, और इससे निपटने के लिए गहराई से ही सोचना होगा। घटनाएं अगर समाज के बीच होती हैं, तो प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित भी समाज को ही करती हैं। ऐसी घटनाओं के लिए सिर्फ अपराधी या पीड़ित ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि वह समाज भी जिम्मेदार है जो सिर्फ देखने का कार्य करता है। समाज के बीच उत्पन्न हुई हर घटना, समाज के ही क्रियाकलापों का परिणाम है। या यूं कहें कि समाज ने कहीं न कहीं, भूलवश या जान बूझकर, कुछ तो गलत बोया है। कहीं तो चूक हुई है जिसकी सजा आज कोई भुगत रहा है, तो क्या पता कल आपका कोई अपना भी भुगत सकता है। यह बात तय है, क्योंकि बीमारी का इलाज नहीं हुआ है, वह बढ़ती जा रही है। वह किसी को तो संक्रमित करेगी, किसी को तो पीड़ित करेगी ही, तो आप क्यों नहीं। 
 
कहीं न कहीं, हमने ही बोए हैं गलत संस्कार...हमारी चुप्पी, सींच रही है अपराध की जड़ों को...हमारी निष्क्रियता के  कारण ही सक्रिय हैं बेखौफ अपराधी। यह समझने में हमें और कितना समय लगेगा? आज भी अगर हम मौन हैं, तो अगली पीढ़ी के लिए फिर वही माहौल तैयार कर रहे हैं, जहां कभी भी, कहीं भी उसके साथ कुछ भी हो सकता है....आप मजबूत बना रहे रहें हैं हर भावी पीड़ित की कमजोरी को। इसलिए आवाज उठाईए...हर गलत के खिलाफ। भावी पीढ़ी के लिए तैयार कीजिए बेहतर माहौल, ताकि न कोई पीड़ित हो न अपराधी। मानसिकता को सींचिए, अपराध को नहीं। 
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