Urdu Literature Sahitya 43
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ऎसी दीपावली मनाएँगे
अपने दीवार-ओ-दर सजाएँगे दिल भी रोशन हों जिन चिराग़ों से ऎसी दीपावली मनाएँगे
दिवाली आई दीप जलाएँ : शेरी भोपाली
मिट्टी में मिला दे के जुदा हो नहीं सकता अब इससे ज़्यादा में तेरा हो नहीं सकता
सारी कायनात गई
दिल गया रौनक़े-हयात गई ग़म गया सारी कायनात गई------जिगर
ख़्वाब है दीवाने का
इक मोअम्मा है समझने का न समझाने का ज़िन्दगी काहे को है ख़्वाब है दीवाने का-------फ़ानी बदायूनी
राहत इन्दौरी की ग़ज़लें
तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे
ख़्याले-ख़ाम किया
साअदे-सीमी उसके हमने हाथ में लाके छोड़ दिए भूले उसके क़ौल-ओ-क़सम पर हाय! ख़्याले-ख़ाम किया-----मीर
ग़ालिब के मशहूर अशआर और उनका मतलब (2)
इश्क़ किसी रंग में भी सामने आए साज़-ओ-सामान की उसको कोई परवाह नहीं होगी। यहाँ तक के मजनूँ की जो तस्वीर...
दास्ताँ कहते कहते
ज़माना बड़े ग़ौर से सुन रहा था हमीं सो गए दास्ताँ कहते कहते------साक़िब
ग़म की हँसी उड़ाने का
दोस्ती और इस ज़माने में, ज़िक्र करते हो किस ज़माने का इक बहाना है बादा पैमाई, 'शाद' ग़म की हँसी उड़ाने का
जंग : नज़्म
हर गली कूंचे में घुस कर बन्द दरवाज़ों की सांकल खोलती है,
मोमिन -2
हम समझते हैं आज़माने को उज़्र कुछ चाहिए सताने को
ज़ेबा जोनपुरी के अशआर
अन्दाज़ कुछ अलग ही मेरे सोचने का है मंज़िल का सब को शौक़ मुझे रास्ते का है
तमाशाइयों में था
जो शख़्स मुद्दतों मेरे शैदाइयों में था, आफ़त के वक़्त वो भी तमाशाइयों में था। ----- शकीला बानो
ग़ालिब के अशआर और उनके माअनी
ख़ुदा की बनाई हुई हर चीज़ फ़ना होने वाली है। हर चीज़, हर तस्वीर का लिबास काग़ज़ का है जो कभी भी जल सकता है...
प्याला-ओ-साग़र
क्यों गरदिश-ए-मुदाम से घबरा न जाए दिल, इंसान हूँ प्याला-ओ-साग़र नहीं हूँ मैं।-----------
बाज़ार कर लिया
रिश्तों का भाव, प्यार की क़ीमत, वफ़ा का मोल तुमने तो अपने घर को ही बाज़ार कर लिया -------- हनीफ़ साग़र
नज़ीर फ़तहपुरी (पूने) के माहिये
साया हैं न दीवारें = ज़ीस्त के जंगल में = हैं धूप की बौछारें
डॉ. मेहबूब राही के अशआर
दवा ने काम किया
उलटी हो गईं सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया
दवा ने काम किया
उलटी हो गईं सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया-----मीर तक़ी
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