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फांसी एक ‘बेबस फंदा’ है, इसलिए ‘निर्भया’ खत्‍म हो जाएगीं, उसे कुचलने वाले हाथ और ‘सिसकियां’ खत्‍म नहीं होंगे

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नवीन रांगियाल

महाराष्ट्र के मुंबई में रेप पीड़िता की मौत हो गई। मुंबई के साकीनाका इलाके में महिला के साथ रेप हुआ था। मुंबई पुलिस को शक है कि आरोपी ने पीड़िता के प्राइवेट पार्ट में रॉड घुसा दी थी। हॉस्पिटल में एडमिट होने के लगभग 33 घंटे के बाद पीड़िता की मौत हो गई। मुंबई के राजवाड़ी अस्पताल में पीड़िता का इलाज किया जा रहा था

दिल्‍ली, मुंबई, कानपुर, हैदराबाद, हाथरस... शहरों के नाम लेते जाइए और दुष्‍कर्म की घटनाएं गि‍नते जाइए। गि‍नने के लिए हाथ और उंगलियां खत्‍म हो जाएगीं, लेकिन दुष्‍कर्म के बाद मासूम बच्‍चि‍यों के शवों की कतारें और उनके मां-बाप की सिसकियां खत्‍म नहीं होंगी।

आखि‍र ऐसा क्‍यों है कि सड़क पर चलते हुए, या किसी सुनसान गली में दूध-सब्‍जी लेने जाती, नौकरी से घर लौटती या किसी रात मां बाप की दवाई लेकर टेक्‍सी में घर लौटती लड़की को उतनी दहशत होती है, जितनी दहशत अपनी आंखों में बदनीयत लेकर घूमने वाले आवारा बलात्‍कारियों को होना चाहिए।

क्‍यों एक लड़की को अपने ही दोस्‍त से डर लगता है, अपने ही किसी रिश्‍तेदार से डर लगता है अपने ही किसी पड़ोसी से वो खौफ खाती है।

आखि‍र क्‍यों दुष्‍कर्म का यह सिलसिला खत्‍म नहीं होता, बल्‍कि‍ एक शहर से दूसरे शहर तक, एक मासूम से लेकर दूसरी मासूम तक बेहद बेरहमी के साथ और बर्बरता के साथ यह चलता रहता है।

क्‍योंकि दुष्‍कर्म करने वाले हर अपराधी ने हर उस चीज से डरना बंद कर दिया है, जो कानून के दायरे में आती है और सिस्‍टम के अधीन आती है। उसे खाकी वर्दी से डर नहीं लगता, उसे सजा से डर नहीं लगता, उसे फांसी से दहशत नहीं होती, उसे काल कोठरी से खौफ नहीं होता।

क्‍योंकि जिसे हम सजा कहते हैं,  वो अपराधी के लिए घमंड की बात है, उपलब्‍धि‍ है, जिसे हम कानून के लंबे हाथ कहते हैं, वे बहुत छोटे हैं, जिसे हम फांसी का फंदा कहते हैं, वो बेहद लचीला है। उसमें अदालत है, जिरह है, जमानत है, पैरोल है। और सबसे ज्‍यादा उसमें इंसाफ की उम्‍मीद है, जो कभी खत्‍म नहीं होती, जिसमें पीडि‍त की पैरों की एडि‍यां घि‍स जाती है, उसकी उम्‍मीद मध्‍दम पड़ जाती है और उसका हौंसला पस्‍त हो जाता है। जबकि वहीं अपराधी हथकड़ि‍यां पहनकर भी आंख में आंख डालकर थाने से अदालत तक ऐसे जाता है, जैसे उसने कोई उपलब्‍धि‍ हासिल की हो, जैसे उसने अपनी मर्दानगी का सबूत दे दिया हो।

क्‍योंकि जिसे हम कानून कहते हैं, वो अपराधी के जुर्म के हौंसले के सामने बेहद बौना है। जिसे हम सजा कहते हैं वो अपराधी के लिए सुर्खि‍यां हैं। जिसे हम फांसी कहते हैं वो अपराधी के लिए बहुत लचीला और ढीली गठान का महज एक ऐसा बेबस फंदा है, जिसे देखकर वो उसका उपहास उड़ाता है और उसके खौफ को जेब में रखकर निकल पड़ता है एक दूसरी निर्भया को अपना शि‍कार बनाने के लिए...

इसलिए शहर खत्‍म हो जाएंगे, निर्भया खत्‍म हो जाएगीं, लेकिन उसे कुचलने वाले हाथ कभी खत्‍म नहीं होंगे और मां-बाप की सिसकियां खत्‍म नहीं होगीं।

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