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जब रणभूमि में सीता के मारे जाने का समाचार सुनकर अचेत हो गए राम

अनिरुद्ध जोशी
एक कथा के अनुसार माना जाता है कि रणक्षेत्र में वानर सेना तथा राम-लक्ष्मण में भय और निराशा फैलाने के लिए रावण के पुत्र मेघनाद ने अपनी शक्ति से एक मायावी सीता की रचना की, जो सीता की भांति ही नजर आ रही थीं। मेघनाद ने उस मायावी सीता को अपने रथ के सामने बैठाकर रणक्षेत्र में घुमाना प्रारंभ किया। वानरों ने उसे सीता समझकर प्रहार नहीं किया।
 
 
बाद में मेघनाद ने मायावी सीता के बालों को पकड़कर खींचा तथा सभी के सामने उसने उसके दो टुकड़े कर दिए। कुछ जगह पर उसका सिर काटने का उल्लेख मिलता है। यह दृश्य देखकर वानर सेना में निराशा फैल गई। सभी सोचने लगे कि जिस सीता के लिए युद्ध कर रहे हैं, वे तो मारी गई हैं। अब युद्ध करने का क्या फायदा? चारों ओर फैला खून देखकर सब लोग शोकाकुल हो उठे। मायावी सीता को मरा जानकर हनुमान की आज्ञा से वानरों ने युद्ध बंद कर दिया। इसी बीच मेघनाद निकुंभिला देवी के स्थान पर जाकर हवन करने लगा। इस हवन से उसमें और भी तरह की शक्तियां आने वाली थी।
 
 
उधार, कहते हैं कि जब यह समाचार राम ने सुना तो वे अचेत जैसे हो गए और लक्ष्मण भी क्रूद्ध हो गए। लेकिन विभिषण ने सभी को अनेक प्रकार से समझाया तथा विभीषण ने कहा कि 'रावण कभी भी सीता को मारने की आज्ञा नहीं दे सकता, अत: यह निश्चय ही मेघनाद की माया का प्रदर्शन है। आप निश्चिंत रहिए।'
 
फिर विभिषण ने लक्ष्मण और राम को मेघनाद की मायावी शक्ति के साथ यह बताया कि ब्रह्मा ने अनेक वर देते हुए यह भी कहा था कि 'यदि तुम्हारा कोई शत्रु निकुंभिला में तुम्हारे यज्ञ समाप्त करने से पूर्व युद्ध करेगा तो तुम मार डाले जाओगे।' विभिषण ने बताया कि यही वक्त है मेघनाद को मारने का 
 
यह सुनकर ससैन्य लक्ष्मण मेघनाद के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। जब मेघनाद आया तो दोनों में युद्ध छिड़ गया। भयंकर युद्ध के बाद लक्ष्मण ने उसके घोड़े और सारथी को मार डाला। मेघनाद लंकापुरी गया तथा दूसरा रथ लेकर फिर युद्ध-कामना के साथ लौटा। दोनों का युद्ध पुनः आरंभ हुआ। अंत में लक्ष्मण ने मेघनाद का वध कर डाला।
 
बालरामायण की एक अन्य कथा के अनुसार जब भगवान राम के सेतुबंध बनाकर युद्ध की सभी तैयारिया पूर्ण कर ली तब रावण ने अपनी माया से एक समय सीता के सिर को राम एवं हनुमान के सामने ही देखते देखते ही काट कर फेंक दिया। यह देखकर राम विभिषण को धिक्कारने लगे कि मेरा समुद्र को लांघना, उस पर पुल बंधवाना निरर्थक हो गया। लक्ष्मण भी क्रूद्ध होकर करने लगे कि हे रावण तुम्हारे इस कृत्य के बदले में हम अपने शोक को तुम्हारी स्त्रियों के आंसुओं से सुखाएंगे। इसी के बीच लक्ष्मण देखते हैं कि सीता का कटा सिर भलीभांती बोल रहा है। तब वह समझ जाते हैं कि यह रावण की कोई माया है।

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