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84 महादेव : श्री अप्सरेश्वर महादेव(17)

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देवं सप्तदशं विद्धि विख्यातं अप्सरेश्वरं।
यस्य दर्शन मात्रेण लोकोअभीष्टानवाप्नुयात्।।
श्री अप्सरेश्वर महादेव की कथा महाकाल वन की महत्ता और अप्सराओं की शिव आराधना को चित्रित करती है। अप्सराओं द्वारा पूजे गए इस लिंग से अप्सरा रंभा का शाप दोष दूर हुआ था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार नंदन नामक वन में एक बार राजा इंद्र अपनी सभा में दिव्य सिंहासन पर विराजमान हो नृत्य देख रहे थे। इंद्र ने वहां अप्सरा रंभा को चित्त से विचलित हो लय ताल से चूकते देखा। तब इंद्र देव क्रोधित हुए एवं बोले कि भूल करना मनुष्य की प्रवत्ति है लेकिन देवलोक में यह क्षमा करने योग्य नहीं है। फिर उन्होंने रंभा को कांतिहीन होने का शाप दे पृथ्वी लोक पर भेज दिया। इंद्र देव के शाप देते ही रंभा अपनी शोभा खो पृथ्वी लोक पर गिर पड़ी और दुखी हो रुदन करने लगी। रंभा को दुखी देख उसकी सखियां भी आकाश से नीचे आकर उसके दुःख में शामिल हो गईं।
 
 
तभी वहां नारदजी पहुंचे और अप्सराओं को विलाप करते देख आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने अप्सराओं से उनके विलाप का कारण पूछा। प्रत्युत्तर में अप्सराओं ने इंद्र देव के दरबार में हुए घटनाक्रम का सम्पूर्ण वृत्तांत कह सुनाया। अप्सराओं की बात सुन नारद मुनि ध्यानमग्न हुए और फिर बोले कि आप सभी महाकाल वन जाएं। महाकाल वन में हरसिद्धि पीठ के सामने एक दिव्य लिंग है उसके दर्शन करें। उस लिंग की आराधना से आप सभी के समस्त मनोरथ पूर्ण होंगे। मेरे आदेश पर इसके पहले ऊर्वशी को भी उस लिंग के दर्शन करने से उसके पति की पुनः प्राप्ति हुई थी। तब सभी अप्सराएं महाकाल वन पहुंची और वहां उन्होंने नारद मुनि द्वारा बताए  दिव्य लिंग का सच्ची श्रद्धा से पूजन-अर्चन किया। अप्सराओं द्वारा श्रद्धापूर्वक पूजन अर्चन से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने यह वरदान दिया कि आप सभी को पुनः इंद्र लोक प्राप्त होगा। अप्सराओं द्वारा पूजे जाने के कारण वह लिंग अप्सरेश्वर कहलाया।
 
दर्शन लाभ:
मान्यतानुसार श्री अप्सरेश्वर महादेव का दर्शन करने से किसी का स्थान भ्रष्ट नहीं होता है एवं एवं खोई हुई पद व प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त हो जाती है। ऐसा भी माना जाता है कि अगर आप यहां  दर्शन के लिए दूसरों को भेजेंगे तो भी आपको वही फल प्राप्त होगा और स्थान वियोग इत्यादि नहीं होगा।उज्जयिनी स्थित चौरासी महादेव में से एक श्री अप्सरेश्वर महादेव का मंदिर पटनी बाजार में स्थित है। 

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