Hanuman Chalisa

अत्यंत शक्तिशाली श्री नृसिंह स्तोत्र

Webdunia
ब्रह्मोवाच
 
नतोऽस्म्यनन्ताय दुरन्तशक्तये विचित्रवीर्याय पवित्रकर्मणे।
 
विश्वस्य सर्ग-स्थिति-संयमान्‌ गुणैः स्वलीलया सन्दधतेऽव्ययात्मने॥1॥
 
 
श्रीरुद्र उवाच
 
कोपकालो युगान्तस्ते हतोऽयमसुरोऽल्पकः।
 
तत्सुतं पाह्युपसृतं भक्तं ते भक्तवत्सल॥2॥
 
 
इंद्र उवाच
 
प्रत्यानीताः परम भवता त्रायतां नः स्वभागा।
 
दैत्याक्रान्तं हृदयकमलं स्वद्गृहं प्रत्यबोधि।
 
कालग्रस्तं कियदिदमहो नाथ शुश्रूषतां ते।
 
मुक्तिस्तेषां न हि बहुमता नारसिंहापरैः किम्‌॥3॥
 
 
ऋषय ऊचुः
 
त्वं नस्तपः परममात्थ यदात्मतेजो येनेदमादिपुरुषात्मगतं ससर्ज।
 
तद्विप्रलुप्तमनुनाऽद्य शरण्यपाल रक्षागृहीतवपुषा पुनरन्वमंस्थाः॥4॥
 
 
पितर ऊचुः
 
श्राद्धानि नोऽधिबुभुजे प्रसभं तनूजैर्दत्तानि तीर्थसमयेऽप्यपिबत्तिलाम्बु।
 
तस्योदरान्नखविदीर्णवपाद्य आर्च्छत्तस्मै नमो नृहरयेऽखिल धर्मगोप्त्रे॥5॥
 
 
सिद्धा ऊचु:
 
यो नो गतिं योगसिद्धामसाधुरहारषीद्योगतपोबलेन।
 
नानादर्पं तं नखैर्निर्ददार तस्मै तुभ्यं प्रणताः स्मो नृसिंह॥6॥
 
 
विद्याधरा ऊचु:
 
विद्यां पृथग्धारणयाऽनुराद्धां न्यषधदज्ञो बलवीर्यदृप्तः।
 
स येन संख्ये पशुवद्धतस्तं मायानृसिंहं प्रणताः स्म नित्यम्‌॥7॥
 
 
नागा ऊचु:
 
येन पापेन रत्नानि स्त्रीरत्नानि हृतानि नः।
 
तद्वक्षःपाटनेनासां दत्तानन्द नमोऽस्तु ते॥8॥
 
 
मनव ऊचु:
 
मनवो वयं तव निदेशकारिणो दितिजेन देव परिभूतसेतवः।
 
भवता खलः स उपसंहृतः प्रभो कर वाम ते किमनुशाधि किंकरान्‌॥9॥

रजापतय ऊचु:
 
प्रजेशा वयं ते परेशाभिसृष्टा न येन प्रजा वै सृजामो निषिद्धाः।
 
स एव त्वया भिन्नवक्षाऽनुशेते जगन्मंगलं सत्त्वमूर्तेऽवतारः॥10॥
 
 
गन्धर्वा ऊचु:
 
वयं विभो ते नटनाट्यगायका येनात्मसाद् वीर्यबलौजसा कृताः।
 
स एव नीतो भवता दशामिमां किमुत्पथस्थः कुशलाय कल्पते॥11॥
 
 
चारणा ऊचु:
 
हरे तवांग्घ्रिपंकजं भवापवर्गमाश्रिताः।
 
यदेष साधु हृच्छयस्त्वयाऽसुरः समापितः॥12॥
 
 
यक्षा ऊचु:
 
वयमनुचरमुख्याः कर्मभिस्ते मनोज्ञैस्त इह दितिसुतेन प्रापिता वाहकत्वम्‌।
 
स तु जनपरितापं तत्कृतं जानता ते नरहर उपनीतः पंचतां पंचविंशः॥13॥
 
 
किंपुरुषा ऊचु:
 
वयं किंपुरुषास्त्वं तु महापुरुष ईश्वरः।
 
अयं कुपुरुषो नष्टो धिक्कृतः साधुभिर्यदा॥14॥
 
 
वैतालिका ऊचु:
 
सभासु सत्रेषु तवामलं यशो गीत्वा सपर्यां महतीं लभामहे।
 
यस्तां व्यनैषीद् भृशमेष दुर्जनो दिष्ट्या हतस्ते भगवन्‌ यथाऽऽमयः॥15॥
 
 
किन्नरा ऊचु:
 
वयमीश किन्नरगणास्तवानुगा दितिजेन विष्टिममुनाऽनुकारिताः।
 
भवता हरे स वृजिनोऽवसादितो नरसिंह नाथ विभवाय नो भव॥16॥
 
 
विष्णुपार्षदा ऊचु:
 
अद्यैतद्धरिनररूपमद्भुतं ते दृष्टं नः शरणद सर्वलोकशर्म।
 
सोऽयं ते विधिकर ईश विप्रशप्तस्तस्येदं निधनमनुग्रहाय विद्मः॥17॥
 
 
॥ इति श्रीमद्भागवतान्तर्गते सप्तमस्कन्धेऽष्टमध्याये नृसिंहस्तोत्रं संपूर्णम्‌ ॥

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

वैशाख महीना किन देवताओं की पूजा के लिए है सबसे शुभ? जानें इसका धार्मिक महत्व

ऑपरेशन सिंदूर 2.0: क्या फिर से होने वाला है भारत और पाकिस्तान का युद्ध, क्या कहता है ज्योतिष

महायुद्ध के संकेत! क्या बदलने वाला है कुछ देशों का भूगोल? ज्योतिष की चौंकाने वाली भविष्यवाणी

अक्षय तृतीया पर क्यों होता है अबूझ मुहूर्त? जानिए इसका रहस्य

बैसाखी कब है, क्या है इसका महत्व, जानिए खास 5 बातें

सभी देखें

धर्म संसार

Guru Arjun Dev Ji: गुरु अर्जन देव जी का इतिहास क्या है?

Aaj Ka Rashifal: आज का दैनिक राशिफल: मेष से मीन तक 12 राशियों का राशिफल (8 अप्रैल, 2026)

08 April Birthday: आपको 8 अप्रैल, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 8 अप्रैल 2026: बुधवार का पंचांग और शुभ समय

South Direction Home Vastu Tips: घर की दक्षिण दिशा को इन 5 तरीकों से अशुभता से बचाएं