ग़ालिब की ग़ज़ल : हर शे'र के मतलब के साथ

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देह्र में नक़्श-ए-वफ़ा, वजहे तसल्ली न हुआ
है ये वो लफ़्ज़ जो शर्मिन्दा-ए-मानी न हुआ

इस दुनिया में वफ़ा एक बेमाअनी लफ़्ज़ है। वफ़ा के नक़्श से ज़माने में किसी को तसल्ली न हुई। वफ़ा एक ऎसा लफ़्ज़ है जिसे अपने मफ़हूम से कभी शर्म न आई।

सबज़ा-ए-ख़त से तेरा काकुल-ए-सरकश न दबा
ये ज़मर्रुद की हरीफ़-ए-दम-ए-अफ़ई न हुआ

ज़मर्रुद के सामने साँप अंधा हो जाता है लेकिन काकुल के ज़हरीले साँपों पर ज़मर्रुद यानी सबज़ा-ए-ख़त का भी कोई असर नहीं हुआ। मक़सद ये के सबज़ा-ए-ख़त के नमूदार होने पर भी तेरे बालों की ज़हर अफ़शानी का वही आलम है।

मैंने चाहा था के अंदोहे-वफ़ा से छूटूँ
वो सितमगर मेरे मरने पे भी राज़ी न हुआ

मोहब्बत के ग़म से निजात हासिल करने के लिए मैंने मरना चाहा था लेकिन ज़ालिम महबूब मेरी मौत के लिए भी रज़ामन्द न हुआ। क्योंके मुझ जैसा वफ़ा करने वाला आशिक़ कोई और नज़र नहीं आ रहा था।

दिल गुज़रगाहे ख़्याल-ए-म-ओ-साग़र ही सही
गर नफ़स जादा-ए-सर मंज़िल-ए-तक़वा न हु आ

मैं परहेज़गार और पारसा अगर नहीं हूँ, न सही। मेरा दिल जाम-ओ-शराब की गुज़रगाह तो है।

हूँ तेरे वादा न करने पे भी राज़ी के कभी
गोश मिन्नत कशे गुलबांग-ए-तसल्ली न हुआ

मुझे ख़ुशी है के मेरे मेहबूब ने मिलने का वादा नहीं किया और मेरे कानों ने तसल्ली देने वाली ख़ुशगवार आवाज़ का एहसान नहीं उठाया।

किससे मेहरूमिए क़िसमत की शिकायत कीजे
हमने चाहा था के मर जाएँ सो वो भी न हुआ

हमारी क़िस्मत भी अजीब है। हमें हर काम में मेहरूमी नसीब हो रही है, यहाँ तक के हमने मरना चाहा तो मर भी न सके, अब इस की शिकायत किससे करें।

मर गया सदमा-ए-यक जुम्बिश-ए-लब से ग़ालिब
नातवानी से हरीफ़-ए-दम-ए-ईसा न हुआ

ईसा की तरह मेहबूब भी मेरे अन्दर नई ज़िन्दगी फूँकने आया था। लेकिन मेरी नातवानी का ये आलम था के मैंने होंटों को जुम्बिश ही दी थी के मैं उस जुम्बिश के सदमे से चल बसा और मैं मेहबूब के एहसान से बच गया।

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