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हज़ारों खुशियाँ कम है
मंगलवार, 28 दिसंबर 2010
हज़ारों खुशियाँ कम है, एक ग़म भुलाने के लिए, एक ग़म काफी है ज़िंदगी भर रूलाने के लिए।
चैन से तुझको जीना है
मंगलवार, 28 दिसंबर 2010
बस्ती-बस्ती फैल चुकी है बेचैनी की आग, चैन से तुझको जीना है तो वीराने में भाग।
ज़ख़्म खा के भी हमको तो
गुरुवार, 23 दिसंबर 2010
ग़मों की भीड़ में आँसू किसे बहाना है, के ज़ख़्म खा के भी हमको तो मुस्कुराना है - अज़ीज़ अंसारी
सरों पे माँ की दुआओं
गुरुवार, 23 दिसंबर 2010
सरों पे माँ की दुआओं का शामियाना है, हमारे पास तो अनमोल ये ख़ज़ाना है। शामियाना = छत्र, मंडप
तो घर काट रहा है
शनिवार, 18 दिसंबर 2010
हरसू मिले बाज़ार में अल्फाज़ के नश्तर, घर आके जो बैठा हूँ तो घर काट रहा है। नश्तर = खंजर-चाकू
तुम्हें चाहत का ऐसा मज़ा फ़राज़
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
हमारे बाद नहीं आएगा तुम्हें चाहत का ऐसा मज़ा फ़राज़, तुम लोगों से कहते फिरोगे, मुझे चाहो उसकी तरह -
दिन भर बैठा मैं पछताया
मंगलवार, 14 दिसंबर 2010
सुबहा को लहजा सख़्त हुआ था बातों में, दिन भर बैठा मैं पछताया रात हुई - अज़ीज़ अंसारी
ये भी तो हो सकता है
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
दीप जलाके भटके हुए को राह दिखाने वाला खुद, राह किसी की देख रहा हो ये भी तो हो सकता है।
शर्म से मर जाऊँगा
बुधवार, 8 दिसंबर 2010
झूठ का लेकर सहारा जो उबर जाऊँगा, मौत आने से नहीं शर्म से मर जाऊँगा - अज़ीज़ अंसारी
मैं उनको शक की निगाहों से
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
मैं उनको शक की निगाहों से देखता क्यूँ हूँ, वो लोग जिनके लिबासों पे कोई दाग़ नहीं - - आलम खुर्शीद
तन्हाई का ज़हर तो
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
तन्हाई का ज़हर तो वो भी पीते हैं, हर पल जिनके साथ ज़माना होता है - आलम खुर्शीद
हमको अज़ीज़ अपनों ने मारा
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
हमको बहुत नाज़ था
गुरुवार, 2 दिसंबर 2010
हमको बहुत नाज़ था अपनी हँसी पर, खून के आंसू रुलाया ज़िन्दगी ने।
कोई हमदर्द भी होगा
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
कोई हमदर्द भी होगा, इनमें अज़ीज़, आश्ना* तो यहाँ लोग ही लोग हैं।
कोई अब तक न ये समझा
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
कोई अब तक न ये समझा कि इंसाँ, कहाँ जाता है, आता है कहाँ से - मोमिन
उसके बदन पर आंचल उड़ते देखा है
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
सर्द हवा में उसके बदन पर आंचल उड़ते देखा है, पानी वाला बादल जैसे सैर करे कोहसारों पर - अज़ीज़ अंसार
अब कोई अच्छा भी लगे तो ...
शुक्रवार, 26 नवंबर 2010
थक सा गया है मेरी चाहतों का वजूद, अब कोई अच्छा भी लगे तो हम इज़हार नहीं करते - अज्ञात
मुद्दतों बाद मुस्कुराया है
सोमवार, 1 नवंबर 2010
ऐन मुमकिन है रो पड़े फिर वो, मुद्दतों बाद मुस्कुराया है - दीक्षित दनकौरी
मुसाफिर हैं नए सारे सफ़र में
सोमवार, 1 नवंबर 2010
मुसाफिर हैं नए सारे सफ़र में ज़िंदगानी के, यहाँ कोई नहीं ऐसा जो ये रस्ता समझता है - अंकित
मैं पंछी हूँ मुहब्बत का
सोमवार, 1 नवंबर 2010
मैं पंछी हूँ मुहब्बत का, फ़क़त रिश्तों का प्यासा हूँ, ना सागर ही मुझे समझे ना ही सहरा समझता है - अ
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