Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

मां धूमावती जयंती: जब भूख के कारण शिवजी को ही निगल गईं माता पार्वती! पढ़ें कथा

Advertiesment
The image features a caption for Maa Dhumavati Jayanti and a visual depicting the form of Maa Dhumavati
Maa Dhumavati Jayanti: धार्मिक ग्रंथों के अनुसार रहस्य, तंत्र और असीम शक्ति की प्रतीक मां धूमावती का प्रकटोत्सव ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। अग्रेजी कैलेंडर के अनुसार साल 2026 में यह तिथि 22 जून, दिन सोमवार को पड़ रही है। माता धूमावती को तंत्र साधना की 10 महाविद्याओं में से सातवीं उग्र शक्ति माना जाता है।ALSO READ: धूमावती जयंती 2026: मां धूमावती की पूजा से मिलेगा विशेष आशीर्वाद और सिद्धियों का वरदान
 

आइए जानते हैं आखिर क्यों मां धूमावती का स्वरूप इतना अनोखा है, क्या है उनके प्राकट्य की पौराणिक कथा...

 

पौराणिक कथाएं: क्यों धुएं जैसी हो गईं माता पार्वती?

मां धूमावती के प्राकट्य को लेकर पुराणों में बेहद दिलचस्प कथाएं मिलती हैं। इनमें से दो कथाएं सबसे प्रमुख हैं:
 

1. जब माता ने निगल लिया भगवान शिव को

एक बार माता पार्वती को तीव्र भूख लगी। उन्होंने महादेव से भोजन मांगा, तो शिवजी ने उन्हें कुछ समय इंतजार करने को कहा। लेकिन भूख इतनी तेज थी कि माता व्याकुल हो उठीं और उन्होंने सीधे भगवान शिव को ही निगल लिया। शिवजी को निगलते ही माता के शरीर से भयंकर धुआं निकलने लगा। जब उनकी भूख शांत हुई, तब महादेव अपनी माया से उनके पेट से बाहर आए। चूंकि माता का शरीर धुएं (धूम) से ढक गया था, इसलिए शिवजी ने उन्हें 'धूमावती' नाम दिया।
 
शाप की कथा: ऐसा भी माना जाता है कि महादेव को निगलने के कारण उनका स्वरूप एक विधवा जैसा हो गया था। शिव के गले में मौजूद हलाहल विष के असर से उनका पूरा शरीर काया विहीन और श्रृंगार विहीन हो गया, जिसके बाद शिवजी ने उन्हें इसी रूप में रहने का शाप दिया।
 

2. सती के आत्मदाह का धुआं

एक अन्य कथा के अनुसार, जब माता सती ने अपने पिता के यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया था, तब उनके जलते हुए शरीर से जो उदास धुआं निकला, उसी से देवी धूमावती का जन्म हुआ। इसी कारण वे हमेशा उदास दिखाई देती हैं।
 

कौन हैं माता धूमावती और क्या है उनका स्वरूप?

माता धूमावती महाशक्ति की स्वयं नियंत्रिका हैं। ऋग्वेद के रात्रिसूक्त में इन्हें 'सुतरा' कहा गया है, जिसका अर्थ है- सुखपूर्वक तारने वाली। धूमावती माता का कोई स्वामी नहीं है, वह अकेली शक्ति है, इसलिए इन्हें विधवा रूप में पूजा जाता है। इनका मुख्य अस्त्र 'सूप' (Soot) है, जिसमें वे पूरे ब्रह्मांड को समेटकर महाप्रलय ला सकती हैं। ऋषि दुर्वासा, भृगु और परशुराम जैसे महाप्रतापी ऋषियों की मूल शक्ति मां धूमावती ही हैं। इन्हें सृष्टि की कलहप्रिय देवी भी कहा जाता है।
 

साधना का फल: दूर होते हैं सारे संकट

मां धूमावती की साधना के लिए चतुर्मास का समय सबसे उत्तम माना जाता है। इनकी पूजा से साधक को यह लाभ मिलते हैं, जैसे- जो जीवन से हर प्रकार का डर और चिंता खत्म हो जाती है। आत्मबल में गजब की वृद्धि होती है। मान्यता है कि सिद्ध होने पर देवी 'सूकरी' के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोगों, संकटों और शत्रुओं का नाश कर देती हैं।
 
अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Mahesh Navami 2026: महेश नवमी क्यों मनाई जाती है, क्या करते हैं इस दिन, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

Mahesh Navami 2026: महेश नवमी क्यों मनाई जाती है, क्या करते हैं इस दिन, जानिए पूजा का शुभ मुहूर्त