Publish Date: Sat, 13 Sep 2025 (17:23 IST)
Updated Date: Sat, 13 Sep 2025 (17:29 IST)
Solar eclipse on sarvapitri amavasya 2025: 7 सितंबर 2025 रविवार को चंद्र ग्रहण वाले दिन 16 श्राद्ध प्रारंभ हुए थे और अब 21 सितंबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन सूर्य ग्रहण रहेगा। यह संयोग करीब 100 वर्षों के बाद बना है। सूर्य ग्रहण वाले दिन कब और कैसे करें सर्वपितृ अमावस्या के दिन का श्राद्ध, जानिए कुतुप काल मुहूर्त और सावधानियां।
सर्वपितृ अमावस्या का महत्व: श्राद्ध पक्ष में आने वाली आश्विन माह की अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध किया जाता है। इस दिन सभी ज्ञात और अज्ञात पितरों का श्राद्ध करने का विधान है। यदि तिथि ज्ञात नहीं है तो भी इस दिन श्राद्ध करते हैं। यह पितरों की विदाई का अंतिम और 16वां दिन होता है। इस दिन श्राद्ध कर्म करने और ब्राह्मण भोज कराने का खास महत्व माना गया है।
21 सितम्बर 2025 सर्वपितृ अमावस्या के समय श्राद्ध का समय:-
कुतुप मूहूर्त- दिन में 11:50 से दोपहर 12:38 तक।
रोहिणी मूहूर्त- दोपहर 12:38 से अपराह्न 01:27 तक।
अपराह्न काल- दोपहर बाद 01:27 से 03:53 तक।
सर्वपितृ अमावस्या के नियम और सावधानियां:
1. इस दिन खीर, पूरी, भजिये, तुअर दाल, चावल, रोटी, मीठा आहार, फल, मिठाई, पालक, भिंडी, जौ, मटर, दूध, शहद और तील आदि उत्तम और सात्विक आहार ले सकते हैं।
2. श्राद्ध में चरखा, मांसाहार, बैंगन, प्याज, लहसुन, बासी भोजन, सफेद तील, मूली, लौकी, काला नमक, उड़द, कुलथी, सत्तू, जीरा, मसूर की दाल, सरसो का साग, सरसों की पत्ती, चना, काला जीरा, कचनार, खीरा, आदि वर्जित माना गया है। कोई यदि इनका उपयोग करना है तो पितर नाराज हो जाते हैं।
सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध कैसे करें:
सबसे पहले तर्पण करें, फिर पिंडदान करें, फिर अग्निहोत्र कर्म करें, फिर पंचबलि कर्म करें और अंतम में ब्राह्मण भोज कराएं।
1. तर्पण और पिंडदान : सर्वपितृ अवमावस्या पर तर्पण और पिंडदान का खासा महत्व है। सामान्य विधि के अनुसार पिंडदान में चावल, गाय का दूध, घी, गुड़ और शहद को मिलाकर पिंड बनाए जाते हैं और उन्हें पितरों को अर्पित किया जाता है। पिंडदान के साथ ही जल में काले तिल, जौ, कुशा, सफेद फूल मिलाकर तर्पण किया जाता है। पिंड बनाने के बाद हाथ में कुशा, जौ, काला तिल, अक्षत् व जल लेकर संकल्प करें। इसके बाद इस मंत्र को पढ़े. “ॐ अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त सर्व सांसारिक सुख-समृद्धि प्राप्ति च वंश-वृद्धि हेतव देवऋषिमनुष्यपितृतर्पणम च अहं करिष्ये।।'
2. अग्निहोत्र कर्म: एक कंडा अर्थात उपला जलाएं। उस पर घी मिला थोड़ा गुड़ डालें। इस तरह धूप दें। इसके बद घर में ब्राह्मण भोज के लिए जो भी अन्न बना है उसमें से थोड़ा थोड़ा अग्नि में डालें। इस तरह अग्निहोत्र कर्म करें। सभी के नामों का एक एक कोल डालते हुए मंत्रों से यह कर्म करें।
3. पंचबलि कर्म: इस श्राद्ध में पंचबलि अर्थात गोबलि, श्वानबलि, काकबलि और देवादिबलि कर्म जरूर करें। अर्थात इन सभी के लिए विशेष मंत्र बोलते हुए भोजन सामग्री निकालकर उन्हें ग्रहण कराई जाती है। अंत में चींटियों के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालने के बाद ही भोजन के लिए थाली अथवा पत्ते पर ब्राह्मण हेतु भोजन परोसा जाए। साथ ही जमई, भांजे, मामा, नाती और कुल खानदान के सभी लोगों को अच्छे से पेटभर भोजन खिलाकर दक्षिणा जरूर दें।
4. ब्राह्मण भोज: यथाशक्ति 1, 3, 5, 11 या 21 ब्राह्मणों या बटुकों को बुलाकर उन्हें भरपेट भोजन कराएं। भोजन के बाद उन्हें यथाशक्ति दान दक्षिणा देकर विदा करें।
WD Feature Desk
Publish Date: Sat, 13 Sep 2025 (17:23 IST)
Updated Date: Sat, 13 Sep 2025 (17:29 IST)