बृहस्पतिवार के व्रत का महत्व

भगवान बृहस्पतिदेव की उपासना

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- आचार्य गोविन्द बल्लभ जोशी

भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा अर्चना के लिए बृहस्पतिवार को व्रत करें। बृहस्पतिवार की व्रत कथा को पढ़ने अथवा किसी दूसरे स्त्री-पुरुष द्वारा सुनने की प्राचीन परंपरा है।

बृहस्पतिवार का व्रत करने और व्रत कथा सुनने से स्त्री पुरुषों की सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। इस व्रत से धन संपत्ति की प्राप्ति होती है। निःसंतानों को पुत्र प्राप्ति होती है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। सभी आनंदपूर्वक रहते हैं। बृहस्पतिवार को सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर, भगवान, बृहस्पतिदेव का स्मरण करते हुए व्रत का आरंभ करना चाहिए।

उपासक को घर के किसी कक्ष में छोटा अथवा बड़ा पूजा स्थल बनाकर उसमें भगवान बृहस्पतिदेव की प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिए। घर के समीप किसी मंदिर में जाकर भी भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा की जा सकती है। भगवान बृहस्पतिदेव पीले रंग के पुष्प और पूजा की पीले रंग की सामग्री को विशेष रूप से पसंद करते हैं।

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इसलिए स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र धारण करने का विशेष महत्व बताया गया है। पीले रंग के पुष्प, केले और पीले चंदन से भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा का विधान है।

बृहस्पतिवार को मंदिर या आँगन परिसर में केले के पौधे के पास आसन लगाकर भगवान विष्णु एवं देवगुरु बृहस्पति की आराधना करने से वास्तविक सुख शांति मिलती है।

बृहस्पतिवार के व्रत में उपासक को पूरे दिन में एक समय ही भोजन करना चाहिए। भोजन में चने की दाल, बेसन और दूसरे पीले रंग के खाद्य पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए। व्रत करने वाले पुरुष बृहस्पतिवार को दाढ़ी व सिर के बाल न कटाएँ। पूजा के समय भगवान बृहस्पतिदेव से जो मनोकामना की जाती है, वे उस मनोकामना को पूरा करते हैं।

इस व्रत में व्रत कथा पढ़ने और श्रवण करने का विशेष महत्व है।

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