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हिन्दुओं के लिए क्यों महत्वपूर्ण है बांग्लादेश, जानिए

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सोमवार, 18 अक्टूबर 2021 (15:00 IST)
भारत के बंटवारे में सबसे ज्यादा नुकसान कश्मीरी, पंजाबी, सिंधी और बंगालियों को हुआ। खासकर विभाजन तो पंजाब और बंगाल का ही हुआ था। बंगाल की बात करें तो एक ऐसा दौर था जबकि अंग्रेजों द्वारा बंगाल का विभाजन किया जा रहा था तो संपूर्ण बंगालियों ने एक स्वर में इसका विरोध किया था। उनका कहना था कि धर्म के आधार पर एक राष्ट्र को विभाजित कर देना बंगालियों की एकता को खंडित करना था। सभी बंगालियों का धर्म कुछ भी हो परंतु हैं सभी बंगाली।
 
 
इस विरोध से मामला भले ही कुछ वर्षों के लिए टल गया था परंतु 1947 में पंजाबी और बंगालियों के बलिदान को ताक में रखकर भारत का विभाजन कर दिया गया। फिर पाकिस्तान की सेना के अत्याचार का बंगाल में लंबा दौर चला इसके बाद 16 दिसम्बर, 1971 ईस्वी को पूर्वी पाकिस्तान शेष पाकिस्तान से अलग होकर एक स्वतंत्र सार्वभौम प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्र बन गया, जो अब 'बांग्लादेश' कहलाता है। इसके बनने के बाद वहां के हिन्दुओं ने राहत की सांस ली थी कि चलो अब कट्टता से छुटकारा मिला। अब हम अपनी जिंदगी अपने तरीके से जी सकेंगे। परंतु ऐसा संभव नहीं हो पाया। कुछ वर्षों बाद ही हिन्दुओं का सपना टूट गया।
 
 
बांग्लादेश में हिन्दू : बंग-भंग के दौर में पूर्वी बंगाल में अनुमानीत रूप से 40 प्रतिशत हिन्दू आबादी निवास करती थी। आजादी के वक्त 13.50% हिंदू थे। 2011 की जनगणना के अनुसार अब 8.54% हिन्दू ही बचे हैं। बांग्लादेश में पहली जनगणना में (जब वह पूर्वी पाकिस्तान था) मुस्लिम आबादी 3 करोड़ 22 लाख थी जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या 92 लाख 39 हजार थी। 70 वर्षों बाद हिन्दुओं की संख्या केवल 1 करोड़ 20 लाख है जबकि मुस्लिमों की संख्या 12 करोड़ 62 लाख से अधिक हो गई है। पिछले कुछ वर्षों में यहां हिन्दुओं पर हमलों की कई घटनाएं हुई हैं। हिन्दुओं की संपत्तियों को लूटा गया, घरों को जला दिया गया तथा मंदिरों की पवित्रता को भंग कर उसे आग के हवाले कर दिया गया और ये हमले बेवजह किए गए।
 
पाकिस्तान का जबरन हिस्सा बन गए बंगालियों ने जब विद्रोह छेड़ दिया तो इसे कुचलने के लिए पश्‍चिमी पाकिस्तान ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। पाकिस्तान की सत्ता में बैठे लोगों की पहली प्रतिक्रिया उन्हें 'भारतीय एजेंट' कहने के रूप में सामने आई और उन्होंने चुन-चुनकर शिया और हिन्दुओं का कत्लेआम करना शुरू कर दिया। 24 साल के भीतर ही यह दूसरा क्रूर विभाजन था जिसमें लाखों बंगालियों की मौत हुई। हजारों बंगाली औरतों का बलात्कार हुआ। एक गैरसरकारी रिपोर्ट के अनुसार लगभग 30 लाख से ज्यादा हिन्दुओं का युद्ध की आड़ में कत्ल कर दिया गया। 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ 9 महीने तक चले बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हिन्दुओं पर अत्याचार, बलात्कार और नरसंहार के आरोपों में दिलावर को दोषी पाया गया था।
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ऐसे में बांग्लादेश मुक्तिवाहिनी और भारतीय सेना ने अपना खून बहाकर सन् 1971 में बांग्लादेश को पाकिस्तान के कब्जे से आजाद कराया गया। 1971 के खूनी संघर्ष में पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) के लगभग 1 करोड़ हिन्दू और मुसलमानों को पड़ोसी देश भारत के पश्‍चिम बंगाल, पूर्वोत्तर राज्य (असम आदि) में शरण लेनी पड़ी। बांग्लादेश बनने के बाद युद्ध शरणार्थी शिविरों में रहने वालों मुसलमानों को सरकार ने आज तक उनके देश भेजने का कोई इंतजाम नहीं किया। अनुमानीत रूप से अब इनकी संख्‍या 1 करोड़ से बढ़कर 3.50 करोड़ के आसपास हो गई है।
 
बांग्लादेश की उत्तर, पूर्व और पश्चिम सीमाएं भारत और दक्षिण-पूर्व सीमा म्यांमार से मिलती हैं। दक्षिण में बंगाल की खाड़ी है। बांग्लादेश के पश्चिम में भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल है तो उत्तर-पूर्व में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम हैं। दूसरी ओर बांग्लादेश के दक्षिण-पूर्व में म्यांमार का रखैन इलाका है। जहां-जहां से भारत की सीमा बांग्लादेश से लगती है अब वहां जातीय गणित गड़बड़ा गया है। हिन्दू अल्पसंख्‍यक हो गया है और मुसलमान बहुसंख्‍यक। बांग्लादेश की ओर से घुसपैठ जारी है जिसके चलते असम में हालात बिगड़ गए हैं।
 
शाक्त धर्म का गढ़ है बांग्लादेश : 
हिन्दुओं के लिए भारत का बंगाल, असम सहित समूचा बांग्लादेश बहुत ही महत्व रखता हैं, क्योंकि यह संपूर्ण क्षेत्र ही शाक्त धर्म का मुख्य गढ़ है। यहां पर माता सती के 108 शक्तिपीठों में से अधिकतर यहीं पर ही है। देवी आराधना का यह प्रमुख स्थान है। भारत का बंटवारा जब हुआ था तब भारतीय हिन्दुओं ने अपने कई तीर्थ स्थल, शक्तिपीठ और प्राचीन मंदिरों को खो दिया। वर्तमान में उनमें से बहुतों का अस्तित्व मिटा दिया गया और जो बच गए हैं वे भी अपनी अस्तित्व के मिट जाने के मुहाने पर है। बांग्लादेश में प्रमुख रूप से आज भी 5 मत्वपूर्ण शक्तिपीठ विद्यमान हैं। 
 
1.श्रीशैल- महालक्ष्मी
बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के उत्तर-पूर्व में जैनपुर गांव के पास शैल नामक स्थान पर माता का गला (ग्रीवा) गिरा था। इसकी शक्ति है महालक्ष्मी और भैरव को शम्बरानंद कहते हैं।
 
2.करतोयातट- अपर्णा
बांग्लादेश के शेरपुर बागुरा स्टेशन से 28 किमी दूर भवानीपुर गांव के पार करतोया तट स्थान पर माता की पायल (तल्प) गिरी थी। इसकी शक्ति है अर्पण और भैरव को वामन कहते हैं।
 
3.यशोर- यशोरेश्वरी
बांग्लादेश के खुलना जिला के ईश्वरीपुर के यशोर स्थान पर माता के हाथ और पैर गिरे (पाणिपद्म) थे। इसकी शक्ति है यशोरेश्वरी और भैरव को चण्ड कहते हैं।
 
4.चट्टल- भवानी
बांग्लादेश में चिट्टागौंग (चटगांव) जिला के सीताकुंड स्टेशन के निकट चंद्रनाथ पर्वत शिखर पर छत्राल (चट्टल या चहल) में माता की दायीं भुजा गिरी थी। इसकी शक्ति भवानी है और भैरव को चंद्रशेखर कहते हैं।
 
5.जयंती- जयंती
बांग्लादेश के सिल्हैट जिले के जयंतीया परगना के भोरभोग गांव कालाजोर के खासी पर्वत पर जयंती मंदिर जहां माता की बायीं जंघा गिरी थी। इसकी शक्ति है जयंती और भैरव को क्रमदीश्वर कहते हैं।
 

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