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मेरा ब्लॉग : मनु(ष्य) एक सामाजिक प्राणी है.....

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मनु
“मम्मा, मेरा ब्लू टी-शर्ट कहां है, स्पाइडर मैन वाला?” मनु स्कूल से लौटा ही है। 
 
उसके तेवर देखकर मम्मा को कुछ-कुछ अंदाज़ा तो हो ही गया है, “क्यों, क्या हुआ बेटू?”
 
“आपने वह सुनीता आंटी के गुलशन को दिया न? मैंने देखा अभी उसे पहने हुए।” मनु का स्वर संतप्त है और चेहरा लाल। 

“राजा बेटा! वह तुम्हें छोटा हो गया था और ....”
 
“पर मम्मा, वह मेरा फेवरेट था, आपने मुझे बताया भी नहीं।”
 
“मनु, सारे ही तुम्हारे फेवरेट होते हैं और बताने पर तुम देने देते क्या? और सोचो, हमारी ज़रा-सी मदद से किसी को कितनी ख़ुशी मिल सकती है”
 
“मेरे अलावा आपको सबकी फ़िक्र है।”
 
“मनु......? हे ईश्वर...” मम्मा ने आह भरी। मनु ऐसा क्यों होता जा रहा है? बचपन में कैसा सरल सहृदय बच्चा था। जिस उम्र में बच्चे अपने खिलौने छूने भी नहीं देते हैं, ये उदारमना महाशय नए खिलौने मुक्तहस्त से दोस्तों में बांट आते थे। शेयर करना सिखाया तो चॉकलेट का एक ज़रा सा टुकड़ा हो, तब भी भोली-सी मुस्कान लिए घर भर में सबसे पूछता फिरता, “मम्मा दूँ?” “पापा दूँ?” और तो और एक बार गाय को देने के लिए रोटी नहीं मिली तो आधा किलो सेब गाय का आहार बन गए। 
 
बल्कि संवेदनशील तो मनु अब भी है।  ट्रैफिक सिग्नल पर छोटे बच्चों को सामान बेचते देख या किसी कुत्ते के पिल्ले को ठंड में कुडकुडाता देख उसके चेहरे पर पीड़ा और सहानुभूति की रेखाएं तुरंत उभर आती हैं। फिर मम्मा पापा को कोई उपाय करना ही पड़ता है। 
 
इन दिनों अपनी चीज़ों को लेकर मनु में अजीब पज़ेसिवनेस आ रही है। क्या इकलौता है, इसलिए? नहीं, पर यह स्थिति हमेशा से है और परसों प्रियांश और सनी की मम्मी भी यही शिकायत कर रही थीं, उनके तो छोटे-बड़े भाई बहन है। शायद उम्र का असर है। परिपक्वता की ओर पहले कदम की अनुभूति। बड़े होने का नया-नया अहसास। अपना स्वतंत्र अस्तित्व और उससे उपजा अपना निजी संसार। इस निजी संसार में अपनी चीज़ों पर वे सिर्फ खुद का अधिकार मानते हैं और यह जताना उन्हें तुष्टि भाव देता है। सच है, बिना पूछे, बताए मनु की टी-शर्ट देकर मम्मा ने इसी अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी, तो विरोध तो होना ही था। गलती तो हुई है। 
“बेटू, सॉरी... मुझे तुमसे पूछना चाहिए था, टी-शर्ट देने से पहले।”
 
“ओ, मम्मा.. प्लीज़!  आप सॉरी-वोरी मत बोलो न... टी-शर्ट सच में छोटी ही हो गई थी।” मनु ने मम्मा के गले में बाहें डालते हुए कहा। 
 
मम्मा का मन अब भी बेचैन है। माना, मनु का अपना निजी संसार है। पर क्या उसका झरोखा कभी भी दूसरों के लिए नहीं खुलना चाहिए? अपने हिस्से की छांव दूसरों के साथ बांटने का भी अपना ही सुख है। खासकर उनके साथ जिनकी ज़िंदगियां उतनी रौशन नहीं हैं और यह समझाने सिखाने का मसला नहीं। यह उसे खुद ही महसूस करना चाहिए। 
 
“मम्मा, कितना बोरिंग स्कूल है मेरा। सीनियर सेक्शन में दूसरे स्कूल के बच्चे 4-5 दिन की ट्रिप पर जाते हैं, शिमला, मनाली..। और हम कहां जा रहे हैं- ‘ऑरफ्नेज’...अनाथालय। उसके बाद पास में ही जंगल सफारी और उसी दिन वापस।”
 
(क्या कुछ प्रश्न अपने-आप हल हो जाते हैं? मम्मा ने सोचा।)
 
“ठीक है, बेटा। कुछ सोचकर ही ट्रिप प्लान की होगी। देखना, तुम लोग खूब एन्जॉय करोगे और तुम्हारे दोस्त साथ हैं ना, फिर बस।”
 
सुबह छह बजे स्कूल पहुंचना है और मनु तैयार है।
 
“मनु, ये स्नैक्स वाला टिफ़िन है और ये लंच। बस से हाथ बाहर मत निकलना और जंगल में सबके साथ रहना और .....”
“ओके, ओके, बाबा! आप चार बार बता चुकी हो| डोंट वरी... मैं सब ध्यान रखूंगा.....बाय।”
 
रात के साढ़े नौ बजे हैं। बच्चों के शोर के साथ बसें स्कूल कैंपस में प्रवेश कर रही हैं। 
 
“पापा बड़ा मज़ा आया। जंगल सफारी सुपर थी और वहां एक झरना भी थास हम लोग बहुत देर तक पानी में पैर डाल कर बैठे थे।”
“तो सीधे वहीं पहुंचे क्या?” मम्मा अपनी जिज्ञासा रोक ही नहीं पा रही है। 
 
“नहीं, पहले ऑरफ्नेज गए थे| ब्रेकफास्ट वहीँ था।”
 
“और ....?”
 
“और ...मैं बहुत थक गया हूं। एक कप गरम दूध दो न। और कल देर तक सोऊंगा, प्लीज।”
मनु को ट्रिप से आकर हफ्ता बीत गया है| मम्मा ने अनुभव किया कि अनाथालय के बारे में बात करना मनु टाल रहा है। मम्मा ने भी दुबारा बात नहीं छेड़ी।पर न जाने क्यों लग रहा था कि मनु के मन में कुछ हलचल जरुर है। 
 
सर्दियों का अलसाया सा इतवार। गुनगुनी धूप मनु के कमरे में छिटक आई है। मनु फर्श पर ढेर सारा सामान फैलाए बैठा है।
“रूम की सफाई ? ओ हो ..! आज यह मुहूर्त कैसे निकला ?” 
 
“आज सुबह श्री श्री 1008 मनु महाराज ने साक्षात् दर्शन दिए, जब मैंने गलती से आईना देखा तब, और उन्होंने ही यह प्रेरणा दी..”  
“अच्छा? तो आपके मनु महाराज ...”
“अ हं, श्री श्री 1008 मनु महाराज...”
“हां, वही..! उन्होंने ये ज्ञान भी दिया होगा कि जितना भी आप फैलाएंगे, उसे समेटना भी आपको ही होगा।” मम्मा जानती है, मनु की आदत। सफाई के नाम पर खूब सारा सामान निकाल लेना और फिर जमाने में आलस। बाकी काम मम्मा के हवाले... 
 
“जी, नहीं...उन्होंने कहा है, जीवन नश्वर है| (मनु टीवी पर आने वाले प्रवचनों के तर्ज पर बोल रहा है|) अत: हे बालक! समेटना नहीं है, बांटना है। चीज़ें भी और खुशियां भी ...। ” मनु ने अलग निकाल कर रखे सामान की तरफ इशारा किया। 4-5 जोड़ी कपड़े, स्वेटर, खिलौने, स्कूल बैग ...मनु अब इनका इस्तेमाल नहीं करता है। मम्मा को एक क्षण लगा समझने के लिए .......
 “मनु...” मम्मा को अपना ही स्वर कांपता-सा महसूस हुआ। 
 
“अरे यार! अब इसमें सेंटी होने जैसा कुछ नहीं है, ओके... अच्छा, देव और सार्थक मेरा इन्तजार कर रहे होंगे, मैं चला खेलने .... और हां, आज प्लीज़ रूम जमा देना न...अगली बार मैं पक्का काम पूरा करूंगा, प्रॉमिस। ”
 
मम्मा पुरानी चीज़ों में से मनु के विदा होते बचपन की खुशबू को सहेजने का प्रयास कर रही है।   

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