Shri Krishna 25 May Episode 23 : बकासुर और अघासुर के मायावी जाल में जब फंस गए कृष्ण सखा

अनिरुद्ध जोशी

सोमवार, 25 मई 2020 (22:03 IST)
निर्माता और निर्देशक रामानंद सागर के श्रीकृष्णा धारावाहिक के 25 मई के 23वें एपिसोड ( Shree Krishna Episode 23 ) में वस्त्र हरण के बाद यशोदा मैया को भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हुए बताया जाता है। फिर वह आंगन में लगी तुलसी माता की पूजा और गोशाल में गाय की पूजा करती हैं। इसके बाद वह पलंग पर सोये लल्ला को जगाकर कहती है ग्वालबाल मधुबन में गय्या चराने के लिए तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। बालकृष्ण को अब किशोरावस्था का बताया जाता है।

रामानंद सागर के श्री कृष्णा में जो कहानी नहीं मिलेगी वह स्पेशल पेज पर जाकर पढ़ें...वेबदुनिया श्री कृष्णा
 
कृष्‍णा उठकर तैयार होकर ग्वाल बालाओं के साथ गायों को लेकर बांसुरी बजाते हुए निकल जाते हैं। सभी नगरवासी उनकी बांसुरी सुनकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। गायों को लेकर वह नगर से बाहर निकल जाते हैं। उनके पीछे ग्वाल बालें और गायें होती हैं। फिर सभी सखा यमुना तट के एक वृक्ष के नीचे कन्हैया की बांसुरी सुनते रहते हैं और गायें चरती रहती हैं। तभी एक ग्वाल देखता है कि विशालकाय बगुला हमारी ओर आ रहा है। वह कृष्णा से कहता है अरे कृष्णा, वो देखो कितना बड़ा बगुला। सभी उस ओर देखते हैं।
 
 
वह बगुला आकर यमुना के तट पर बैठ जाता है। कंस के दो सिपाही छुपकर यह दृश्य देख रहे होते हैं। कृष्णा उस बगुले को ध्यान से देखते हैं तो पता चल जाता है कि ये कोई राक्षस है। तभी एक सखा बोलता है भागो रे भागो नहीं तो ये हम सबको खा जाएगा। इस पर कृष्णा कहते हैं अरे गोकुल के वीरों इस प्रकार कायरों की भांति कहां भाग रहे हो? तनिक ठहरो मैं देखता हूं कि ये कैसे बगुला है।
 
तब मनसुखा कान्हा का हाथ पकड़कर कहता है कहां जा रहे हो कान्हा। ये बगुला नहीं कोई भूत-प्रेत है। तब कान्हा कहते हैं छोड़ मनसुखा मुझे जाने दें। यदि हम यहां से चले गए तो वह हमारे बछड़ों को खा जाएगा। तभी सभी कान्हा को पकड़कर बोलते हैं मत जाओ। यह देखकर दाऊ भैया कहते हैं जाने दो इसे। इसे कुछ नहीं होगा। 
 
फिर कान्हा चले जाते हैं। दोनों सिपाही यह देखकर मुस्कुराते हैं। गांव के और ग्वाले भी यह दृश्य देखने के लिए एकत्रित हो जाते हैं। फिर कान्हा उस विशालकाय बगुला के पास जाकर खड़े हो जाते हैं तो वह बगुला कान्हा को अपनी चोंच में लेकर निकल जाता है। यह दृश्य देखकर सभी सखा चिंतित हो जाते हैं, लेकिन दाऊ भैया मुस्कुराते रहते हैं।
 
कान्हा उसके पेट में पहुंचकर अपनी माया से आग उत्पन्न कर देते हैं। बगुले के पेट में जलन होती है तो वह चोंच खोल देता है जिसमें से कान्हा बाहर निकलकर कूद जाते हैं। यह देखकर सभी आश्चर्य करते हैं। फिर वह बगुला चोंच से कान्हा को मारने का प्रयास करता है। फिर कान्हा उसकी दोनों चोंच पकड़कर उसका सिर फाड़कर उसे यमुना में फेंक देते हैं। यह देखकर सैनिक अचंभित हो जाते हैं और सभी सखा खुशी के मारे उछल पड़ते हैं। सभी नारे लगाते हैं...हाथी घोड़ा पालकी, जै कन्हैया लाल की।
 
उधर, जब कंस को यह समाचार मिलता है तो वह कहता है कि बकासुर जैसे बलवान दैत्य को वह बालक नहीं मार सकता। तब सैनिक कहता है महाराज ये सत्य है। वह तो उस बालक को निकल गया था लेकिन चबा नहीं सका तो बाहर उगल दिया। तब कंस कहता है कि मूर्ख था वह यदि वह उसे चबा नहीं सकता था तो उसे चोंच में दबाकर यहां ले आता। यहां हम उस बालक का वध कर देते। तब कंस चाणूर से कहता है कि कितने दुख की बात है कि हमारे पास इतनी भी शक्ति नहीं जो हम उस छोटेसे बालक का अंत कर सकें? फिर कंस कहता है कि ये बालक कुछ और ही है। चाणूर याद है उस योगमाया ने क्या कहा था। उसी काल का हमें भय है और इस भय से मुक्ति पाने की हमारी कोई योजना सफल नहीं हो रही है। बताओ अभी और कोई है जिसे ये कार्यभार सौंपा जाए?
 
 
तब चाणूर कहता है कि है पूतना और बकासुर का बड़ा भाई अघासुर। यह सुनकर कंस कहता है वो अजगर। फिर चाणूर कहता हैं हां, धरती पर उससे बड़ा कोई सर्प नहीं है और वह मायावी भी है। कंस कहता है तो बुलाओ उसे। यह कहकर वह जोर से कहता है अघासुर। तभी एक विशालकाय अजगररूप में अघासुर वहां प्रकट हो जाता है। यह देखकर कंस के चेहरे पर आश्चर्य और प्रसन्नता के भाव आ जाते हैं।
 
 
तब अघासुर कहता है कि महाराज मैंने अपने भाई की मृत्यु का समाचार सुन लिया है। मेरे अंदर इस समय प्रतिशोध की ज्वालाएं भड़क रही हैं। मुझे आज्ञा दीजिए की उस बालक का भक्षण करके अपनी बहन और भाई की मृत्यु का बदला ले लूं। कंस प्रसन्न होकर कहता है, आज्ञा है अघासुर आज्ञा है। अघासुर कहता है कि मैं बकासुर जैसी मूर्खता नहीं कर सकता। एक बार निकल लेने के बाद अजगर के जबड़े जब बंद हो जाते हैं तो स्वयं भगवान भी उसे खोल नहीं सकते। तब कंस कहता है कि ठीक है परंतु बकासुर की घटना के बाद वह बहुत चौकन्ना हो गया होगा आसानी से तुम्हारे मुंह के सामने नहीं आएगा। तब अघासुर कहता है कि आपके सामने तो अपना लघु शरीर लेकर आया हूं। मेरा शरीर तो इससे कई गुना अधिक विशाल है महाराज। तब कंस कहता है जाओ अघासुर जाओ विजय हो।
 
 
सभी सखा बकासुर के वध का उत्सव मना रहे होते हैं। वे कृष्णा को उठाकर घुम रहे होते हैं। तभी विशालकाय अजगर को देखकर सभी गायें उल्टा गांवी की दौड़ने लगती हैं। यह देखकर मनसुखा कहता है कि अरे इधर कहां आ रही हो। देखती नहीं हमारे सेनापति आ रहे हैं। गायों की भगदड़ के बीच सखाओं के हाथ से कंधे पर बैठे कान्हा गिर पड़ते हैं। तब कान्हा कहते हैं कि अरे अपने सेनापति को ही गिरा दिया तो तुम्हारी रक्षा कौन करेगा। तब मनसुखा और श्रीदामा चिकनी चुपड़ी बातें करके कृष्णा को मनाते हैं। तब कृष्णा कहते हैं भाई ठीक है मैं ही तुम्हारा रक्षक हूं अच्‍छा चलो अब भोजन कर लेते हैं। तभी श्रीदामा कहता है अरे ये गुफा यहां कहां से आ गई। मनसुखा भी कहता है कि हां पहले तो कभी नहीं थी यहां गुफा। तब एक सखा कहता है कि हो सकता है कि यह झाड़ियों से ढंकी रही हो और कल की आंधी में झाड़ियां उड़ गई हो। कृष्ण भी देखते हैं। 
 
तब मनसुखा कहता है चलो चलकर देखते हैं। सभी अजगर के मुंह को गुफा समझकर उसके पास चले जाते हैं लेकिन कृष्ण पीछे खड़े देखकर समझ जाते हैं कि ये क्या है। अजगर देखता है कि एक बालक तो पीछे ही खड़ा रहा गया। कुछ देर बाद कृष्ण भी उसके पास आ जाते हैं। सभी सखा अजगर की जीभ पर चढ़कर उसके मुंह में पहुंच जाते हैं, लेकिन कृष्णा नीचे ही खड़े रहते हैं। तब मनसुखा आवाज लगाता है, कृष्णा अंदर आओ, देखो गुफा के अंदर कितनी लंबी सुरंग है। अजगर कृष्णा की ओर देखता है। फिर कृष्णा भी जीभ से चढ़कर अंदर पहुंच जाते हैं। 
 
वहां पहुंचकर कृष्णा अजगर के मुंह में ऊपर की ओर देखते हैं। फिर मनसुखा कहता है देखो कान्हा कितनी ठंठ है यहां। आज से हम यहीं भोजन किया करेंगे, लेकिन कृष्णा मुस्कुराते हैं। तभी अचानक अजगर का मुंह बंद हो जाता है। सभी चीखते हैं भागो भागो। सभी सखा कहते हैं हमारी रक्षा करो कान्हा। यह कहते हुए सभी बेहोश हो जाते हैं। फिर कृष्णा अपने शरीर का आकार बड़ाते जाते हैं और उस अजगर का जबड़ा तोड़ देते हैं। यह दृश्य देखकर आसमान से शंख का नाद होता है और सभी देवता श्रीकृष्ण को नमस्कार करते हैं। 
 
फिर उस अजगर के अंदर से एक देवता निकलते हैं और कृष्णा को प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि आज कई युगों के पश्चात मैं महर्षि अष्टावक्र के श्राप से मुक्त होकर आप जगदीश्वर की वंदना कर रहा हूं। आपकी शरण आया हूं प्रभु। आपके श्रीचरणों के स्पर्श मात्र से मेरे समस्त पापों का नाश हो गया है। हे दीनबंधु मैं दैत्य शंखासुर का पुत्र था। कामदेव के समान मुझे अपने शरीर की सुंदरता पर गर्व था। एक दिन वन में मैंने ऋषि अष्टावक्र को देखा। उनके टेड़े मेड़े और लचीले शरीर को देखकर मैं अपनी हंसी रोक न सका और उनका घोर मजाक उड़ाया। तब उन्होंने मुझे सर्प हो जाने का श्राप दे दिया। मैंने क्षमा मांगी तब उन्होंने कहा कि द्वापर के अंत में श्रीकृष्ण के चरण पड़ने से तेरे सर्प शरीर का अंत हो जाएगा। यह कथा सुनाने के बाद वह देव भगवान श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में लीन हो जाता है। जय श्रीकृष्णा।
 
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