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केदारनाथ के 10 अद्भुत रहस्य, जिन्हें जानकर चौंक जाएंगे आप

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केदारनाथ धाम के कपाट खुल गए हैं। दीपावली महापर्व के दूसरे दिन के दिन शीत ऋतु में मंदिर के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। 6 माह तक मंदिर के अंदर दीपक जलता रहता है। पुरोहित ससम्मान पट बंद कर भगवान के विग्रह एवं दंडी को 6 माह तक पहाड़ के नीचे ऊखीमठ में ले जाते हैं। 6 माह बाद कपाट खुलते हैं, तब उत्तराखंड की यात्रा आरंभ होती है। 
 

केदारनाथ के 10 अद्भुत चमत्कार

1. 2013 की त्रासदी और 'भीम शिला'

2013 में आई भीषण बाढ़ में पूरा केदारनाथ क्षेत्र तबाह हो गया था, लेकिन मंदिर सुरक्षित रहा। बाढ़ के प्रचंड वेग के बीच एक विशाल चट्टान (जिसे अब भीम शिला कहा जाता है) बहकर आई और मंदिर के ठीक पीछे रुक गई। इस शिला ने पानी की धार को दो हिस्सों में बांट दिया, जिससे मंदिर को खरोंच तक नहीं आई।

2. 400 वर्षों तक बर्फ में दबे रहना

वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों के अनुसार, 13वीं से 17वीं शताब्दी तक (छोटा हिमयुग) केदारनाथ मंदिर पूरी तरह से बर्फ के नीचे दबा रहा था। 400 साल तक बर्फ के नीचे रहने के बावजूद मंदिर की संरचना को कोई नुकसान नहीं हुआ, जो कि एक इंजीनियरिंग चमत्कार है।
 

3. त्रिकोणीय शिवलिंग

केदारनाथ में भगवान शिव के विग्रह की पूजा सामान्य शिवलिंग के रूप में नहीं, बल्कि एक त्रिकोणीय विशाल पत्थर के रूप में होती है। इसे 'बैल की पीठ का कूबड़' माना जाता है, जो पांडवों को दर्शन देने के दौरान महादेव ने धारण किया था।

4. मंदिर की अभेद्य बनावट

यह मंदिर 'इंटरलॉकिंग' तकनीक से बना है, जिसमें पत्थरों को जोड़ने के लिए किसी सीमेंट या गारे का इस्तेमाल नहीं हुआ है। पत्थरों को खांचों के जरिए एक-दूसरे में फंसाया गया है। यही कारण है कि यह मंदिर भूकंप और आपदाओं के झटकों को झेलने में सक्षम है।
 

5. अखंड ज्योति का रहस्य

सर्दियों के 6 महीने जब मंदिर के कपाट बंद रहते हैं, तब वहां कोई भी नहीं रहता। पुजारी मंदिर के भीतर एक दीपक (अखंड ज्योति) जलाकर जाते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि 6 महीने बाद जब कपाट खुलते हैं, तो वह दीपक जलता हुआ पाया जाता है और मंदिर वैसा ही स्वच्छ मिलता है जैसा छोड़ा गया था।

6. पांडवों द्वारा निर्मित प्राचीन मंदिर

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण पांडवों ने अपने पापों (कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान हुए गोत्र वध) से मुक्ति पाने के लिए किया था। बाद में आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया।
 

7. भैरवनाथ: क्षेत्र के रक्षक

मंदिर से कुछ दूरी पर भैरवनाथ जी का मंदिर है। माना जाता है कि जब सर्दियों में मंदिर के कपाट बंद होते हैं, तो भैरवनाथ ही पूरे केदार घाटी की रक्षा करते हैं। इन्हें 'क्षेत्रपाल' कहा जाता है।
 

8. भस्म आरती और विशेष ऊर्जा

केदारनाथ की मिट्टी और वहां की हवाओं में एक विशेष प्रकार का चुंबकीय और आध्यात्मिक खिंचाव महसूस किया जाता है। भक्तों का अनुभव है कि मंदिर परिसर में कदम रखते ही शरीर की सारी थकान और मानसिक तनाव गायब हो जाता है। हर समय यहां आरती जैसा ही अनुभव होता रहता है जैसी की आरती चल रही है या  अभी अभी समाप्त हुई है। यानी आरती की आभा बनी रहती है।
 

9. शिव का 'बैल' अवतार और पंचकेदार

कथा है कि जब पांडव महादेव को खोज रहे थे, तब शिवजी ने बैल का रूप लिया। जब भीम ने उन्हें पहचान लिया, तो शिवजी धरती में समा गए। उनका ऊपरी भाग (कूबड़) केदारनाथ में प्रकट हुआ, जबकि अन्य अंग तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मदमहेश्वर और कल्पेश्वर में निकले, जिन्हें 'पंचकेदार' कहा जाता है। कहते हैं उनका सिर नेपाल काठमांडू में निकला।
 

10. उदीच्य और रेतस कुंड

मंदिर के पास कई ऐसे कुंड हैं जिनका पानी औषधीय गुणों से भरपूर है। यहाँ का 'रेतस कुंड' इतना चमत्कारी माना जाता है कि कहा जाता है इसके पास 'ॐ नमः शिवाय' बोलने पर पानी के भीतर से बुलबुले उठने लगते हैं।

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