देहरादून में विश्व आयुर्वेद कांग्रेस, अश्वगंधा पर क्या बोले एक्सपर्ट?

Webdunia
रविवार, 15 दिसंबर 2024 (12:46 IST)
World Ayurveda Congress : उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में जारी 10वीं विश्व आयुर्वेद कांग्रेस में विशेषज्ञों ने शनिवार को अश्वगंधा पर पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों को वित्तीय और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत में कई बीमारियों के लिए व्यापक रूप से निर्धारित अश्वगंधा एक आयुर्वेद औषधि है और यह जड़ी-बूटी के रूप में दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आयुर्वेद चिकित्सकों, शिक्षाविदों और उद्योग प्रतिनिधियों ने दावा किया है कि भारत की पारंपरिक आरोग्य प्रणाली साक्ष्य पर आधारित है।
 
डेनमार्क ने अश्वगंधा के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। इस तरह कई अन्य यूरोपीय देशों और अमेरिका ने इस जड़ी-बूटी पर कई प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिसमें कुछ तथाकथित गंभीर दुष्प्रभावों का खुलासा करने वाली अनिवार्य ‘लेबलिंग’ भी शामिल है।
 
‘अश्वगंधा गाथा : सुरक्षा, विज्ञान और साक्ष्य’ विषय पर एक सत्र में विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में दवाएं बनाने के लिए केवल जड़ी-बूटी की जड़ का उपयोग किया जाता है, लेकिन पश्चिमी देशों की कंपनियां दवा बनाने के लिए पौधे की पत्तियों के अर्क का आयात कर रही हैं और यह दावा करते हुए ‘फूड सप्लीमेंट’ (पूरक आहार) के रूप में बेच रही हैं कि इससे बल और जीवन शक्ति में इजाफा होता है।
ALSO READ: क्‍या आयुष्मान भारत में शामिल होगा आयुर्वेद और योग, Supreme Court ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब
सभी विशेषज्ञ इस बात पर एकमत थे कि अश्वगंधा औषधि हजारों वर्षों से भी अधिक समय से सुरक्षित पाई गई है और इसकी पुष्टि सैकड़ों प्रकाशित शोध पत्रों से हुई है। इस कार्यक्रम में भाग लेने वाले आयुर्वेद चिकित्सकों, शिक्षाविदों और उद्योग प्रतिनिधियों ने दावा किया है कि भारत की पारंपरिक आरोग्य प्रणाली साक्ष्य पर आधारित है।
 
‘साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद’ सत्र में भाग लेने वाले विशेषज्ञों ने कहा कि इसके विपरीत गलत धारणा को विशेष रूप से विदेशों में पारंपरिक भारतीय चिकित्सा प्रणाली की व्यापक स्वीकार्यता की राह में एक बड़ी बाधा के रूप में पहचाना गया है।
 
उन्होंने हालांकि सुझाव दिया कि नई दवाओं और उपचारों का नैदानिक ​​​​परीक्षण करके और इसके परिणामों को अंतरराष्ट्रीय पत्रिकाओं और पोर्टलों में प्रकाशित करने के साथ सभी हितधारकों के साथ साझा करके आयुर्वेद की जरूरतों के साक्ष्य-आधार को और मजबूत करने की जरूरत है।
ALSO READ: उत्तराखंड में 16 दिसंबर से सौर कौथिग मेला, मिलेगा सौर ऊर्जा को बढ़ावा
इसके अलावा आयुर्वेद चिकित्सकों को अपने दस्तावेजीकरण कौशल में सुधार करने और ‘आयुर्वेद क्लिनिकल ई-लर्निंग’ जैसे वेब मंचों पर विभिन्न ‘केस स्टडी’ को अपलोड करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। (भाषा)
Edited by : Nrapendra Gupta

सम्बंधित जानकारी

Show comments

जरूर पढ़ें

Aurangzeb को लेकर मुनव्वर राणा के बेटे तबरेज राणा का बयान, तो हिन्दू बचते ही नहीं

RSS नेता भैयाजी जोशी के बयान के बाद मुंबई में भड़का मराठी विवाद, BJP आई बचाव में

Ultraviolette Tesseract e-scooter : फ्यूचर टेक्नोलॉजी के साथ आया सस्ता इलेकिट्रक स्कूटर, सिर्फ 999 रुपए...

Supreme Court ने बताया ED की शक्तियों से जुड़े फैसले पर कब होगी सुनवाई

चीन ने ठोकी ताल, ट्रम्प के टैरिफ पर दी खुली जंग की चुनौती, कहा- हर मोर्चे पर तैयार

सभी देखें

नवीनतम

Mumbai 26/11 Attacks : आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा ने की भारत न भेजने की अपील, बोला- प्रताड़ना से कुछ ही दिनों में हो सकती है मौत

डोनाल्ड ट्रंप का कौनसा कदम है भारत के अनुकूल, विदेश मंत्री जयशंकर ने दिया यह बयान

LIVE: MP के बेतूल में कोयला खदान में गिरी स्लैब, 3 की मौत

Gold rate : सस्ता हुआ सोना, जानिए क्या रहे चांदी के भाव

गरीबों, पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों की अनदेखी कर रही उप्र सरकार : मायावती

अगला लेख