Shri Krishna 18 May Episode 16 : देवकी और वसुदेव को जब फिर से हुआ कारावास

अनिरुद्ध जोशी

सोमवार, 18 मई 2020 (22:13 IST)
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 18 मई के 16वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 16 ) वसुदेवजी को कंस के समक्ष ले जाकर खड़ा किया जाता है। फिर कंस सैन्य प्रधान से कहता है कि तुम जा सकते हो। तत्पश्चात कंस वसुदेवजी से कहता है कि कुमार वसुदेव तुम अपने आप को सत्यवादी कहते हो और यदि तुम जैसा सत्यवादी झूठ बोले तो उसे क्या दंड देना चाहिए? वसुदेवजी कहते हैं कि दंड देने का काम तो राजा का है अत: राजा ही निश्चित करें कि क्या दंड देना चाहिए।

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इसका अर्थ ये है कि तुम ये बात स्वीकार करते हो कि तुमने झूठ बोला? तब वसुदेवजी कहते हैं कि नहीं, मैं इस बात को स्वीकार नहीं करता कि मैंने कोई झूठ बोला है। तब कंस क्रोधित होकर कहता है कि तुमने अवश्य झूठ बोला है और इससे इनकार करके एक और झूठ बोल रहे हो। जब तुमने कन्या कहकर उस आठवीं संतानों को मेरे समक्ष प्रस्तुत किया तभी मैं समझ गया था कि इसमें अवश्य कोई छल किया जा रहा है। तब मैंने तुमसे पूछा था कि क्या ये सत्य है कि कन्या का जन्म हुआ हैतो तुमने कहा था, हां सत्य है। क्या उस समय तुमने सत्य बोला था? 
 
वसुदेवजी कहते हैं कि हां उस समय मैंने जो कुछ कहा था वह सत्य था। कंस कहता है कि फिर वह कन्या जब मेरे हाथ से छिटकर आकाश में चली गई तो उसने कहा कि तुझे मारने वाला तो जन्म ले चुका है तो क्या वह सत्य नहीं था? तुम दोनों में से किसका कथन सत्य है? तुम्हारा या उस देवी का? तब वसुदेवजी कहते हैं कि दोनों का ही कथन सत्य हो सकता है। तब कंस कहता है सत्य कभी दो नहीं होता। सत्य केवल एक होता है। तब वसुदेवजी कहते हैं मनुष्य का ज्ञान जितना होता है वह उतना ही सत्य जानता है। पूर्ण सत्य तो भगवान ही जानते हैं।
 
लेकिन कंस क्रोध में आकर कहता है कि तुमने मेरे साथ विश्वासघात किया है, छल किया है। तब वसुदेवजी कंस को समझाते हैं कि मैंने अपने होश में तुम्हारे साथ कोई छल नहीं किया। कंस यह सुनकर कहता है कि तो इसका अर्थ ये है कि तुम उस समय होश में नहीं थे? क्या अब होश में हो? कुछ बता सकते हो? 
 
वसुदेवजी चुप रह जाते हैं तो कंस कहता है कि इसका मतलब तुम अभी भी होश में नहीं हो, लेकिन देवकी अवश्य होश में होगी। मैं उसीसे पूछता हूं कि तुम्हें अपना पुत्र अधिक प्यारा है या पति? तब तक में तुम्हें फिर से कारागार में बंद करता हूं। यह कहकर वह सैनिकों को आदेश देकर वसुदेवजी को कारागार भेज देते हैं और सैनिकों से कहते हैं कि जब ये कहे कि मुझे होश आ गया तब इसे हमारे सामने उपस्थित करना।
 
फिर कंस देवकी के पास जाकर पूछता है, देवकी मैं एक ही बात पूछने आया हूं। क्या तुम्हारा आठवां पुत्र गोकुल में पल रहा है? वह कृष्ण नाम का बालक जिसे यशोदा और नंद का पुत्र कहा जाता है क्या वहीं तुम्हारा पुत्र है? इस पर देवकी कहती है कि नहीं भैया वह तो नंद और यशोदा भाभी का ही पुत्र है मेरा कुछ नहीं लगता। तब कंस कहता है कि तुम भी अपने पति की भांति झूठ बोल रही हो। (उल्लेखनीय है कि देवकी को यह पता रहता है कि रोहिणी का पुत्र मेरा सप्तम पुत्र है, लेकिन उसे यशोदा के पुत्र के बारे में कुछ पता नहीं रहता है जबकि वसुदेवजी को गर्ग मुनि सब कुछ बता देते हैं)
 
तब देवकी कहती हैं नहीं भैया मैं सच कह रही हूं। नंदजी तो स्वयं यह समाचार देने के लिए आपके दरबार में आए थे कि वह उनका पुत्र है। उनकी बहुत वर्षों की कामना भगवान ने पूरी की है। वो उन्हीं का पुत्र है। इस पर कंस कहता है कि यही तो प्रश्न है कि इतने दिनों से जो कामना पूरी नहीं हुई वह सहसा उसी दिन कैसे पूरी हो गई जिस दिन तुमने एक कन्या को जन्म दिया? देवकी कहती है कि ये तो संयोग की बात है। कंस कहता है कि संयोग की नहीं, ये छल की बात है। अंत में कंस कहता है देवकी तुम्हें अपना पुत्र अधिक प्यारा है ये पति?
 
यह सुनकर देवकी सहम जाती है और पशोपेश में पड़ जाती है। तब देवकी कहती है कि तुमने मेरे सारे पुत्र मुझसे छीन लिए अब मेरा सुहाग मत उजाड़ों। मैं शपथ खाकर कहती हूं कि मेरी अष्टम संतान वह कन्या ही थीं। मैं तुम से दया की भीख मांगती हूं। लेकिन कंस क्रोधित होकर सैनिकों को आदेश देता है कि ये दोनों ऐसा नहीं मानेंगे। इसे भी कारागार में इसके पति के साथ डाल दो। फिर कंस कहता है कि मैं तुम्हें एक अवसर और देता हूं कारागार में तुम दोनों मिलकर सब सच सच बता दो। मैं तुम्हारे लिए एक और महल बनवा दूंगा। तुम्हारे पति को राजदरबार में एक सम्मानित पदवी प्रदान कर दूंगा। मैं एक महीने तक प्रतीक्षा करूंगा यदि तब तक नहीं बताया तो मैं तुम दोनों का आधा भोजन करके तिल तिल समाप्त कर दूंगा।
 
उधर कारागार में वसुदेवजी महर्षि गर्ग की बातें सुनकर अपने अष्टम पुत्र के बारे में सोच सोचककर गद्गद् हो रहे होते हैं। खुद को भाग्यशाली समझ रहे होते हैं। महर्षि की कृपा से उन्हें उस रात्रि की स्मृति लौट आती है जिसे सोचकर वह आंसू से भर जाते हैं। वे आंखे बंद करके भगवान का धन्यवाद दे रहे होते हैं तभी वहां सैनिक देवकी को लाकर छोड़ देते हैं। देवकी वसुदेवजी के गले लगकर रोने लगती है।
 
फिर देवकी वसुदेवजी से कहती हैं कि एक बार आप भैया को सत्य बता दें कि उनकी अष्टम संतान कन्या थीं तो वह मुक्त हो जाएंगे। नहीं तो वह मेरे सातवें पुत्र को ही आठवां पुत्र समझकर उसकी हत्या कर देगा। तब वसुदेवजी कहते हैं कि नहीं ये संभव नहीं मैं ये कह नहीं सकता। तब देवकी रोते हुए पूछती हैं क्यों नहीं कह सकते?
 
इस पर वसुदेवजी कहते हैं क्योंकि यह सत्य नहीं है। यह सुनकर देवकी आश्चर्य से पूछती है क्या यह सत्य नहीं है, तो फिर सत्य क्या है? तब वसुदेवजी बताते हैं कि वही तो बताने के लिए तुम समय नहीं दे रही हो। देवकी सत्य यह है कि तुम्हारा अष्टम पुत्र भी जीवित है।... यह सुनकर देवकी आश्चर्य और खुशी से देखने लगती है। तब वसुदेवजी कहते हैं कि तुम्हारी अष्टम संतान एक पुत्र है और जिसका नाम कृष्ण है।.... यह सुनकर देवकी अवाक् रह जाता है और वह बेहोश हो जाती है।
 
उधर, महर्षि गर्ग के आश्रम में कंस का महामंत्री जाकर कहता है कि महाराज कंस ने आपसे राजमहल में पधारने की प्रार्थना की है। उन्हें आपसे आवश्यक कार्य है। महर्षि गर्ग उस महामंत्री के साथ रथ मैं बैठकर चले जाते हैं। राजमहल में कंस उन्हें प्रतीक्षा करवाने के बाद आता है और अपने सिंहासन पर बैठ जाता है तो महर्षि कहते हैं कि राजन आपने हमें यहां क्यों बुलाया है? तब कंस कहता है कि आपसे हमें कुछ परामर्श करना है। तब महर्षि गर्ग कहते हैं कि गुरु से परामर्श करना हो तो गुरु के द्वार स्वयं आना होता है। फिर महर्षि गर्ग बताते हैं कि किस किस परिस्थितियों में गुरु को बुलाया जाता है। तब कंस कहता है कि ये विपत्ति का समय है।
 
तब कंस पूछता है कि आपने गोकुल गांव में जाकर किसी बालक का नामकरण संस्कार किया है? यदि किया था तो किस बालक का नामकरण संस्कार किया, क्यूं किया और किसकी आज्ञा से किया? तब ऋषि थोड़े से क्रोधित होकर कहते हैं कि हम गोकुल गांव में गए ही नहीं। हम यमुना पार ऋषि शांडिल्य के आश्रम में गए थे और वहीं से लौट आए। और बात रही आज्ञा की तो एक पुरोहित और गुरु होने के नाते अपने यजमानों के जन्म से लेकर मरने तक के सभी संस्कार कराना हमारा कर्तव्य ही नहीं, हमारा धर्म भी है। और धर्म पालन के लिए किसी की आज्ञा हो अथवा न हो उससे धर्म पालन में कोई अंतर नहीं पड़ सकता।
 
तब कंस कहता है कि हम यहां के राजा है और राजा की आज्ञा का पालन करना सभी का कर्तव्य है। तब गर्ग मुनि कहते हैं कि राजा की आज्ञा का पालन करना उनके सेवकों का काम होता है गुरु का नहीं। गुरु का काम है आज्ञा देना। तब कंस भड़ककर कहता है कि वह बालक कौन था इस प्रश्न का उत्तर दीजिए। ये हमारी आज्ञा है। यह सुनकर महर्षि गर्ग कहते हैं कि यह तुम्हारे अधिकार में नहीं है कि तुम हमें आज्ञा दो। तब कंस तलवार निकाल लेता है।
 
तब महर्षि गर्ग मुस्कुराते हुए उठते हैं और कहते हैं कि तुम मर्यादा और शिष्टाचार की हदें पार कर रहे हो। तुम इतना छोटासा शिष्टाचार भी भूल गए कि गुरु को घर में बुलाकर उससे प्रतीक्षा नहीं कराई जाती, बल्की स्वयं द्वार पर जाकर उसका स्वागत किया जाता है। फिर महर्षि गर्ग उसे उपदेश देकर कहते हैं कि हम आपकी समस्त धृष्टता को क्षमा करते हैं और आपको आशीर्वाद देते हैं जिससे आपको सद्बुद्धि मिले। यह कहकर महर्षि गर्ग मुनि वहां से चले जाते हैं। कोई उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है।
 
महर्षि गर्ग मुनि दूर तक चले जाते हैं तब कंस कहता है सैनिक उस बुढ़े को बाल सहित घसिटकर हमारे समक्ष ले जाओ। वह राजमहल से बाहर नहीं जाना चाहिए। सैनिक जाने लगते हैं तभी महामंत्री सैनिकों को रोककर कहता है, क्षमा करें महाराज ये हमारे हित में नहीं होगा। कंस कहता है कि एक भिखमंगा साधु राजा की शक्ति को चुनौति देकर चला गया और तुम उसे रोकना भी नहीं चाहते। राजा के राजदंड की मर्यादा कहां रह गई। तब महामंत्री कहता है कि राजन आप नहीं जानते उस तपस्वी के पास राजदंड से बड़ा ब्रह्मदंड है। कंस कहता है ब्रह्मदंड?
 
महामंत्री बताता है कि आपने वह कथा तो सुनी होगी कि किस प्रकार ऋषि वशिष्ठ ने विश्वामित्र की सारी सेना को ब्रह्मदंड के माध्यम से नाश कर दिया था। महर्षि गर्ग उसी श्रेणी के सिद्ध योगी है। यह सुनकर कंस भयभीत हो जाता है। फिर महामंत्री कहता है, उनकी शक्ति को ललकारना हमारे हित में नहीं होगा। हमारी ये चाल ही गलत थी। ऐसे महात्माओं से सहायता के लिए उनकी दया और करुणा को जगाना चाहिए। इस पर कंस कहता है कि कंस किसी से दया भी भीख नहीं मांगता। उसे अपनी शक्ति पर भरोसा है। यह कहकर कंस वहां से चला जाता है। जय श्रीकृष्ण।

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