rashifal-2026

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

भीष्म द्वादशी का व्रत रखने का क्या है महत्व और जानिए पूजा विधि

Advertiesment
हमें फॉलो करें शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह के पास खड़े श्रीकृष्‍ण और पांडव

WD Feature Desk

, शनिवार, 24 जनवरी 2026 (15:35 IST)
Bhishma Dwadashi 2026: मोक्ष और सौभाग्य का संगम माघ मास का शुक्ल पक्ष आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा होता है। इसी दौरान आती है भीष्म द्वादशी, जिसे 'तिल बारस', 'गोविंद द्वादशी' और 'माधव द्वादशी' जैसे पवित्र नामों से भी जाना जाता है। यह दिन केवल एक व्रत नहीं, बल्कि अपने पितरों का आशीर्वाद पाने और संचित पापों से मुक्ति का एक दुर्लभ "मेटाफिजिकल अवसर" है।
 

1. क्यों खास है भीष्म द्वादशी? (पौराणिक आधार)

महाभारत का वह दृश्य याद कीजिए, जब पितामह भीष्म बाणों की शैय्या पर लेटे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे। अष्टमी को प्राण त्यागने के ठीक चार दिन बाद, यानी द्वादशी तिथि पर पांडवों ने उनका तर्पण किया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।
 
मान्यता: इस दिन व्रत करने से न केवल रोगों का नाश होता है, बल्कि मनुष्य समस्त भौतिक संपत्तियों का अधिकारी बनकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त होता है।
 

2. एक तिथि, अनेक नाम: क्या कहता है शास्त्र?

विभिन्न पुराणों में इस दिन की महिमा अलग-अलग स्वरूपों में वर्णित है:
 
नारद पुराण: इसे 'माधव द्वादशी' कहता है, जहाँ भगवान विष्णु के 'माधव' स्वरूप की पूजा होती है।
मत्स्य पुराण: इसे 'भीम द्वादशी' या 'कल्याणिनी व्रत' के नाम से संबोधित करता है।
निर्णयसिंधु: इसे सभी पापों को हरने वाली "भीष्म द्वादशी" मानता है।
 

3. 'तिल' का जादू: इस दिन क्यों है तिल इतना अनिवार्य?

इस व्रत में तिल का उपयोग वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों कारणों से महत्वपूर्ण है। शास्त्रों के अनुसार इस दिन:
 
स्नान: नहाने के जल में तिल मिलाएं।
हवन: 'ॐ नमो नारायणाय नम:' मंत्र के साथ तिल की आहुति दें।
दान: तिल के लड्डू और व्यंजनों का ब्राह्मणों को दान करें।
 
विशेष मंत्र: "माधवः सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रदः। तिलदानेन महता सर्वान् कामान् प्रयच्छतु॥" (अर्थ: समस्त फलों को देने वाले भगवान माधव मेरे इस तिल-दान से प्रसन्न होकर मेरी कामनाएं पूर्ण करें।)
 

4. पूजा की संपूर्ण विधि: स्टेप-बाय-स्टेप गाइड

यदि आप इस बार भीष्म द्वादशी का व्रत रख रहे हैं, तो इन चरणों का पालन करें:
 
प्रातः काल: सूर्योदय से पूर्व तिल मिश्रित जल से स्नान करें और व्रत का संकल्प लें।
अभिषेक: भगवान माधव (विष्णु जी) का एक सेर (लगभग 1 लीटर) दूध से अभिषेक करें।
पूजन: गंध, पुष्प और अक्षत से त्रिकाल (तीनों समय) पूजा करें।
हवन: 'नमस्ते माधवाय' मंत्र का उच्चारण करते हुए घी की 8 आहुतियां दें।
रात्रि जागरण: इस रात भगवान के कीर्तन और कथा श्रवण का विशेष महत्व है।
अगले दिन: ब्राह्मणों को भोजन कराएं, वस्त्र और तिल का दान देकर व्रत का पारण करें।
 

निष्कर्ष: 100 वाजपेय यज्ञों का फल

नारद पुराण में श्री सनक जी कहते हैं कि जो व्यक्ति भक्ति भाव से इस दिन तिल-दान युक्त व्रत करता है, उसे 100 वाजपेय यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह दिन पूर्वजों की शांति और घर में सुख-समृद्धि लाने का सबसे सरल मार्ग है।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

शंकराचार्य कैसे बनते हैं? क्या हैं इसके नियम और अभी कितने शंकराचार्य हैं?