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Vikas dubey encounter: सही-गलत से परे अंतत: कोई स्थाई समाधान तो नि‍कले

गरिमा संजय दुबे
जिस दिन हम पैदा होते हैं उसी दिन यह तय होता है कि किसी दिन हमें खत्म हो जाना है, लेकिन किस दिन यह हमें नहीं पता होता, यही जीवन का सबसे बड़ा आकर्षण है और मृत्यु का भी।

लेकिन जिसे पता हो कि अब से कुछ घंटे बाद उसकी मौत हो जाएगी, उसकी भाव दशा क्या होती होगी? एक और बात जिसे पता होता है  कि उसे थोड़ी देर बाद किसी को मार देना है उसकी भाव दशा? तीसरी बात जो आत्महत्या के रूप में अपनी जान लेने वाला होता उसके मन में क्या चल रहा होता है? इस पर बात फिर कभी...

जाना ही है संसार से फिर भी मनुष्य तमाम तरह के छल, कपट, प्रपंच, भ्रष्टाचार, व्याभिचार, हिंसा से बाज़ नहीं आता। मर जाता है किसी दिन, अचानक सोये-सोये, कभी बीमारी से, कभी आत्महंता बन, कभी दुर्घटना में तो किसी दिन किसी गोली से...। छोड़ जाता है सवाल सामाजिक, राजनीतिक, न्यायिक, प्रक्रिया या व्यवस्था की असफलता के।

हर ऐसी मृत्यु जो स्वभाविक नहीं है, बहुत असहज कर देती है। एक व्यक्ति, एक समाज, एक व्यवस्था के तौर पर हमारी असफलता के ढेरों प्रश्नों के साथ। समझ नहीं आता किसे सही कहें किसे गलत, एनकाउंटर को गलत कहते हैं तो अपराधी के आतंक से पीड़ित चेहरे और उसके अपराध की लंबी श्रृंखला आंखों के आगे तैरती है।

एनकाउंटर को सही कहते हैं तो अपनी खुद की बनाई व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाने होते हैं, जिसने बरसों से न्याय में देरी की वो त्रासदियां रची हैं कि न्याय एक भ्रम लगने लगा है।

एनकाउंटर को सही कहते हैं तो अपने भीतर ही कुछ कचोटता है कि हम किस बात पर खुश हो रहें हैं, क्या हमारे पास अब यही विकल्प शेष है?

जाने-अनजाने अपराधी से जुड़े उसके परिवार के चेहरे आंखों के आगे आते हैं और हमें विचलित करते हैं।

एनकाउंटर को गलत कहते हैं तो अन्याय, हिंसा में अपना सबकुछ खो चुके लोगों के सवाल परेशान करते हैं कि इन्हें न्याय कैसे मिलेगा? लेकिन क्या न्याय की यही परिभाषा हो सकती है?

मैं नहीं जानती सही गलत क्या है, लेकिन जो असहज कर दे वो सही नहीं हो सकता। आठ पुलिसकर्मियों की बर्बर हत्या भी असहज करती है। हर हत्या असहज करती है। वसीम बारी की हत्या भी, पालघर के साधुओं की भी, हर वो हत्या जो अपना झूठा वर्चस्व या विचार की स्थापना के लिए की जाती है, हर संवेदनशील मन को विचलित करती है।

क्यों यह भय आ गया हममें कि बरसों जेल में रहेगा और किसी न किसी विचारधारा पर सवार हो राजनीतिक व्यक्तित्व बन जाएगा। शाहबुद्दीन से लेकर हर वो अपराधी जो न्याय व्यवस्था की पतली गलियों का लाभ ले हमारा मज़ाक उड़ाता है, एक प्रश्न खड़ा करता है हमारे सामने। क्या यही विकल्प बाकी हैं। या तो अपराधी का एनकाउंटर कर उसे समाप्त करो या उसे झेलते रहो और किसी दिन उसे नेता बना देखो।

आखिर राजनीति कब अपराधियों को संरक्षण देना बंद करेगी। लेकिन जो व्यवस्था (सदा से, 2014 के बाद नहीं) अपराधियों के बिना चल ही नहीं पाई क्या वह इसे अपराध और अपराधी मुक्त करने का प्रयास भी करेगी। इन अपराधियों को बनाने वाले, बचाने वाले और काम हो जाने पर उन्हें खत्म कर देने वाले लोगों तक कब हाथ पहुंचेंगे। क्यों बड़ी मछलियां हर बार जाल बुनती हैं, कभी जाल में फंसती नहीं।

अपराध को अपराध, हिंसा को हिंसा ही कहिए, कभी धर्म, कभी जाति, कभी प्रदेश, कभी पार्टी, कभी विचारधारा की आड़ लेकर किसी को भी मासूम बनाने या मानने की बात कहकर अपराधियों के हौसले बुलंद मत करिए। अपराधी जानता है कि अपने निजी स्वार्थ की पूर्ति के लिए इनमें से किसी की आड़ लेकर कोई न कोई उन्हें बचाने आ ही जाएगा।

हमारी न्याय व्यवस्था, कानून व्यवस्था में बड़े सुधार की जरूरत है। कश्मीर से लेकर, बंगाल, केरल, उत्तर पूर्व, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, पालघर और भी राजनीतिक संरक्षण से पैदा हुए अपराध, आतंकवाद, हिंसा का क्या जवाब होगा।

इस तरह की घटनाएं सतही, क्षणिक न्याय का भ्रम तो पैदा कर सकती हैं, कुछ हद तक पीड़ित के लिए खुशी और संतोष का सबब तो बन  सकती हैं, लेकिन यह स्थाई समाधान नहीं हो सकता। दुनिया के हर देश में पुलिस, अपराधी, राजनीति के अंतरसंबंध में ऐसी घटनाएं होती रही हैं, पुलिस के काम करने का ढंग कई बार इस तरह से सामने आता है जो आम इंसान को परेशान करता है। लेकिन सही-गलत से परे अंतत: कोई स्‍थाई समाधान तो निकले।

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