बिना शर्त माफी नहीं मांगने पर खत्म हो सकती है आजम खान की सदस्यता

वेबदुनिया से बोले संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप

दिल्ली। अपने बयानों के लिए अक्सर विवादों में रहने वाले समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान इस बार बड़ी मुश्किलों में फंस गए हैं। लोकसभा की पीठासीन स्पीकर और भाजपा सांसद रमा देवी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में अब उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन की कार्रवाई की जा सकती है। वहीं भाजपा सांसद रमा देवी ने आजम खान की सदस्यता खत्म करने की मांग की है।

इस पूरे मामले को लेकर लोकसभा स्पीकर ओम बिड़ला ने जो सर्वदलीय बैठक बुलाई थी उसमें सांसद आजम खान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को लेकर सभी दल एकमत हो गए हैं। बैठक में तय हुआ कि सोमवार को सदन में स्पीकर सपा सांसद को माफी मांगने को कहेंगे और अगर आजम खान माफी नहीं मांगेंगे तो उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई होगी। वहीं भाजपा सांसद रमा देवी ने आजम खान की सदस्यता खत्म करने की मांग की है।

खत्म हो सकती है लोकसभा की सदस्यता : सपा सांसद आजम खान से जुड़े इस पूरे विवाद को लेकर वेबदुनिया ने लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से बातचीत की। वेबदुनिया से बातचीत में सुभाष कश्यप कहते हैं कि अगर सपा सांसद आजम खान सदन में बिना शर्त माफी मांग लेते हैं और अपने व्यवहार पर अफसोस जाहिर करते हैं तो उन्हें माफ किया जा सकता है और उनके खिलाफ आगे कोई कार्रवाई नहीं हो सकती है।

अगर आजम खान माफी नहीं मांगते हैं या शर्तों के साथ माफी मांगने पर तैयार होते हैं तो उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन और सदन की अवमानना का मामला बनता है और इसके लिए उन्हें कुछ दिनों के लिए सस्पेंड किया जा सकता है या उनकी सदन की सदस्यता भी खत्म की जा सकती है। आजम खान के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी यह पूरा निर्णय सदन के ऊपर निर्भर करता है कि वह कितनी सख्त सजा देगा।

वेबदुनिया के इस सवाल पर कि आजम खान के बारे में निर्णय स्पीकर लेंगे या विशेषाधिकार समिति को मामला भेजा जाएगा। इस पर संसद के मामलों के जानकार सुभाष कश्यप कहते हैं कि पूरी घटना सदन के सामने हुई है, इसलिए सदन स्वयं इस पर निर्णय ले सकता है क्योंकि जो कुछ हुआ वह सदन के सामने हुआ है। इस मामले में जांच के लिए कुछ भी नहीं है।

सुभाष कश्यप कहते हैं कि ऐसे मामले समिति को तब भेजे जाते हैं, जब जांच के लिए कुछ बात हो। आजम खान के मामले में सब कुछ सदन के सामने हुआ, इसलिए जांच के लिए कुछ है भी नहीं, इसलिए उनका मानना है कि सदन स्वयं निर्णय ले सकता है। सुभाष कश्यप का कहना है कि इतिहास में इंदिरा गांधी की सदस्यता खत्म करने का सबसे ज्वलंत उदाहरण है, जब उनकी सदस्यता समाप्त करने के साथ ही उनको जेल भी भेजा गया था।

विशेषाधिकार हनन के चर्चित मामले : लोकसभा के संसदीय इतिहास में ऐसे 2 मौके आए, जब सांसदों की सदस्यता खत्म कर की गई। 1978 में आपातकाल की जांच के लिए बने आयोग पर बयान देने के कारण चौधरी चरण सिंह इंदिरा गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाए थे।

सदन में लाया गया विशेषाधिकार हनन का यह प्रस्ताव पास हो गया था और इंदिरा गांधी को सदन से निष्कासित करके जेल भेज दिया गया था, वहीं 1976 में सुब्रमण्यम स्वामी को एक इंटरव्यू में सदन की गरिमा के खिलाफ बोलने का आरोप लगा था, इसके बाद उन्हें सदन से निष्कासित कर दिया गया था। 

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