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मृत्युपूर्व चेतना के लौटने का चमत्कार

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Pre-death consciousness
मृत्यु से पूर्व किसी किसी के संपूर्ण चेतना के लौट आने के बारे में कई लोगों से सुना हूं। खुद में यह दुर्लभ होता है और रोमांचक भी। अगर किसी को अल्जाइमर (एक लाइलाज रोग जिसमें रोगी की याददाश्त तीन चार साल के बच्चे जैसी हो जाती है) हो तब तो मृत्यु पूर्व उस व्यक्ति की चेतना का लौटना किसी चमत्कार से कम नहीं। आज मैं एक ऐसे ही चमत्कार की चर्चा करने जा रहा हूं। चूंकि ये घटना मेरे पिताजी से जुड़ी है और बताने वाली अम्मा (मेरी माता जी) हैं, इसलिए मैं इसे झूठ तो हरगिज नहीं मान सकता।
 
मेरे पिताजी का नाम मंगला प्रसाद पांडेय था। वह दुबले पतले शान्त, संयमी और सात्विक इंसान थे। खुद का कोई शौक नहीं था। दो धोती, दो कुर्ते एक जोड़ी चप्पल और एक जोड़ी बरसाती जूता और ठंड में स्वेटर। यही उनकी साल भर की जरूरत थी। घर असुरचूंगी के पास था।घर से उनके कार्यस्थल गोरखपुर के लोको कारखाने की दूरी करीब 15 मिनट की थी। आना जाना पैदल ही होता था। वापसी सब्जी लाने के लिए झोला जरूर ले जाते थे।
 
साल 2000 के शुरुआत में उनको तेज आवाज से तेज सरदर्द होने लगा। शरीर भी थोड़ा ऐंठ सा गया। खाने और पीने से बिल्कुल अरुचि हो गई। बड़े भाई साहब बजरंगी पांडेय डॉक्टर थे। उन्होंने अपने कॉलेज केजीएमयू लखनऊ से पढ़े मनोरोग विशेषज्ञ डॉक्टर सीबी मद्धेशिया को बाबूजी को दिखाया। डायग्नोस हुआ डिप्रेशन है। इलाज शुरू हुआ। पर कोई लाभ नहीं। स्थित न सुधरने पर मैं पिताजी को लेकर मेडिकल कॉलेज न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर एके ठक्कर के पास गया। वो नहीं थे। सोचा न्यूरोसर्जन डॉक्टर राकेश सक्सेना से ही सलाह ले लूं। वह सीढ़ियों पर ही मिल गए। मिलते ही पूछा कैसे? मैंने बताया कि पिताजी को ही दिखाना है। रोग के बारे में संक्षिप्त जानकारी लेकर उन्होंने सीटी स्कैन के लिए लिखा। साथ ही यह भी कहा कि एक बार सिटी स्कैन की रिपोर्ट को डॉक्टर ठक्कर को दिखा देना।
 
अगले दिन मैं सिटी स्कैन की रिपोर्ट के साथ मैं डॉक्टर ठक्कर से मिला। रिपोर्ट देखकर उन्होंने कहा रोग तो बुरा है। यह सुनकर मेरा चेहरा उतर गया। मैंने कहा, सर जो भी संभव है वह आप लोगों के सहयोग से करूंगा। उन्होंने मेरे चेहरे की ओर देखा। कहा गिरीश अल्जाइमर है। यह फिलहाल लाइलाज है। अगर इलाज होता तो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन जो इस रोग से पीड़ित हैं उनका इलाज सबसे पहले होता। आज वह क्या थे? कहां हैं? उनको कुछ भी पता नहीं। समय बीतने के साथ याददाश्त चार पांच साल के बच्चे जैसी हो जाती है। फिर जीवन सिर्फ रोगी की सेवा पर निर्भर है।
 
उदास होकर पिताजी को लेकर घर लौटा। अभी स्थित ठीक थी। लिहाजा अम्मा उनको गोरखपुर से लेकर गांव चली गईं। बारिश का समय था। रात किसी वक्त पिताजी वॉशरूम के लिए आंगन में आए फिसलने से उनका एक पैर टूट गया। सूचना पाकर मैं गांव जाकर उनको लाया। चिकित्सकों से सलाह ली। उन लोगों ने कहा जो रोग है और जो उम्र है, उसमें प्लास्टर का परंपरागत तरीका ठीक नहीं रहेगा। ऑपरेशन के बाद प्लेट लगा देने से कुछ दिन बाद चलने फिरने लायक हो जाएंगे।
 
दुर्भाग्य से ऑपरेशन सफल नहीं हुआ और संक्रमण हो गया। संक्रमण भी ऐसा जो ठीक होने का नाम ही न लें। सारी दवाएं बेअसर। कई दिन उनको लेकर मेडिकल कॉलेज के प्राइवेट वार्ड में रहा। सुबह का नाश्ता मैं लेकर जाता। दोपहर का खाना बच्चों के स्कूल से लौटने के बाद पत्नी ले जाती थीं। रात में जब मैं अखबार के दफ्तर से लौटता तो फिर पत्नी के साथ खाना लेकर मेडिकल कॉलेज जाता। पिताजी को खिलाकर और बिस्तर पर लिटाकर वापस आता। अम्मा की रात वहीं गुजरती। सुबह जब मैं नाश्ता लेकर जाता तो अम्मा दैनिक क्रिया के लिए साथ ही घर वापस आ जाती थीं। उसके बाद फिर पिताजी के पास लौट जातीं।
 
कुछ दिन ऐसे ही चले। संक्रमण जस का तस। लिहाजा डॉक्टर ने दवा और रोज पट्टी करन की सलाह देकर डिस्चार्ज कर दिया। मरहम पट्टी की ड्यूटी मेडिकल कॉलेज के उसी विभाग के कंपाउंडर शुक्ला जी की थी। दूसरे तीसरे दिन के अंतराल पर आर्थो से एमएस कर रहे डॉक्टर राघवेंद्र आकर देखने के साथ मरहम पट्टी भी कर जाते थे। बिस्तर पर पड़े पड़े और रोग भी होने लगे। मैंने अपने फैमिली डॉक्टर आलोक गुप्ता से देखने का अनुरोध किया। वह आए। देखे। मैं उनको मुख्य सड़क तक छोड़ने गया। पूछा तो जवाब था, पिताजी की बाकी उम्र आप लोगों की सेवा पर निर्भर है।
 
फिर वह दिन आ ही गया। साल था 2001 और तारीख थी 22 मार्च। उस समय पिताजी की उम्र करीब 70 साल की रही होगी।  रात करीब 9 बजे मैं अपने कार्यस्थल दैनिक जागरण अखबार से घर आया। रोज की तरह पिता जी को हमने अम्मा, पत्नी की मदद से बिस्तर पर ही उठाकर खाना खिलाया। शरीर का मूवमेंट बना रहे इसके लिए कुछ देर के लिए उनको कुर्सी पर बिठाया। 
 
कुर्सी पर बैठते ही उनकी आंखे उलट गई और सर एक और लुढ़कने लगा। मैंने और पत्नी ने जल्दी से उन्हें बिस्तर पर लिटाया। कोई उनका तालू सहला रहा था कोई सर। अम्मा व्यग्र होकर सुनिए सुनिए चिल्ला रहीं थीं। बाबूजी ने अम्मा की सुन ली। और वापस आ गए।

मौत के कुछ घंटे पहले ही दे दिया था संकेत

उनकी ओर से यह संकेत था कि अब इस शरीर को छोड़ने का समय आ गया है। आभास सबको था, पर पत्नी और लंबे साथ के नाते अम्मा को सबसे अधिक। खा पीकर हम लोग अपने कमरे में सोने चले गए। इस उम्मीद के साथ कि अम्मा भी रोज की तरह सो जाएंगी। 

उस रात की बात

बकौल अम्मा उस रात वह सोई नहीं। बाबूजी के सिरहाने ही बैठी रहीं। करीब आधी रात को पिता जी ने इशारे से अम्मा को पास बुलाया। कहा..गायत्री मैं अब जा रहा हूं। जाते जाते तुमको जो तीन बातें मैं तुमको बता रहा हूं उसे ध्यान से सुनना। गिरीश के ही साथ रहना। उसकी बातों पर भरोसा करना और मैंने जिसको भी थोड़ा बहुत पैसा दिया है, उसे माफ कर देना। इसके बाद पिताजी इस दुनिया के दुख, सुख, चिंता, आशा और निराशा से दूर चले गए।

मृत्यू पूर्व बाबूजी की चेतना को लौटना चमत्कार था तो अम्मा का साहस भी बेमिसाल

पिताजी की मौत देर रात हुई, पर अम्मा ने मुझे सुबह उजाला होने पर जगा कर इसकी सूचना दी। उसके पहले वह इसकी सूचना देने करीब एक किलोमीटर दूर दीदी के घर गईं। कभी मैंने पूछा कि अम्मा तुरंत या पहले क्यों नहीं जगाईं। अम्मा का जवाब था..जगने पर जब सब तुमको ही करना था तो सोची कि जब तक संभव है आराम ही कर लो। बाद में पत्नी ने बताया कि इस दौरान अम्मा को कई उल्टियां और दस्त भी हुईं, यकीनन रोई भी होंगी। थोड़ा नहीं बहुत पर, वाकई कुछ प्रेम ऐसे होते हैं जो जीवन भर मौन रहते हैं और विदा के समय भी दूसरों की चिंता करते हैं।

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