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निदा : तुम भी तन्हा-मैं भी तन्हा....

स्मृति आदित्य
सादा बोल, गहरे भाव, मीठे एहसास, प्रभावशाली रचनाएं। यही सच्ची पहचान है निदा फ़ाज़ली की। कितना भी सुनो, कितना भी पढ़ो  बांध लेती हैं उनकी हर रचना....जीवन की उलझनों और मोहब्बतों से जुड़ी उनकी नाजुक अभिव्यक्ति बहुत-बहुत भीतर तक जाकर ठंडक देती रही हैं। उन्हें पढ़ते हुए कभी लगा, कठोर परदेस में मां सिर पर स्नेहिल हाथ फिरा रही हैं....(मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की बिन चिट्ठी, बिन तार....) कभी लगा कि झुलसते-तपते दिल के लिए इसी शीतल रूई के फाहे की तो दरकार थी...कभी लगा है कितना मनमोहक बच्चा है इनकी रचनाओं के भीतर ठुमक कर ठोड़ी चूम लेता है और हाथ नहीं आता है।

कभी बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी बन मां की आकुल याद दिला देते निदा..लगता है कि हर रिश्ते को गहराई से जी लेना जानता है यह शख्स...
नीलगगन में तैर रहा है उजला-उजला पूरा चांद,
मां की लोरी सा, बच्चे के दूध कटोरे जैसा चांद....
मुझसे पूछो कैसे काटी मैंने पर्वत जैसी रात...
तुमने तो गोदी में लेकर घंटों चूमा होगा चांद....    


उफ.. क्यों आज का ही दिन मिला उन्हें दुनिया से रूखसत होने के लिए....‍क्या जगजीत जी को जन्मदिन की बधाई देने पहुंच गए.... निदा क्या गए, लग रहा है ग़ज़ल, नज़्म, कविताएं, शेर और दोहे जैसे शब्द आर्तनाद कर रहे हैं। यह क्या हुआ, कैसे हुआ, जाना तो सबको है मगर इस तरह भला कहीं कोई जाता है?
...कौन है ऐसा मशहूर गायक जिसने आपके रचे खूबसूरत शब्दों को सुरों में ना पिरोया हो.... जगजीत जी और निदा जी का सुंदर संयोग एक दिन इस तरह भी बनेगा किसी ने सोचा नहीं था, यह कैसी जुगलबंदी है?... दोनों महान कलाकारों को साथ में याद करें तो भी ज़ार-ज़ार रूला देने वाली पंक्तियां याद आती है : दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। हमने तो दो खरे 24 कैरेट के स्वर्णभूषण खो दिए.... 
आपको याद करें भी तो आपके ही रचे शब्द सहारा बन रहे हैं....
 
*  क्या हुआ शहर को कुछ भी तो दिखाई दे कहीं, 
यूं किया जाए कभी खुद को रूलाया जाए..... 
 
*  वक्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से 
किसको मालूम, कहां के हैं, किधर के हम हैं 
 
* उसको खो देने का एहसास तो कम बाकी है 
जो हुआ वो न हुआ होता ये गम बाकी है 
 
* मैंने पूछा था सबब पेड़ के गिर जाने का 
उठ के माली ने कहा उसकी कलम बाकी है.... 
यूं तो निदा जी के रचे शब्द-मोती वक्त के साथ अपनी आभा बढ़ाते रहेंगे लेकिन एक नायाब मोती ऐसा है जिसके लिए उन्हें सदियों तक दिल की धड़कनों में महसूस किया जाता रहेगा। और वह है-- ''कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता... एक-एक लफ्ज मुकम्मल, एक-एक भाव सच्चा, एक-एक पंक्ति करीने से सजी हुई कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं बचती कि कोई कह दे कि इससे बेहतर लिखा जा सकता था पर खुद निदा कहते थे, नहीं ऐसा नहीं है रचना हमेशा और बेहतर हो सकती है... मुझे किसी तरह का गुमान नहीं है। 
तन्हा-तन्हा दुख झेलेंगे 
महफिल-महफिल गाएंगे 
जब तक आंसू पास रहेंगे 
तब तक गीत सुनाएंगे .... 
 
इस बुरे वक्त में जब धर्मों का आपसी भाईचारा दांव पर लगा हो तब तो उन्हें इन पंक्तियों से आगे कुछ गीत सुनाने के लिए रूक ही जाना था... वृंदावन के कृष्ण कन्हैया अल्लाह हू... बंसी राधा गीता गैया अल्लाह हू.... निदा सर, आपकी याद में अवरूद्ध कंठ से आंसू के अधखिले शब्द-फूल रखती हूं जाते-जाते हो सके तो उनको भी देख लेना...

* फूल जब खिल के महक जाता है
ख़ुद-ब-ख़ुद
शाख से गिर जाता है.... 

* तुमसे छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था
तुमको ही याद किया तुमको भुलाने के लिए..
* मस्ज़िद का गुम्बद सूना है
मन्दिर की घंटी ख़ामोश
जुज़दानों में लिपटे सारे आदर्शों को
दीमक कब की चाट चुकी है
रंग गुलाबी
नीले
पीले
कहीं नहीं हैं
तुम उस जानिब
मैं इस जानिब
बीच में मीलों गहरा ग़ार
लफ्ज़ों का पुल टूट चुका है
तुम भी तन्हा
मैं भी तन्हा।

उसे रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था,
सारा घर ले गया, घर छोड़कर जाने वाला।

मौत इक वाहिमा है नज़रों का, साथ छूटा कहां है अपनों का 
जो ज़मीं पर नज़र नहीं आते, चांद तारों में जगमगाते हैं... 

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