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क्या कांग्रेस को सत्ता चाहिए? देना होगा इन मुद्दों पर खास ध्यान

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दामोदर दत्त दीक्षित

कांग्रेस नेता राहुल गांधी की 7 सितंबर, 2022 को कन्याकुमारी से शुरू हुई 'भारत जोड़ो यात्रा’ 150 दिनों में लगभग 3570 किमी की दूरी तय कर जम्मू-कश्मीर में समाप्त होगी। यात्रा को काफ़ी जन समर्थन मिल रहा है - यहां तक कि अन्य राजनीतिक पाटियों का भी। आम जनता महंगाई, बेरोज़गारी, बीमारी आदि से संत्रस्त है। कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा है।
 
उल्लेखनीय है कि विगत में ऐसी यात्राओं का लाभ यात्री और उसकी पार्टी को मिलता रहा है। जैसा कि कई लोगों ने इंगित किया है, एक ही चूक हो गई है इस यात्रा में। हिमाचल प्रदेश और गुजरात के चुनाव के समय ऐसा कार्यक्रम नहीं रखना चाहिए था। पार्टी में सबसे बड़े चेहरे राहुल गांधी इन प्रदेशों के चुनाव प्रचार में भाग नहीं ले सके। दूसरी ओर अन्य प्रमुख पार्टियां पूरे दम-खम के साथ चुनाव प्रचार में लगी रहीं। अगर राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार किया होता, तो इन प्रदेशों में बेहतर परिणाम आते।
 
इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने जिस प्रकार विकट प्रतिकूल परिस्थितियों में जनता की समस्याओं को निर्भीकता से उठाया है, जिस प्रकार से केन्द्र सरकार की जनविरोधी नीतियों का डटकर विरोध किया है, सड़कों पर संघर्ष किया है, वह प्रशंसनीय है। जब सरकार विपक्ष की आवाज़ दबाने के लिए कृतसंकल्प हो, विपक्ष को नेस्तनाबूद करने के लिए हर हथकंडे अपना रही हो, तो ऐसी परिस्थिति में कांग्रेस के प्रतिरोध को सराहनीय ही कहा जाएगा।
 
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केन्द्रीय सरकार, विशेषकर उसके शीर्षस्थ नेता नरेन्द्र मोदी और अमित शाह और उनका येन-केन-प्रकारेण चुनाव जीतने का जज़्बा है। देखा जाए तो ये दोनों नेता हर समय चुनावी मोड में रहते हैं, एक-एक सीट के लिए 'कटाजुज्झ’ संघर्ष करते हैं, चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं। यद्यपि यह सही है कि आज के माहौल में चुनाव जीतने का मूल कारण सत्ताधारी पार्टी के पास अकूत धन का होना है।
 
केन्द्रीय एजेंसियों की अनैतिकता : दूसरा प्रमुख कारण केन्द्रीय जांच एजेंसियां हैं जिन्होंने सारी नैतिकता को ताक पर रखकर पुराने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं और अलिखित सिद्धांत बना लिया है कि विपक्षी नेताओं को छोड़ना नहीं है और सत्ताधारी पार्टी के नेताओं को छेड़ना नहीं है- फूल की छड़ी से भी नहीं! सब कुछ खुले आम, अभूतपूर्व निर्लज्जता के साथ हो रहा है। अफ़सरशाही किस सीमा तक गिरेगी, कहना मुश्किल है। ऐसी विषम-विकट परिस्थितियों में कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि पार्टी नेताओं, कार्यकर्ताओं और समर्थकों में छायी मायूसी को समाप्त कर उनके मनोबल को बढ़ाया जाए। कांग्रेस को अपनी प्रादेशिक सरकारों को गिरने से बचाना भी एक चुनौती है। ज़रूरत भी। 
 
पिछली गलतियों से सीखे कांग्रेस : पार्टी के सामने अन्य महत्वपूर्ण चुनौतियां अपने घर को ठीक-ठाक रखना, पिछली गलतियों से सीख लेना और सही तथा त्वरित निर्णय लेना है। ढीले-ढाले रवैये से काम चलने वाला नहीं है। वर्ष 2017 के गोवा विधानसभा चुनाव में पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उसे 40 में से 17 सीटें प्राप्त हुईं। पार्टी गठबंधन सरकार बनाने की दिशा में ऊंघती ही रह गई और भाजपा ने कांग्रेस और कुछ अन्य पार्टियों के नवनिर्वाचित विधानसभा सदस्यों को मिलाकर सरकार बना ली। कांग्रेस ठगी-सी रह गई। इसके बाद भी उसने कोई सीख नहीं ली। गोवा जैसा ही खेल बाद में कर्नाटक, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में खेला गया। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और झारखंड की सरकारें अभी तक बची हुई हैं, कब तक यह कहना मुश्किल है।
 
दरअसल केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा सरकार ने राजनीतिक अनैतिकता के सारे रिकॉर्ड बड़े अंतर से ध्वस्त कर दिए हैं। इस सरकार के रहते हुए अगर किसी पार्टी को विधानसभा चुनाव में बहुमत मिल भी जाता है, तो भी उसने चुनाव परिणाम घोषित होने वाले दिन ही अपने विधायकों को सुरक्षित स्थान में न पहुंचाया तो समझना चाहिए कि विधायक टूट गए और सरकार बनने से रही। लोग यही कहेंगे- ‘हुज़ूर आते-आते बहुत देर कर दी...।’
 
लेना होंगे त्वरित निर्णय : महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में ‘महाराष्ट्र विकास अघाड़ी’ की गठबंधन सरकार बनने जा रही थी। उस समय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि वह तीन-चार दिन में न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार करवाएंगी, उसके बाद गठबंधन सरकार में शामिल होने पर निर्णय लिया जाएगा। जो न्यूनतम साझा कार्यक्रम दो-तीन घंटे में बनाया जा सकता है, उसके लिए तीन-चार दिन का समय? देखा जाए तो पार्टियों के न्यूनतम साझा कार्यक्रम लगभग समान होते हैं। भला कौन पार्टी कहेगी कि किसान-मजदूरों के हित के कार्य न किए जाएं! यह तो कहिए ‘महाराष्ट्र विकास अघाड़ी’ की गठबंधन सरकार किसी तरह, भगवान भरोसे बन गई वरना प्रस्तावित गठबंधन में सेंध लगाने का पर्याप्त अवसर मिल गया था। कहने का अभिप्राय यह कि कांग्रेस को त्वरित निर्णय के महत्व को समझना होगा, गति को महत्व देना होगा। गति में पिछड़े तो समझिए मात खा गए।
 
गोपनीयता को भी महत्व देना होगा। पार्टी की अंदरूनी बातें, अंदरूनी निर्णय आमफ़हम नहीं होने चाहिए अन्यथा असफलता तो मिलती ही है, ‘हाय-हाय’, ‘थू-थू’ भी कम नहीं होती। कुछ समय पहले राजस्थान में मुख्यमंत्री पद को लेकर विवाद हुआ। केन्द्रीय पर्यवेक्षकों में से एक अजय माकन ने बाक़ायदा प्रेस कॉन्फ्‍रेंस कर पार्टी की अंदरूनी कलह का खुलासा किया और दो विवादग्रस्त गुटों में से स्वयं एक गुट के पक्षधर बन गए। पार्टी की भद पिटवाने वाले अजय माकन पर तुरंत अनुशासनात्मक कार्यवाई होनी चाहिए थी, परन्तु कुछ नहीं हुआ। पार्टी ऐसे नहीं चलाई जानी चाहिए। 
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पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को सदैव याद रखना चाहिए कि वह अब न तो केन्द्रीय सत्ता में है और न ही उसके अधीन गुरिल्ला जांच एजेंसियां हैं। ऐसे में कोई भी पार्टी हो, अनुशासनहीनता में वृद्धि स्वाभाविक स्थिति है जिसे समझदारी से ‘हैंडिल' करना होता है। बड़ी संख्या में लोगों को पार्टी से निकाला तो नहीं जा सकता, परन्तु बंदरघुड़की तो दी ही जा सकती है। एक-आध पर कार्रवाई भी की जा सकती है।
 
अपनी राय नहीं थोपे शीर्ष नेतृत्व : जिस किसी प्रदेश में मुख्यमंत्री पद को लेकर नेताओं में तकरार हो, तो शीर्ष नेतृत्व को अपनी राय नहीं थोपनी चाहिए और विधायकों के बीच गुप्त मतदान करवाकर बहुमत के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। उसी में शीर्ष नेतृत्व की इज़्ज़त है। भलाई भी। मतदान में हारे हुए व्यक्ति को सब कुछ भुलाकर कैबिनेट में स्थान देने की बात पहले ही तय कर देना चाहिए अगर व्यक्ति इसके लिए तैयार हो। इससे तकरार को कम किया जा सकता है। शीर्ष नेतृत्व ने न तो मध्यप्रदेश में ऐसा किया और न ही राजस्थान में। अगर ऐसा किया गया होता तो शायद मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार न गिरती और न ही राजस्थान में संकट पैदा होता।
 
ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शायद पार्टी छोड़कर न जाते। सुनने में आया था कि वह राज्यसभा की सदस्यता चाहते थे, पर उस पर भी पार्टी ने समय से विचार नहीं किया। जब आप केन्द्रीय सत्ता से वंचित हों, घटते जनाधार को बढ़ाने की ज़रूरत हो, तो कोशिश की जानी चाहिए कि कोई भी व्यक्ति विशेषकर ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसा जनाधार वाला नेता पार्टी छोड़कर न जाए। गुजरात के पाटीदार समुदाय के ज़मीनी, जुझारू नेता हार्दिक पटेल ने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का संकेत भी दिया था, पर पार्टी उन्हें रोकने के प्रति लापरवाह बनी रही। शीर्ष नेतृत्व का ‘हू केयर्स’ या ‘जाते हो तो जाओ बुलाएंगे नहीं’ वाला रवैया पार्टी के लिए तो घातक है ही, स्वयं शीर्ष नेतृत्व की सारी मेहनत, सारे संघर्ष पर पानी फेर देता हैं। कई प्रभावशाली नेता पार्टी छोड़कर भाजपा या अन्य पार्टी में चले गए और पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ी, पर पार्टी ने उन्हें रोकने का कोई सार्थक प्रयास नहीं किया।
 
विधानसभा चुनाव से पहले पंजाब में पार्टी में अंतर्कलह चरम पर पहुंच गई। अमरिन्दर सिंह मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार नहीं थे। उधर नवजोत सिंह सिद्धू और कुछ अन्य कांग्रेसी नेता उन्हें हटाने को कटिबद्ध। मीडिया में ख़बरें आती रहीं कि प्रियंका गांधी सिद्धू को मुख्यमंत्री बनाना चाहती हैं। सिद्धू की उपयोगिता चुनावी सभाओं में चटपटे भाषण देना भर है। वह निहायत अगम्भीर व्यक्ति हैं, जहां भी रहे अपनी पार्टी के लोगों से झगड़ते रहे। इसके अलावा एक ग़ैर-इरादतन हत्या के मामले में उन्हें उच्च न्यायालय से जेल की सजा मिली हुई थी। वह जमानत पर थे और मामला उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन था।
 
ऐसे में सिद्धू को साफ़-साफ़ कह दिया जाना चाहिए था कि जब तक वह उच्चतम न्यायालय से दोषमुक्त नहीं हो जाते, उनकी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर विचार नहीं किया जा सकता। कुर्सी खाली होने की संभावना देखकर मुख्यमंत्री पद के कई दावेदार हो गए, कांग्रेस कई गुटों में विभाजित हो गई। आख़िर अमरिन्दर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्होंने कार्य तो अच्छा किया, परन्तु समय कम मिला। कांग्रेस की अन्तर्कलह इतनी बढ़ गई कि चुनाव से पहले ही लोग कहने लगे कि कांग्रेस बुरी तरह चुनाव हारने जा रही है। आख़िर वहीं हुआ भी। दरअसल चुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री बदलना आत्मघाती होता है, अन्तर्कलह पहले से कहीं ज़्यादा बढ़ जाती है। कांग्रेस को ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए। 
 
मध्यम मार्ग पर चलना जरूरी : पार्टी को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि जहां उसके ‘सपोर्ट बेस’ का, आधारभूत मतों का बहुत ज़्यादा क्षरण हुआ हो, वहां समन्वय और मध्यम मार्ग पर चलना होता है। वहां कठोर कार्रवाई से बचने की जरूरत होती है। प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश कांग्रेस की प्रभारी तब भी थीं। कुछ साल पहले की बात है। प्रदेश के कुछ वरिष्ठ और कनिष्ठ कांग्रेस नेताओं में विवाद हो गया। इस पर कई वरिष्ठ प्रतिबद्ध नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। वैसे भी कठोर कार्रवाई एक या दो व्यक्तियों पर करना उचित होता है, थोक में कार्रवाई करना अंततोगत्वा पार्टी के लिए घातक होता है। 
 
बयानवीरों से नुकसान : कांग्रेस पार्टी का बहुत ज़्यादा नुकसान उसके वक्तव्यवीरों से हुआ है। जब कांग्रेस केन्द्रीय सत्ता में थी, उस समय और बाद के समय में भी दिग्विजय सिंह, मणिशंकर अय्यर, कपिल सिब्बल, पी. चिदम्बरम जैसे नेता ऐसे वक्तव्य देते थे कि बहुसंख्यक वर्ग को लगता था कि वे अल्पसंख्यक वर्ग के ही हितचिंतक हैं, बहुसंख्यक वर्ग उनकी गणना में ही नहीं है। यदि अल्पसंख्यक वर्ग के किसी सदस्य का नाम किसी आतंकवादी या अन्य गम्भीर आपराधिक घटना में आता था, तो वक्तव्यवीर बग़ैर प्रारम्भिक जांच पूरी हुए येन-केन - प्रकारेण उसे दोषमुक्त सिद्ध करने लगते थे। कुछ वक्तव्यवीर पाकिस्तान की प्रशंसा और पैरवी करने लगते थे। इस सबसे भी कांग्रेस के मतदाता वर्ग का बहुत क्षरण हुआ।
 
एक बार तो नपा-तुला बोलने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक ने वक्तव्य दे दिया कि देश की सम्पत्ति पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकवर्ग का है। इसका क्या अर्थ हुआ? यह वक्तव्य संविधान के समानता के अधिकार के विरुद्ध है। अगर है तो देश की सम्पत्ति पर सभी नागरिकों का समान अधिकार है। वक्तव्यवीरों के वक्तव्यों के कारण एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से छिटक गया और अवसर मिलते ही भाजपा से जुड़ गया। उसे वापस ला पाना टेढ़ी खीर हो रहा है, नाकों चना चबाना पड़ रहा है।
 
इस तरह के बयानों से बचे कांग्रेस : एक अन्य कारण जिसे हिन्दू समुदाय का एक बड़ा भाग कांग्रेस से छिटका हुआ है या छिटक रहा है, वह है राहुल गांधी समेत कुछ कांग्रेसी नेताओं का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और सावरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की निंदा करना। यह देखकर ऐसा लगता है कि देश में भाजपा का नहीं, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या सावरकर का शासन है। किसी भी पार्टी के किसी भी राजनेता को अगर जनसमर्थन पाना है और सत्ता प्राप्त करनी है, तो उसे कम से कम स्वतंत्रता सेनानियों को बख़्श देना चाहिए, उन्हें अपनी राजनीति का मोहरा नहीं बनाना चाहिए।
 
हर मनुष्य में कोई न कोई कमी निकाली जा सकती है। स्वतंत्रता सेनानी भी इसके अपवाद नहीं हो सकते। उनके मूल्यांकन का कार्य इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और पत्रकारों पर छोड़ देना चाहिए। जब परनाना जवाहरलाल नेहरू की कोई राजनेता निन्दा करता है, तो राहुल गांधी को जरूर बुरा लगता होगा। इसी तरह सावरकर की निन्दा करने पर उनके परिजनों को ही नहीं, मराठी लोगों और देश के एक बहुत बड़े वर्ग को बुरा लगता है। राहुल गांधी या किसी भी पार्टी के किसी भी राजनेता को इतनी समझ तो पैदा करना ही चाहिए कि क्या बोलना चाहिए, क्या नहीं। अगर वह इतनी समझ पैदा नहीं कर सकता, तो उसे चुनावी राजनीति में सफलता की आशा छोड़ देनी चाहिए। कहावत है- ‘डोन्ट ट्रबुल ट्रबुल अनलेस ट्रबुल ट्रबुल्स यू’। अनावश्यक बोलना राजनेता के लिए हाराकिरी जैसा है।
 
अपने पुराने नेताओं से सबक लें : पीवी नरसिंह राव नपा-तुला बोलते थे। उनकी मितभाषिता के कारण कुछ समस्याएं पैदा ही नहीं होती थीं। कुछ पैदा भी हुईं, तो उनका ‘मौन’ ढाल बनकर समाधान कर देता था। इंदिरा गांधी भी अनावश्यक नहीं बोलती थीं। नेहरू, शास्त्री, इंदिरा गांधी, नरसिंह राव आदि नेता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कुछ बातों को पसंद नहीं करते थे, पर उसका नाम उस तरह से नहीं ‘जपते’ थे जैसा राहुल गांधी और कांग्रेस के कुछ नेता जपते हैं। वैसे प्रियंका गांधी ऐसी जुमलेबाजर और ‘जिंगोइज़्म’ से भरसक दूर रहती हैं। 
 
देश में एक ऐसा बड़ा वर्ग है जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भाजपा समर्थक ही नहीं, सांस्कृतिक संगठन के रूप में भी देखता है जो समाज सेवा, शिक्षा, आपदा प्रबंधन आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को हिन्दुओं के संगठनकर्ता के रूप में भी देखता है। राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के वक्तव्यों को देखकर यह वर्ग कांग्रेस की ओर लौटने से रहा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भाजपा समर्थक जरूर है, परन्तु वह चुनावी राजनीति में सीधे भाग नहीं लेता। ऐसे में चुनावी राजनीति में उसकी निन्दा का कोई ठोस आधार नहीं बनता।
 
कांग्रेस के लिए अपने विरोधियों की वृद्धि करना किसी कोने से बुद्धिमानी नहीं है और विवेकहीनता और अदूरदर्शिता का परिचायक है। अगर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी सत्ता प्राप्त नहीं करना चाहती है, हमेशा विपक्ष में ही रहना चाहती है, तब तो कोई बात नहीं अन्यथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की निंदा से बचना चाहिए। कूटनीति का तकाजा है कि राहुल गांधी स्वयं को उन लोगों तक, उस पार्टी तक सीमित रखें जिनके साथ उनकी सीधी लड़ाई है। उनके विरुद्ध, उनकी ख़ामियों-नाकामियों के विरुद्ध ही कहने को बहुत कुछ है। राहुल गांधी अपने परिश्रम से, संघर्ष से विपक्षी पार्टी की भूमिका अदा कर और ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से जो सहानुभूति अर्जित कर रहे हैं, अपने पक्ष में माहौल बना रहे हैं, उस शुभ-लाभ को वक्तव्यवीरता से अशुभ हानि में बदल देना बुद्धिमानी का द्योतक नहीं है। 
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कुछ कांग्रेसी नेता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को धार्मिक उन्माद, धार्मिक आतंकवाद की नर्सरी, फैक्टरी और न जाने क्या - क्या कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि भाजपा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेंडे पर कार्य करती है। यह सब जुमलेबाजी भर है। न तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी और न ही वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निर्देश पर कार्य करते हैं। हर प्रधानमंत्री का अपना एजेंडा होता है जिस पर वह कार्य करता है। अपनी सरकार को स्थायित्व प्रदान करना उसका मुख्य उद्देश्य होता है।
 
ज्यादा से ज्यादा लोगों की सलाह : राजनीति के रंग-ढंग काफ़ी बदले हैं, बदलते जा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी को इसे चुनौती की तरह स्वीकार करते हुए, पार्टी के हित को देखते हुए नीति निर्धारण करना चाहिए। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अपने लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा राय लेना चाहिए। ‘बैक रूम ब्वाय’ या ‘किचेन कैबिनेट’ से काम चलने वाला नहीं है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी से सलाह लेना चाहिए और उनकी सलाह को महत्व देना चाहिए। निजी निर्णय को बदलने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।
 
समय की मांग है कि राजीव गांधी के कार्यकाल की तरह ‘थिंक टैंक’ का गठन किया जाए और उसकी राय को भी महत्व दिया जाए। अन्य पार्टियों की अपेक्षा पार्टी के पास बेहतर प्रवक्ता हैं। गौरव वल्लभ, सुप्रिया श्रीनेत, रणदीप सिंह सुरजेवाला, रागिनी नायक, अलका लाम्बा, पवन खेड़ा जैसे सुयोग्य, समझदार, सुशिक्षित और तर्कप्रवीण प्रवक्ता हैं जिन्हें ‘थिंक टैंक’ में लिया जा सकता है। शीर्ष नेतृत्व को विभिन्न स्रोतों से ‘फीडबैक’ लेना चाहिए और राष्ट्रीय कार्यकारिणी और ‘थिंक टैंक’ की सलाहों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। तभी सही निर्णय लिया जा सकेगा और अनिर्णय और कुनिर्णय से बचा जा सकेगा।
 
सफल व्यक्ति सलाह लेने में संकोच नहीं करते। इस वास्तविकता को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि निकट भविष्य में कांग्रेस पार्टी का भविष्य गांधी परिवार से उसी तरह जुड़ा है जिस तरह से गांधी परिवार का भविष्य कांग्रेस पार्टी से जुड़ा है। स्थितियां परिवर्तनशील होती हैं। निराश होने की जरूरत नहीं है। धनबल, सत्ता बल, अनैतिकता बल और अपनी साख पूरी तरह से गंवा चुकीं जांच एजेंसियों के बल का मुक़ाबला सूझ-बूझ, सुविचारित रणनीति ओैर सही समय पर सही निर्णय से किया जा सकता है। ढीले- ढाले रवैए को त्यागना होगा। पार्टी में संघर्षशीलता की कमी नहीं है। ऐसा सब किया जाए तो कोई कारण नहीं कि निराशा के बादल न छंटे और सफलता न मिले। 
 

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