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गहन अंतरिक्ष अभियानों के लिए परमाणु ऊर्जा का सहारा लेगा इसरो

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शनिवार, 29 मई 2021 (13:34 IST)
नई दिल्ली, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक रेडियो आईसोटोप थर्मो-इलेक्ट्रिक जेनरेटर (आरटीजी) विकसित किया है। इसरो के गहन अंतरिक्ष अभियानों में ऊर्जा उत्पन्न करने और तापीय प्रबंधन में इस तकनीक को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह जेनरेटर गहन और सुदूरवर्ती ब्रह्मांड से जुड़ी संभावनाएं तलाशने में मददगार हो सकता है। इस परियोजना की कमान डिजाइन एवं डेवेलपमेंट से जुड़े इसरो के अग्रणी संस्थान यूआर राव सैटेलाइट सेंटर (यूआरएससी) के पास है। इसी केंद्र में इसरो के उपग्रह तैयार किए जाते हैं। यह केंद्र त्रि-चरणीय 100 वॉट क्षमता का आरटीजी बना रहा है।

इसरो एक स्पेस स्टेशन स्थापित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसके अलावा, उसके कई महत्वाकांक्षी अभियान भी शुरू होने हैं। इनमें अंतरिक्ष मानव मिशन गगनयान, आदित्य एल-1, दूसरी भारतीय स्पेस टेलीस्कोप एक्सपोसैट, मंगलयान द्वितीय, चंद्रयान तृतीय और शुक्र की कक्षा से जुड़ा अभियान शुक्रयान जैसे मिशन प्रमुख हैं।
रेडियो-आईसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर (आरटीजी) परमाणु ऊर्जा से संचालित एक प्रकार की बैटरी है, जो थर्मोकपल्स की मदद से उपयुक्त रेडियो-एक्टिव मैटीरियल से स्रावित ऊष्मा को विद्युत में परिवर्तित कर सकती है।

ऐसे जेनरेटर्स ‘सेटबैक इफेक्ट’ से संचालित होते हैं और अमूमन उनमें कोई सचल (मूवेबल) पुर्जा नहीं होता।
सेटबैक इफेक्ट एक ऐसी अवधारणा है, जो इलेक्ट्रोमोटिव फोर्स (विद्युत) उत्पन्न करने वाले दो असमान विद्युत चालकों या अर्द्धचालकों के बीच तापमान में अंतर का पैमाना है। आरटीजी न केवल बेहद भरोसेमंद हैं, बल्कि उनका रखरखाव भी न के बराबर होता है, क्योंकि थर्मोकपल्स में कोई सचल पुर्जा नहीं होता। इसमें विफलता की गुंजाइश कम हो जाती है।

आरटीजी की कार्यप्रणाली समझने के लिए सबसे पहले एक सामान्य उपग्रह की कार्यप्रणाली को समझना होगा। सामान्य उपग्रह विभिन्न चरणों के तहत अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं। आरंभिक चरण में उपग्रह बूस्टर पर स्ट्रैप के जरिये उड़ान भरता है। दूसरे चरण में उपग्रह बूस्टर पर अपनी पकड़ छोड़ता है। भारतीय उपग्रह दूसरे चरण में ‘विकास लिक्विड इंजन’ का उपयोग करते हैं। दूसरे चरण के संपन्न होने के बाद तीसरे चरण में उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचता है। यह किसी भी सामान्य उपग्रह के प्रक्षेपण की प्रक्रिया है।

सामान्य उपग्रहों में ऊर्जा उत्पादन के लिए भारी-भरकम कैरियर्स का उपयोग किया जाता है, जिससे उपग्रह का आकार बड़ा हो जाता है। इसके उलट आरटीजी सिस्टम में थर्मोकपल्स और रेडियोधर्मी समस्थानिकों के उपयोग से विद्युत ऊर्जा की उपलब्धता से उनका आकार छोटा ही रहता है। साथ ही, आरटीजी सिस्टम सामान्य उपग्रह प्रणाली की तुलना में ईंधन की खपत के लिहाज से भी किफायती होते हैं और रासायनिक रॉकेटों की तुलना में हल्के होने के कारण तेजी से आगे बढ़ने में भी सक्षम हैं। चूंकि आरटीजी सौर ऊर्जा से नहीं चलते, इसलिए वे उपग्रह को अंधेरे में भी ऊर्जा प्रदान कर सकते हैं।

आरटीजी तकनीक के अस्तित्व की जड़ें शीत युद्ध से जुड़ी हैं। अमेरिका ने वर्ष 1961 में अपने ट्रांजिट-4ए मिशन में पहली बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया था। पूर्ववर्ती सोवियत संघ ने भी परमाणु ऊर्जा से जुड़ी करीब दो दर्जन परियोजनाएं शुरू की थीं। हालांकि, बजट में कमी और ऊर्जा के अन्य वैकल्पिक स्रोतों के उभार के साथ शीत युद्ध के दौरान परमाणु टकराव की बढ़ती आशंका के कारण यह तकनीक पिछड़ती गई। (इंडिया साइंस वायर)

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