दत्त जयंती 2019 : ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का स्वरूप श्री गुरुदेवदत्त, ऐसे करें उपासना

दत्त जयंती के विषय में शास्त्रों में अनेक प्रकार का वर्णन मिलता है। मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा का दिन दत्त जयंती के रूप में मनाया जाता है। मान्यता अनुसार इस दिन भगवान दत्तात्रेय (दत्त) पृथ्वी लोक पर अवतरित हुए थे। इस वर्ष दत्त जयंती 11 दिसंबर को है। 
 
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार भगवान दत्त (दत्तात्रेय) को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का स्वरूप माना जाता है। दत्तात्रेय में ईश्वर एवं गुरु दोनों के अद्भुत रूप समाहित हैं। जिस कारण इन्हें श्री गुरुदेवदत्त भी कहा जाता है।
 
कालांतर में भगवान दत्तात्रेय के नाम पर दक्षिण भारत में दत्त संप्रदाय का उदय हुआ। इस परंपरा के आदिगुरु, बल्कि ऐसा कह सकते हैं कि गुरु दत्तात्रेय का ही रूप हैं। नाथपंथ हो या फिर सूफी, सभी में गुरु रूप को बहुत महत्व दिया गया है। वैष्णव-शैव पंथ में भी गुरुस्वामी, गुरुराज, गुरुदेव ऐसा सम्मान उन्हें दिया जाता है। ऐसे ही गुरुओं के गुरु है श्री दत्तात्रेय (दत्त)। जिन्होंने ज्ञान और अध्यात्म का द्वार सबके लिए खोल दिए हैं। सामाजिक समता और बंधुत्व के विचार की नींव भगवान दत्त ने ही रखी। 
 
चौबीस गुरुओं से प्राप्त की थी शिक्षा शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार दत्त (दत्तात्रेय) का जन्म मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को प्रदोष के समय था। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दत्त (दत्तात्रेय) जी ने चौबीस गुरुओं से शिक्षा प्राप्त की थी। भगवान दत्त के नाम पर दत्त संप्रदाय का उदय हुआ दक्षिण भारत में इनके अनेक प्रसिद्ध मंदिर भी हैं। 
 
मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा को भगवान दत्तात्रेय के निमित्त व्रत करने एवं उनके पूजन और दर्शन से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

ऐसे करें भगवान दत्त की उपासना : भगवान दत्तात्रेय को अनामिकाद्वारा (छोटी उंगली के समीपवाली उंगली से) तिलक लगाएं। फूल, जाई एवं निशीगंधा के फूल सात अथवा सात की गुणा में अर्पित करें। धूप, चंदन, केवडा, चमेली, जाई अथवा अंबर इन गंधों की उदबत्तियां लगाएं। भगवान दत्तात्रेय को सुगंधित इत्र का अर्पण करें। भगवान दत्तात्रेय की 7 प्रदक्षिणा करें। 
 
ऐसा है भगवान दत्त (दत्तात्रेय) का स्वरूप : दत्त (दत्तात्रेय) देवता में ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन त्रिदेवों के तत्त्व समाहित हैं। उनके हाथ में ब्रह्मदेव के कमंडल और जपमाला है, विष्णु के शंख और चक्र हैं साथ ही शिवजी के त्रिशूल एवं डमरू हैं। इन में से प्रत्येक वस्तु का विशिष्ट अर्थ है। दत्त (दत्तात्रेय) के हाथ में जो कमंडल है वह त्याग का प्रतीक है। दत्त (दत्तात्रेय) देवता के कंधे पर एक झोली भी होती है। 
 
उसका भावार्थ इस प्रकार है। झोली, मधुमक्खी का प्रतीक है। जिस प्रकार मधुमक्खी विभिन्न स्थानों पर जाकर शहद जमा करती है, उसी प्रकार दत्त (दत्तात्रेय) दर-दर घूमकर झोली में भिक्षा जमा करते हैं। दर-दर जाकर भिक्षा मांगने से अहंकार का भाव शीघ्रता से कम होता है। इसलिए झोली, अहं नष्ट होने का प्रतीक है।
 
इतिहास और दत्तात्रेय जयंती की जानकारी
दत्तात्रेय जयंती को दत्त जयंती भी कहा जाता है, जो हिंदू देवता दत्तात्रेय (जिन्हें दत्ता के नाम से भी जाना जाता है) के जन्म को इंगित करती है, जो कि सक्षम त्रिदेव, शिव, ब्रह्मा और विष्णु के एक समेकित प्रकार हैं। दत्तात्रेय जयंती प्रमुख रूप से महाराष्ट्र में मनाई जाती है। भगवान दत्तात्रेय को सही तरीके से सभ्य जीवन जीने व व्यक्तियों का मार्गदर्शन करने के लिए जाना जाता है।
 
दत्ता जयंती उत्सव
माणिक प्रभु जैसे अभयारण्य में 7-दिवसीय उत्सव का आयोजन करते हैं जो भगवान दत्ता के लिए प्रतिबद्ध है। यह एक बहुत बड़ा उत्सव होता है जो एकादशी से शुरू होता है और पूर्णिमा तक जारी रहता है। इसके अलावा, जयंती के सात दिन पहले, श्री गुरुचरित्र का पाठ एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है जो उत्सव के शुरू होने का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, दत्त जयंती मार्गशीर्ष महीने में पूर्णिमा के दिन आती है।
 
दत्त जयंती का महत्व
भक्तों का विश्वास है कि वे दत्तात्रेय जयंती के दिन पूजा अनुष्ठानों का पालन करते हुए वह जीवन के सभी हिस्सों में लाभ पा सकते हैं, लेकिन पवित्र पूर्व संध्या की प्राथमिक आवश्यकता यह है कि यह लोगों को पूर्वजों की समस्याओं और अन्य मुद्दों से बचाती है। इस दिन देवता की पूजा और प्रार्थना करने से उत्साही लोगों को एक समृद्ध अस्तित्व प्राप्त करने में मदद मिलती है।
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