2 अप्रैल, 2025 का दिन भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों के लिए एक नया मोड़ लेकर आया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी बहुप्रतीक्षित "प्रतिगामी टैरिफ" (reciprocal tariff) नीति लागू करने की समयसीमा तय की, और ठीक इसके कुछ घंटे पहले अमेरिका ने भारत की व्यापार नीतियों पर सवालों की बौछार कर दी। यह ऐसा लगा मानो एक दोस्त ने हाथ मिलाने से पहले शर्तों का पहाड़ खड़ा कर दिया हो। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) की "2025 नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट" ने भारत के उच्च टैरिफ, आयात-गुणवत्ता मानकों और डिजिटल नीतियों को निशाने पर लिया है। सवाल यह है—क्या यह रिपोर्ट दोनों देशों के बीच चल रही व्यापारिक दोस्ती को दरार में बदल देगी, या यह एक नई शुरुआत का संकेत है?
अमेरिका की आपत्ति: भारत की नीतियां निशाने पर
अमेरिका ने अपनी रिपोर्ट में भारत की उन नीतियों को व्यापारिक बाधा करार दिया, जो 'मेक इन इंडिया' जैसे अभियानों के तहत स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा देती हैं। उच्च सीमा शुल्क (टैरिफ), जटिल लाइसेंसिंग प्रक्रियाएं, आयात प्रतिबंध और डिजिटल नियम—ये वो मुद्दे हैं, जिन पर अमेरिका ने उंगली उठाई है। यूएसटीआर की रिपोर्ट 59 देशों की व्यापार नीतियों पर नजर डालती है, लेकिन भारत पर इसका फोकस खास तौर पर चर्चा में है। कारण साफ है—दोनों देश एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं, और ऐसे में यह रिपोर्ट एक चेतावनी की तरह सामने आई है।
ALSO READ: ट्रंप के जवाबी टैरिफ से भारत को कितना नुकसान?
रिपोर्ट में कहा गया कि भारत का औसत टैरिफ दर 17% है, जो वैश्विक प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे ऊंचा है। कृषि उत्पादों पर यह 39% तक जाता है, और शराब व अखरोट जैसे उत्पादों पर तो 100% से 150% तक शुल्क लगता है। अमेरिका का दावा है कि ये टैरिफ उसके उत्पादों को भारतीय बाजार में प्रतिस्पर्धा से बाहर कर देते हैं। इसके अलावा, भारत के गुणवत्ता नियंत्रण मानक (BIS) को भी निशाना बनाया गया है। रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा उपकरण और वस्त्र जैसे क्षेत्रों में अनिवार्य मानकों को अमेरिका ने बोझिल और अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ बताया।
ट्रम्प का 'टैरिफ किंग' तंज और भारत का जवाब
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने कार्यकाल में भारत को 'टैरिफ किंग' कहकर कई बार तंज कसा था। उनका मानना है कि भारत टैरिफ का दुरुपयोग करता है, जिससे अमेरिकी कंपनियों को नुकसान होता है। दूसरी ओर, भारत ने ट्रम्प को खुश करने की कोशिश में कदम भी उठाए। पिछले महीने खबर आई थी कि भारत अमेरिकी आयात पर $23 बिलियन (लगभग 1.9 लाख करोड़ रुपये) के उत्पादों पर टैरिफ छूट देने को तैयार है। यह कई सालों में भारत की ओर से सबसे बड़ी रियायत होती। लेकिन अमेरिका का कहना है कि भारत के आयात नियम अभी भी अंतरराष्ट्रीय मानकों से मेल नहीं खाते। क्या भारत का यह प्रयास ट्रम्प की नजर में नाकाफी साबित होगा?
डेटा प्राइवेसी और डिजिटल नियम: नया विवाद
व्यापारिक टैरिफ के अलावा, अमेरिका ने भारत के डिजिटल नियमों पर भी सवाल उठाए हैं। हाल ही में जारी 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट' के मसौदे में कुछ प्रावधानों को लेकर यूएसटीआर ने आपत्ति जताई। इसमें व्यक्तिगत डेटा का खुलासा करने की अनिवार्यता, क्रॉस-बॉर्डर डेटा ट्रांसफर पर रोक और डेटा स्थानीयकरण जैसे नियम शामिल हैं। अमेरिका का कहना है कि ये नियम उसकी टेक कंपनियों के लिए मुश्किलें खड़ी करते हैं। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक भुगतान सेवाओं में भारतीय कंपनियों को तरजीह देने वाली नीतियों पर भी नाराजगी जताई गई। क्या यह डिजिटल युग में दोनों देशों के बीच नई जंग की शुरुआत है?
कृषि और कीट नियंत्रण: अमेरिकी मक्का का सवाल
कृषि क्षेत्र में भी अमेरिका ने भारत की नीतियों को कठघरे में खड़ा किया। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के तहत गेहूं और चावल जैसी फसलों को दी जाने वाली सब्सिडी पर सवाल उठे। डेयरी, अनाज और जीन-संवर्धित (GM) उत्पादों के लिए भारत के नियमों को वैज्ञानिक आधार से रहित बताया गया। अमेरिका का कहना है कि उसके जीन-संवर्धित उत्पाद, डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स (DDGS) और अल्फाल्फा घास को भारतीय बाजार में जगह नहीं मिल रही। वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक ने सीधा सवाल पूछा—भारत अमेरिकी मक्का का आयात क्यों नहीं करता? जवाब में भारत का संरक्षणवादी रुख साफ दिखता है, जो अपने किसानों और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
भारत की रणनीति: प्रतिशोध या संयम?
ट्रम्प की प्रतिगामी टैरिफ योजना के जवाब में भारत ने अभी प्रतिशोधात्मक टैरिफ लगाने से परहेज किया है। दो सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, नई दिल्ली को उम्मीद है कि उसे इस नीति से छूट मिल सकती है। पिछले हफ्ते हुई द्विपक्षीय वार्ता में अमेरिका ने कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया, लेकिन भारत अभी भी बातचीत के रास्ते पर बना हुआ है। क्या यह संयम भारत के लिए फायदेमंद साबित होगा, या ट्रम्प की टैरिफ तलवार से बचना मुश्किल हो जाएगा?
गुणवत्ता नियंत्रण: भारत का तर्क, अमेरिका की शिकायत
भारत ने 2019 से 100 से ज्यादा क्षेत्रों में 700 से अधिक गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) जारी किए हैं। रसायन, वस्त्र, स्टील और इलेक्ट्रिक उपकरणों जैसे क्षेत्रों में 125 नए आदेशों की योजना है। भारत का कहना है कि ये नियम निम्न गुणवत्ता वाले आयात को रोकने के लिए हैं, जो स्थानीय उद्योगों और उपभोक्ताओं के हित में हैं। लेकिन अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के खिलाफ बताता है। जनवरी 2024 में पॉलीथीन पर लगाए गए QCO को लेकर भी विवाद छिड़ा है, जिसे अमेरिका प्लास्टिक और रसायन व्यापार के लिए बाधा मानता है।
डिजिटल नियम और सरकारी खरीद: पारदर्शिता पर सवाल
यूएसटीआर ने भारत के 'सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021' को भी निशाने पर लिया। इन नियमों के तहत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को अवैध सामग्री हटाने की सख्त शर्तें माननी पड़ती हैं। अमेरिका का मानना है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करता है और उसकी टेक कंपनियों के लिए अनुपालन को मुश्किल बनाता है। इसके अलावा, सरकारी खरीद में पारदर्शिता की कमी और विश्व व्यापार संगठन (WTO) को सूचनाएं न देने पर भी आपत्ति जताई गई।
आगे क्या? एक अनिश्चित भविष्य
ट्रम्प की टैरिफ नीति और यूएसटीआर की रिपोर्ट ने भारत-अमेरिका व्यापारिक रिश्तों को एक नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है। एक तरफ भारत अपनी संप्रभुता और स्थानीय हितों की रक्षा करना चाहता है, तो दूसरी तरफ अमेरिका अपने उत्पादों के लिए खुला बाजार चाहता है। क्या यह तनाव दोनों देशों के बीच नई कड़वाहट लाएगा, या बातचीत से कोई रास्ता निकलेगा? यह सवाल अभी अनसुलझा है। लेकिन एक बात साफ है—ट्रम्प की टैरिफ तलवार ने भारत को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वैश्विक व्यापार के इस खेल में उसकी अगली चाल क्या होगी।