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महिला समानता दिवस :साहित्य व समाज में आज भी है लैंगिक भेदभाव

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ज्योति जैन

साहित्य व समाज में लैंगिक भेदभाव इस विषय का तात्पर्य है कि लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ आज भी भेदभाव है। परंपरागत रूप से समाज में महिलाओं को कमजोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा  है वह घर समाज दोनों जगहों पर शोषण अपमान व भेदभाव से पीड़ित होती है। बेशक यह बात हर कहीं... हर किसी के साथ लागू ना हो... लेकिन एक बड़ा वर्ग इसकी चपेट में है।
 
 खबरों के अनुसार सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की एक उच्च स्तरीय बैठक में एजेंडा 2030 के अंतर्गत 17 सतत विकास लक्ष्यों को रखा गया था... जिसे भारत सहित 193 देशों ने स्वीकार किया था।
 
इन लक्ष्यों में लैंगिक समानता को भी शामिल किया गया था। जाहिर है हमारे समाज में विकास के लिए लैंगिक समानता कितनी जरूरी है। लेकिन साथ ही दुर्भाग्यपूर्ण भी कि लगभग 1405 में जब क्रिस्टीन डी जिजान ने अपनी पुस्तक द बुक ऑफ़ लेडीज में लिखा था कि महिलाओं पर पक्षपात पूर्ण पूर्वाग्रह के आधार पर अत्याचार किए जाते हैं। इस पर हम आज भी.. यानि तब से अब तक हम यह डिबेट ही कर रहे हैं या करना हमारी आवश्यकता है...तो यह दुर्भाग्यपूर्ण ही तो है। 
 
हम जानते हैं कि अन्य प्राणियों की तुलना मे मनुष्य एक बेहतर नस्ल है.. और वह खुद को जानवरों से बेहतर मानता है..। लेकिन यही समझदार प्राणी लैंगिक भेदभाव में सबसे ऊपर है। और आज भारत में सबसे खतरनाक तथ्यों में से एक यह है कि लैंगिक असमानता या लैंगिक भेदभाव आज भी है। समाज व साहित्य के अलावा जो मूल रुप से स्वास्थ्य.. शिक्षा ...राजनीतिक... आर्थिक... हर पहलू में नजर आता है।
 
जब लैंगिक भेदभाव की हम बात करते हैं तो फिर स्त्री की आजादी की बात उसके साथ जुड़ी रहती है..। और जब हम स्त्री की आजादी की बात करते हैं या समानता की बात करते हैं ..तो सबसे पहले उन कानों को जन्म देना होगा जो स्त्री को सुनना सीख सकें। अकादमिक आयोजन... पत्र- पत्रिकाओं मे स्त्री लेखकों के आलेखों.. सोशल मीडिया.. सब जगह  स्त्रियों की संख्या निरंतर बढ़ती दिखाई देती है..। पर क्या सचमुच...?
 
 स्पष्ट तौर पर तो सुनती आई हूं कि संविधान में स्त्री-पुरुष सब बराबर है। मध्यवर्गीय नौकरीपेशा परिवार का हिस्सा रही... तो वहां भी यही देखा कि स्त्रियों को पढ़ने लिखने की... हंसने बोलने की ...खाने पीने की... नौकरी करने जैसी बुनियादी सुविधाएं प्राप्त है। लेकिन फिर भी कहीं ना कहीं महसूस करती थी कि लैंगिक असमानता तो है। महसूस होता था कि भारत में लैंगिक समानता आज भी एक दूर का सपना है..।
 
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सारी शिक्षा, उन्नति, आर्थिक विकास के बावजूद कई राष्ट्र लैंगिक असमानता से पीड़ित हैं व भारत उनमें से एक है। लिंग आधारित श्रम विभाजन विषमताओं, समस्याओं, द्वंद और फिर विमर्श को जन्म देता है। आधुनिक समाज की परिस्थितियों में इसे आसानी से देखा जा सकता है। पुरुष की परंपरागत सोच कि 'वह श्रेष्ठ है' से वह निकलना नहीं चाहता और स्त्री इस परंपरागत सोच कि 'वह पुरुष के आधीन है' में अब रहना नहीं चाहती।

 कन्हैयालाल नंदन ने इसे परंपरा और आधुनिकता के मध्य की मूल व सीमित सोच का परिणाम माना है। आधुनिक समय स्त्री को आधुनिक तो बनाना चाहता है... परंतु जड़ परंपरा को त्यागना नहीं चाहता। वास्तविकता यह है कि परिवार की आय जुटाने के साथ स्त्री वह कार्य भी करती है जो परंपरागत रूप से उसके लिए निर्धारित हैं तथा परिवार को बनाए रखने के लिए जरूरी है। स्त्री के इसी पूर्ण समर्पण की अनदेखी असमानता या भेदभाव को और अधिक बड़ा कर देती है।
 
 मैं यहां भारत के सबसे सशक्त माने जाने वाले उन दो विषयों की बात करूं, जो पूरे देश की जनता को जोड़ते हैं.. और जनता के बीच गहरी पैठ रखते हैं..और  जनता को दिवाना बनाते हैं...। और वह हैं क्रिकेट और सिनेमा..
 दोनों ही क्षेत्रों में पारिश्रमिक की असमानता तो जग जाहिर है और लोगों को लगता है कि यह असमान परिश्रमिक ही लैंगिक असमानता है .. जबकि इससे इतर भी, 25 साल का हीरो भी और 50 साल का हीरो भी 18 साल की लड़की से रोमांस कर सकता है। लेकिन 40-50 साल की हीरोइन को मां के रोल ऑफर हो जाते हैं।  
 
क्यों हम ऐश्वर्या राय को रणवीर कपूर के साथ रोमांस करते नहीं देख सकते... क्यों हम उसे पचा नहीं पाते..?
 इसके अलावा मी टू या कास्टिंग काउच के मामलों में भी स्त्री ही पीड़ित होती है.। हम कहां लैंगिक समानता पाते हैं..? अभिनेता व अभिनेत्री दोनों ही समान रूप से मेहनत करते हैं... समान रूप से पसीना बहाते हैं और समान वक्त देते हैं। लेकिन मेहनताना असमान..।
 
 इसी प्रकार क्रिकेट को देखें तो महिला क्रिकेट टीम की कितनी खिलाड़ियों के नाम आप जानते हैं...?  या क्या आपको याद है कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम कब आखरी बार जीती थी या कब आपने उसे खेलते देखा... या कब किसी महिला क्रिकेटर को टीवी पर किसी विज्ञापन फिल्मों में देखा...? 
 
यदि इंदौर की महिला क्रिकेट खिलाड़ी की भी बात करें तो शायद मिताली राज को आज के युवा फिर भी जानते होंगे ....लेकिन इससे पहले डायना एडलजी, संध्या अग्रवाल और उसके भी पहले ज्योत्सना पटेल और राजेश्वरी ढोलकिया के नामों को शायद ही कोई जानता होगा।
 
और क्रिकेट को ही देखें तो कमेंट्री के क्षेत्र में भी ऐसा लगता है कि पुरुष वर्चस्व महिला कमेंटर को आगे नहीं आने देना चाहते।  जबकि भारत की पहली महिला क्रिकेट कमेंटेटर चंद्रा नायडू इंदौर से ही हैं और एक नाम अभी अंजुम चोपड़ा का सुनने को मिल जाता है। बस... इसके अलावा महिला क्रिकेट कमेंटेटर को कोई स्थान नहीं है।
 यह दोनों ही क्षेत्र वह माध्यम है जो सीधे जनता के दिलों से जुड़े हैं... तो इन माध्यमों से भी जनता में लैंगिक असमानता का ही संदेश जाता है..। कहीं ना कहीं से इन क्षेत्रों से भी जेंडर इक्वलिटी के स्वर मुखर होने की आवश्यकता है।
 
 इसी प्रकार विंबलडन में भी पुरुष खिलाड़ी की राशि महिला खिलाड़ी की राशि से कहीं अधिक होती है।
 हालांकि विलियम्स सिस्टर्स ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है... लेकिन फिर वही लगता है कि उस आवाज को सुनने वाले कान तो पुरुष के ही है ना..!  हम इतने बड़े स्तर पर भी लैंगिक भेदभाव का सामना करते हैं..।
 और मैं समझती हूं लैंगिक समानता तब प्राप्त होगी जब लड़का-लड़की या स्त्री -पुरुष को दो व्यक्तियों की तरह समान रूप से व्यवहार किया जाएगा... ना कि दो लिंगों की तरह से। और इस समानता का अभ्यास घरों से.. स्कूल से.. कॉलेजों से.. कार्यालयों आदि से किया जाना चाहिए..।
 
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कहीं कहीं पर समानता का बदलाव सुखद लगता है और इस समानता का बीज समाज की सबसे छोटी मानी जाने वाली इकाई घर परिवार से ही अंकुरित होना चाहिए। लेकिन विडंबना यह है कि गर्भ में ही असमानता की शुरुआत हो जाती है।गर्भस्थ कन्या सुरक्षित जन्म ले पाएगी भी या नहीं... देश के कई हिस्सों में तो यह डर भी रहता है। गर्भ से लेकर छोटी कन्या.. किशोरी.. युवती सभी को लैंगिक समानता की दरकार है। 
 
लैंगिक समानता का मतलब यह भी होगा कि महिलाएं स्वयं को सुरक्षित महसूस करें.. और किसी भी प्रकार की हिंसा का डर उन्हें ना हो। हिंसा यानि मारपीट या शारीरिक प्रताड़ना ही नहीं है बल्कि मानसिक प्रताड़ना भी हिंसा ही है। एक स्त्री को यह महसूस करवाना कि तुम स्त्री हो इसलिए तुम्हें सहन करना पड़ेगा.. यह भी हिंसा ही है।
 वह महिला है इसलिए फलां काम के योग्य नहीं.. यह जताना भी हिंसा ही है। मानसिक रूप से पुरुषों के मुकाबले अधिक ताकतवर स्त्री को दबाव सहित यह बताना कि तुम पुरुष से कमजोर हो.. यह भी हिंसा ही है।
 
 
देश में असमान लिंगानुपात भी इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में आज भी लैंगिक समानता पर बहुत कार्य बाकी हैं। और यह दोष किसी धर्म या जाति विशेष का नहीं है.. बल्कि पूरा समाज ही संक्रमित है।
 और यह संक्रमण तो कोरोना से भी बड़ा नजर आता है जो कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा। इसमें हमें पॉजिटिव रहना आवश्यक है। चंद एक उदाहरणों को छोड़ दें तो आज भी हमारे सामाजिक ढांचे में बेटे के जन्म पर ही प्रसन्न हुआ जाता है।
 
 
बेटियां लायबिलिटी या बोझ ही समझी जाती हैं। हमारे संस्कार हमारी परंपराएं यह सब हमें लड़कियों से ही अपेक्षित रहते हैं.. लड़कों से क्यों नहीं रहते...? गत दिनों देखी गई एक फिल्म थप्पड़ याद आ गई..।
 यदि पति पत्नी को थप्पड़ मार दे तो कोई विशेष बात नहीं..। उसे समझाया जाता है कि चल कोई नी...मार दिया तो क्या.... ! आदमी है....परेशान है...गुस्सा आ गया?। यहां तक कि लड़की की मां व सास भी हमारे समाज में यही कहती हैं कि.. "हमने क्या कम गालियां और मार खाई है तुम्हारे बाबू जी की...?" और यदि कभी पत्नी पति को थप्पड़ मार दे तो....? वह भी दफ्तर के तनाव से परेशान रहती है...उसे भी गुस्सा आ सकता है ..तब...! क्या तब भी ऐसी ही प्रतिक्रिया होगी...?  बिल्कुल नहीं..  !
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जेंडर इक्वलिटी पर एक और कुठाराघात..। 
 
गौरतलब है कि यह आवश्यक नहीं कि लड़कियां भी मदिरा, सिगरेट आदि का नशा करें.. क्योंकि बात समानता की हो रही है..। बल्कि होना यह चाहिए कि बुराई को लड़के भी त्यागें..। उन्हें भी बुराइयों का त्याग करना चाहिए..।
 परंपराओं में अच्छे मूल्यों का हस्तांतरण हो लेकिन बाकी को तो तोड़ना पड़ेगा। नए मूल्य स्थापित करने होंगे..। दफ्तर आदि में भी इन नए मूल्यों को स्थापित करने की महती आवश्यकता है।
 
 कई बार हम देखते हैं कि किसी मीटिंग में स्त्रियां पुरुषों के मुकाबले बेहद कम अनुपात में हैं और मीटिंग देर तक चल रही है। उसका ब्लैडर भर चुका है मगर वह यह कहने में संकोच करती है कि मुझे लघुशंका के लिए जाना है या मुझे बाथरूम तक जाना है।
 
 जबकि पुरुष बड़े आराम से यह कहकर उठते हैं..हल्के होकर आते हैं..। और आराम से पान गुटखा भी खाकर आते हैं..। कहां है लैंगिक समानता..? 
 
साहित्य के क्षेत्र में हिंदी साहित्य में आप देखिए जो दलित साहित्य है उसमें भी पुरुषों का वर्चस्व है। अत्याचारों की साक्षी हमेशा ही स्त्रियां रही हैं लेकिन ऐसा लगता है कि उघड़ा हुआ लेखन शायद पुरुष ही करते हैं।
 
 मुझे याद आता है पूर्वोत्तर की कोई कवियित्री ..लेखिका ने कुछ ऐसी कविता लिखी थी कि.. मुझे ऐसे घर में ब्याहना.... "जहां यह.. ना हो... वह ना हो..  या "जहां यह हो... वह  हो...." ऐसे अपने मन की बात उस कविता के माध्यम से कही थी।
 
 उस पर बड़ा बवाल हुआ कि अब क्या लड़कियां तय करेंगी कि मुझे कैसे घर में ब्याहना है..! यानि.. स्त्री साहित्य में भी अपनी बात नहीं कर सकती। इसी प्रकार गीतकार देख लीजिए संगीतकार देख लीजिए...। गीतकारों में आपको पुराने समय से लेकर आज तक, जितने भी गीतकार हैं ,पुरुष हैं..। क्या स्त्रियां वे भावनात्मक गीत नहीं लिख सकती थीं...? लेकिन क्यों उन्हें आगे नहीं आने दिया गया..? एक बड़ा मीठा सा गीत याद आता है, कहां से आए बदरा.... जिसकी गीतकार इंदु जैन थीं। लेकिन गिनती की गीतकार भी कहां गुम हो जाती है...पता ही नहीं चलता। सारे लेखक..गीतकार.. सिर्फ पुरुष..।  
 
संगीतकार काफी पुराने समय में सरस्वती देवी रही करीब 1932 में..। उसके बाद उषा खन्ना और उसके बाद नई पीढ़ी की युवा संगीतकार इंदौर की बेटी स्नेहा खानवलकर..। इसके अलावा संगीतकार के क्षेत्र में कोई नाम देखने को नहीं मिलते हैं।
 
 इसी प्रकार बड़े अखबारों को देख लीजिए सभी में संपादक के रूप में आपको स्त्री नहीं मिलेगी सिर्फ पुरुष मिलेंगे..।
मुझे याद है ...इंदिरा गांधी की हत्या की खबर रेडियो पर जिन्होंने दी थी, वह देवकीनंदन पांडे थे। उन्हीं के समकक्ष दो महिला उद्घोषक रही,इंदु वाही और विनोद कश्यप..। लेकिन ये दोनों नाम लोगों के जेहन में कभी नहीं रहे..।
 यह लिंगभेद नहीं तो और क्या है..?
 
विभिन्न कार्य स्थलों पर लैंगिक असमानता के अलावा श्रम के क्षेत्र में भी यह असमानता नजर आती है।
 मुझे याद है जब मैं केरल गई ....हालांकि समय हो गया... लेकिन कुछ चीजें कहां बदली है...! तब केरल व तमिलनाडु की सीमा पर स्थित चाय के बागानों में काम कर रहे मजदूरों से मैंने सहज उत्सुकता से बात की थी।
 उनके काम करने के घंटे ...उनकी पगार... आदि के बारे में.। मुझे पता चला कि समान कार्य.. समान मेहनत के बावजूद स्त्रियों को पुरुषों से 20 कम मिलते थे 1 दिन की मजदूरी में। श्रम वही...घंटे वही.... कार्य कुछ ज्यादा ही इमानदारी से...लेकिन वेतन कम। जबकि ऐसा अनुमान है कि भारत में लैंगिक समानता का आर्थिक लाभ हो सकता है।
 
अगर महिलाओं के साथ भेदभाव ना किया जाए तो 2025 तक देश की जीडीपी में इजाफा हो सकता है । देश की श्रम शक्ति में महिलाओं की समान भागीदारी से देश के आर्थिक विकास को एक नई गति मिल सकती है ।
 महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के सामाजिक लाभ तो है ही। वह अपनी 90% आय को अपने परिवारों पर खर्च करती है..। बच्चे स्वस्थ व सुरक्षित होते हैं। और मानव विकास का स्तर ऊंचा होता है।
 निजी क्षेत्र के अधिकांश शीर्ष अधिकारियों का मानना है कि उभरते बाजारों में महिलाओं को सशक्त करने के प्रयासों के फलस्वरूप लाभ बड़ा ही है।  
 
हमारी वित्त मंत्री माननीय निर्मला सीतारमण जैसे चंद उदाहरण छोड़ दें तो आर्थिक पक्षों में यह लैंगिक असमानता स्पष्ट नजर आती है। चाहे वह बड़ी कंपनी के आर्थिक मामले हो या छोटी कंपनी के। लेकिन हां ...! यदि हम सीख लेना चाहे तो मध्यप्रदेश के झाबुआ व आसपास के इलाके... व छत्तीसगढ़ के कुछ इलाकों के आदिवासी क्षेत्रों से सीख सकते हैं कि लैंगिक समानता क्या होती है ..। उन इलाकों में आज भी क्योंकि मैं स्वयं वहां गई हूं.. व जाती रही हूं ...मैंने देखा कि वहां आज भी लैंगिक समानता सुदृढ़ है..। कोई भी पहलू हो शिक्षा.. स्वास्थ्य... परिवार... आर्थिक निर्णय लेने की क्षमता... सभी में स्त्री-पुरुष समान है। दोनों का सम्मान सम्मान है। यह हम शिक्षित शहरवासियों के लिए एक सबक है। आत्मनिर्भरता का एक उत्कृष्ट नमूना है... क्योंकि आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक रूप से नहीं होती कि नौकरी करके पगार पा रहे हैं।... बल्कि आर्थिक प्लान बनाना ..स्वविवेक से स्वयं निर्णय लेकर उस पैसे को खर्च करने की अनुमति लिए बिना खर्च करना ही आत्मनिर्भरता है।
 और यह आत्मनिर्भरता जेंडर इक्वलिटी के लिए अति आवश्यक है। हालांकि लिंगभेद आजकल केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं रह गया... बल्कि कुछ पुरुषों को भी इसका सामना करना पड़ रहा है। पुरुष भी सुनते हैं जब वे सामान्य से अलग करियर चुनते हैं। जैसे कुकिंग... बेबीसिटिंग या कहीं अपनी पत्नी को जॉब के लिए बाहर भेज कर स्वयं घर संभालना पसंद करने लगते हैं।
 
 आज की पीढ़ी के कई नौजवान हैं जो यदि उनकी पत्नी को किसी ट्रेनिंग के लिए विदेश भी जाना हो तो वे बच्चे को संभालने के लिए उस पीरियड में अवकाश भी ले लेते हैं। और आलोचना का शिकार भी होते हैं। इस मामले में मैं एक उदाहरण चेतन भगत का देना चाहूंगी जिन्होंने अपना बैंक जॉब थोड़ा और लेखन तथा घर परिवार संभालना स्वीकृत किया.... और उनकी पत्नी एक बैंकर है।हालांकि यह कम है... फिर भी बदलाव जारी है ..। परिवर्तन प्रकृति का नियम है वह विकास हेतु आवश्यक भी..। और लैंगिक समानता की दिशा में यह परिवर्तन सुखद है।
 
 
यद्यपि अब लिंगानुपात के क्षेत्र में सकारात्मकता देखी जा रही है... लेकिन फिर भी दुनिया के कई हिस्से हैं जहां लड़कियों या महिलाओं को हिंसा या भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। लैंगिक समानता के गहन चिंतन व अभ्यास के लिए हमारे कानूनी व नियामक ढांचे को मजबूत बनाने की भी आवश्यकता है..। उम्मीद करती हूं कि वर्तमान परिवेश हमारे आधुनिक समाज में पुरुष व महिलाओं के प्रयासों को समान रूप से पहचान दिलाने में हम सब कामयाब होंगे..। अपनी बात का समापन अपनी इस कविता के साथ करती हूं..
परिस्थितियों के प्रतिकूल बहना ...
तो मैं तभी सीख गई थी ...
जब थी मां के गर्भ में ....
अस्तित्व के लिए किया जा रहा संघर्ष....
जारी है आज भी.....।
पौरुष लगा है रौंदने में....
तन- मन- दिमाग.. तीनों को....,
पर मैं कामयाब रहूंगी....
बचाने में.. 
अपने अस्तित्व को...।
होंगे वे अचेतन...
जो युगों से बह रहे..
अनुकूल धारा के...।
मैंने सीख लिया है...
चीरकर धारा को.... 
प्रतिकूल बहना..।
या यूं कहें...
 अब धारा को ....
अपने अनुकूल कर लेना...
जो भी नाम दो मुझे..
जिस भी क्षेत्र में....
नारी हूं मैं.../ 
अपने गर्व के साथ..
अपने आत्मविश्वास के साथ....।
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